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पवन के. वर्मा का कॉलम: ‘काम नहीं, तो वोट नहीं’ का सिद्धांत अपनाएं तो क्या होगा?

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5 घंटे पहले

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पवन के. वर्मा
पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक - Dainik Bhaskar

पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक

हाल ही में मध्य प्रदेश के गुना में एक नागरिक ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से एक सड़क के लम्बित कार्य को लेकर शिकायत की। उसका दोटूक संदेश था : सड़क बनवाइए, वरना हम आपको वोट नहीं देंगे। मांग रखे जाने के इस तरीके पर सिंधिया आपत्ति जताते दिखाई देते हैं और नागरिक से कहते हैं कि धमकी देने के बजाय अनुरोध करे।

लेकिन इसके बाद सड़क के लिए करीब 3 करोड़ रुपये की राशि मंजूर कर दी जाती है और जरूरी प्रक्रिया को भी तेजी से पूरा करने के निर्देश दे दिए जाते हैं। सिंधिया लंबे समय से मेरे मित्र हैं। वे एक भले व्यक्ति और सक्षम मंत्री हैं। इसलिए यह घटना उनके बारे में नहीं, बल्कि इससे मिलने वाले सबक के बारे में है।

हमें यह सरल निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि नागरिक की धमकी की वजह से सड़क का काम मंजूर हुआ। दरअसल, खबरों की मानें तो इसकी डीपीआर पहले ही तैयार हो चुकी थी। सिंधिया की मंशा पर सवाल उठाने का कोई आधार नहीं हो सकता।

लेकिन यह घटना लोकतंत्र की एक बुनियादी बात को सामने लाती है : मतदाता याचक नहीं होता, और सड़क आदि सुविधाएं उपलब्ध कराकर नेता भी नागरिक पर कोई उपकार नहीं कर रहे होते हैं। सड़कों का निर्माण सार्वजनिक धन से किया जाता है, जिसके संग्रह का स्रोत भी नागरिक ही है। निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के धन और जनहित के बीच एक माध्यम है। इसलिए यह रिश्ता अनुकम्पा नहीं, उत्तरदायित्व का होना चाहिए।

लेकिन समय के साथ हमने जाने कैसे ऐसी राजनीतिक संस्कृति बना डाली है, जिसमें नागरिक अकसर याचक की मुद्रा में राजनेता के पास पहुंचता है। चुनाव के समय राजनेता भी नागरिक के सामने इसी शैली में आते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर मतदाता यह सिद्धांत अपना लें कि काम नहीं, तो वोट नहीं, तो क्या होगा? गुस्से भरे नारे के रूप में नहीं, धमकी के रूप में भी नहीं, बल्कि यह जवाबदेही तय करने का एक संवैधानिक लोकतांत्रिक माध्यम हो।

अलबत्ता शोध बताते हैं कि भारतीय मतदाताओं ने हमेशा ही इस तरह का व्यवहार नहीं किया है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनाई गई करीब 1.8 लाख ग्रामीण सड़कों का अध्ययन करने वाले एक बड़े शोध में पाया गया कि सड़कों के निर्माण से सत्तारूढ़ दल को अधिक चुनावी समर्थन नहीं मिला। सड़कें ऐसी सार्वजनिक सुविधाएं हैं, जो साफ दिखाई देती हैं और महत्वपूर्ण भी हैं, फिर भी उन्हें उपलब्ध कराने से चुनावी जीत की वह गारंटी नहीं मिली, जिसकी उम्मीद लोकतांत्रिक सिद्धांत के आधार पर की जा सकती है। ऐसा क्यों है?

इसका जवाब सिर्फ यह नहीं हो सकता कि भारत के लोग आसानी से बहकावे में आ जाने वाले हैं। ऐसा कहना न केवल उनके लिए अपमानजनक, बल्कि गलत भी होगा। भारतीय मतदाता जटिल राजनीतिक गणनाएं करने में पूरी तरह सक्षम हैं। वे अकसर सत्ता-परिवर्तन करके सरकारों को दंडित करते हैं।

समस्या यह है कि राजनीति में प्रदर्शन केवल एक कसौटी है, जिसके आधार पर मतदाता फैसला करते हैं। पहचान दूसरी कसौटी है। जाति मायने रखती है। धर्म मायने रखता है। समुदाय के प्रति निष्ठा मायने रखती है। राष्ट्रीय नेतृत्व मायने रखता है। कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मायने रखता है। राजनीतिक नैरेटिव मायने रखते हैं। भावनात्मक मुद्दे मायने रखते हैं। और जब चुनाव पहचान और नैरेटिव के बीच मुकाबला बन जाए, तो घर के बाहर मौजूद खस्ताहाल सड़क अजीब तरह से मतपेटी से गायब हो सकती है।

यही भारतीय मतदाता का बड़ा विरोधाभास है। एक नागरिक के रूप में तो हम जमकर शिकायतें करते हैं, लेकिन मतदाता के रूप में बहुधा अलग तरह से वोट देते हैं। हम सड़क के गड्ढों को कोस सकते हैं, लेकिन चुनाव में किसी बिल्कुल अलग मुद्दे पर वोट दे आ सकते हैं। हम प्रदूषण, भ्रष्टाचार या बदहाल नागरिक सुविधाओं पर घंटों चर्चा कर सकते हैं और फिर चुनावी बहस को ऐसे मुद्दों के हाथों में जाने दे सकते हैं, जिनका हमारे रोजमर्रा के जीवन की गुणवत्ता से बहुत कम संबंध है। शायद राजनेताओं ने भी इसे समझ लिया है।

समाधान यही है कि नागरिक संगठित हों, ताकि अपने वोट की ताकत का अधिकतम प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सकें। ‘काम नहीं, तो वोट नहीं’ का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि नागरिक किसी विपक्षी दल के प्रति अपनी निष्ठा तय कर लें। इसका मतलब यह होना चाहिए कि हर दल और हर जनप्रतिनिधि यह समझे कि मतदाता जवाबदेही और काम चाहता है और उसी के अनुसार अपने वोट का इस्तेमाल करेगा। भारतीय लोकतंत्र में यही वह बदलाव है, जो अब तक नहीं आया है।

  • भावनात्मक मुद्दे मायने रखते हैं। जब चुनाव पहचान और नैरेटिव के बीच मुकाबला बन जाए, तो घर के बाहर मौजूद खस्ताहाल सड़क अजीब तरह से मतपेटी से गायब हो सकती है। यही भारतीय मतदाता का बड़ा विरोधाभास है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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