पलकी शर्मा का कॉलम:  पीओके को संभालना अब पाक के बूते की बात नहीं
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पलकी शर्मा का कॉलम: पीओके को संभालना अब पाक के बूते की बात नहीं

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4 घंटे पहले

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पलकी शर्मा मैनेजिंग एडिटर FirstPost - Dainik Bhaskar

पलकी शर्मा मैनेजिंग एडिटर FirstPost

कहते हैं कि एक देश अपने प्रांतों का जमा-जोड़ होता है। यकीनन, यह बात पाकिस्तान पर लागू नहीं होती। आज उसके कई प्रांत खुली बगावत करते मालूम होते हैं। हमने देखा कि पिछले महीने बलूचिस्तान में क्या हुआ। अलगाववादियों ने एक पूरी ट्रेन को हाईजैक कर लिया था, जिसमें 400 लोग सवार थे। विद्रोह की सुगबुगाहटें खैबर पख्तूनख्वा में भी हैं। यह पाकिस्तानी तालिबान का केंद्र है।

इस्लामाबाद इन चुनौतियों से जूझ ही रहा था कि अब एक नई चुनौती सामने आ रही है- और वह भी एक ऐसे प्रांत से, जो पाकिस्तान का है ही नहीं, लेकिन उसने अवैध रूप से उस पर कब्जा कर रखा है। यह पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर या पीओके है।

पीओके में हाल ही में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए हैं, जिनका नेतृत्व यूनाइटेड अवामी एक्शन कमेटी नामक समूह कर रहा है। यह एक्शन कमेटी पाकिस्तान सरकार से एक विशेष पैकेज और अपने विस्थापित लोगों के लिए 12 विधानसभा सीटें चाहती है। मांगें पूरी नहीं होने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई है। उनके नेता ने कहा है कि अगर उन्हें प्रताड़ित किया गया, तो वे पलटवार करेंगे।

यह पाकिस्तान की फौज के लिए एक नया सिरदर्द है। उसे कई मोर्चों पर खतरों का सामना करना पड़ रहा है। जब से तालिबान ने काबुल में सत्ता पर कब्जा किया है, तब से वह पाकिस्तान विरोधी उग्रवादी और आतंकवादी समूहों को संरक्षण दे रहा है और उन्हें हथियारों से लैस कर रहा है।

यह पाकिस्तानी जनरलों के लिए जैसे को तैसा वाली स्थिति भी है। सालों तक, उन्होंने भारत के खिलाफ आतंकवादियों को पाला-पोसा। अब तालिबान पाकिस्तान के साथ ऐसा ही कर रहा है। इस सबके बावजूद, पाकिस्तान अपनी खयालों की दुनिया में जी रहा है। उससे पीओके नहीं संभल रहा है, लेकिन वह भारत से जम्मू और कश्मीर भी चाहता है। पाकिस्तान ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठाया, लेकिन प्रत्युत्तर में भारतीय दूत ने उसे अपने गैरमुनासिब दावों पर रोक लगाने और पीओके को खाली करने की हिदायत दे डाली।

यह यकीनन एक अच्छी सलाह थी। पाकिस्तान अपने ही प्रांतों को संभाल नहीं पा रहा है और अपने कब्जे वाले कश्मीर में वह किसी भी तरह से बेहतरी ला नहीं सकता। ऐसे में उसके लिए यही तार्किक होगा कि पीओके को भारत को सौंप दे। लेकिन जाहिर है कि पाकिस्तानी जनरल ऐसा करेंगे नहीं।

लेकिन क्या वे इन विद्रोहियों और विरोध-प्रदर्शनों को अपनी फौजी ताकत से नियंत्रित कर सकते हैं? विशेषज्ञों को तो ऐसा नहीं लगता। सबसे पहले तो पाकिस्तान की फौज को मैन-पॉवर की समस्या का सामना करना पड़ेगा। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा दोनों ही कठोर क्षेत्र हैं- चट्टानी, पहाड़ी और विस्तृत। साथ ही, विद्रोही अफगानिस्तान में छोड़े गए अमेरिकी हथियारों से लैस हैं। ऐसे इलाकों से उन्हें निकाल बाहर करना बहुत मुश्किल होगा। यहां तक ​​कि अमेरिकी भी अफगानिस्तान में ऐसा नहीं कर पाए।

दूसरा मुद्दा प्राथमिकताओं का है। पाकिस्तान की सेना भारत को लेकर हमेशा ही भ्रम में रहती है। इसलिए उनके बहुत सारे संसाधन नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर केंद्रित हैं। ऐसे परिदृश्य में, पाकिस्तान के पास दूसरे प्रांतों में मौजूद विद्रोहियों के खिलाफ एक से अधिक मोर्चों पर अभियान चलाने की क्षमता नहीं है।

उसे विदेशी मदद की जरूरत है, खास तौर पर अमेरिका की। लेकिन उसके दुर्भाग्य से, डोनाल्ड ट्रम्प फिर से अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए हैं। अपने पिछले कार्यकाल में, ट्रम्प ने पाकिस्तान पर आतंकवाद पर दोहरा खेल खेलने का आरोप लगाया था। और इस बार भी, ट्रम्प प्रशासन के शीर्ष अधिकारी पाकिस्तान को लेकर सशंकित हैं। उनमें से बहुत से लोगों ने खुले तौर पर पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई की मांग की है, जो पाकिस्तानी सेना के लिए दुश्मन नंबर एक हैं।

हाल ही में अमेरिका में पाकिस्तान के सेना प्रमुख के खिलाफ प्रतिबंधों की मांग करने वाला एक ​द्विदलीय विधेयक पेश किया गया है। अगर यह पारित हो जाता है, तो यह पाकिस्तान-अमेरिका संबंधों के लिए एक बड़ा झटका साबित होगा।

एक बात तो साफ है। 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान सबसे कमजोर हालत में है। पाकिस्तानी फौज की दमनकारी नीतियों और उत्पीड़न के खिलाफ उसके सूबों की बगावत भी उसे अतीत की याद दिलाने वाली है। देखते हैं, इतिहास खुद को दोहराता है या नहीं। (ये लेखिका के अपने विचार हैं।)

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