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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उमर खालिद को जमानत देने से अतीत में किए गए अपने ही इनकार पर प्रश्न उठाए हैं। उमर पांच वर्ष से अधिक समय से कारावास में हैं। यह संकेत देता है कि देश की सर्वोच्च अदालत स्वयं राज्यसत्ता और संवैधानिक-स्वतंत्रताओं के बीच उचित संतुलन खोजने का प्रयास कर रही है। दशकों से भारतीय न्यायशास्त्र एक मूलभूत सिद्धांत पर आधारित रहा है : जमानत नियम है, जेल अपवाद। इस सिद्धांत को न्यायमूर्ति वीआर कृष्णा अय्यर ने राजस्थान राज्य बनाम बालचंद (1977) के मामले में स्मरणीय ढंग से प्रतिपादित किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया था कि दोषसिद्धि से पहले व्यक्तिगत स्वतंत्रता का बलिदान नहीं दिया जा सकता। इस सिद्धांत की पुष्टि बार-बार हुई है, जिनमें गुडीकांति नरसिंहुलु बनाम लोक अभियोजक (1978) का मामला भी शामिल है। इसमें न्यायालय ने कहा था कि दोषसिद्धि से पूर्व स्वतंत्रता से वंचित करना केवल असाधारण परिस्थितियों में ही उचित ठहराया जा सकता है। हाल के समय में, भारत सरकार बनाम केए नजीब (2021) वाले मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों वाली पीठ ने निर्णय दिया कि यूएपीए के कठोर प्रावधान भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त संवैधानिक गारंटियों को निष्प्रभावी नहीं कर सकते, जिनमें लंबा कारावास और मुकदमों में देरी स्वयं अन्याय के उपकरण बन जाते हों। न्यायालय ने कहा था कि ऐसी परिस्थितियों में यूएपीए की धारा 43डी(5) की कठोरता भी घटाई जा सकती है। लेकिन इस स्थापित सिद्धांत के बावजूद उमर खालिद सितंबर 2020 से ही दिल्ली दंगा षड्यंत्र मामले में कारावास में बने हुए हैं। मुकदमा किसी सार्थक दिशा में आगे नहीं बढ़ पाया है। इसलिए एक गम्भीर प्रश्न उठता है : यदि राज्य- अपनी समस्त जांच और अभियोजन शक्तियों के बावजूद- उचित समय के भीतर प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकता, तो क्या अभियुक्त को अनिश्चित काल तक जेल में सड़ते रहना चाहिए? क्या यह वस्तुतः दोषसिद्धि से पहले ही दंड नहीं है? जनवरी 2026 में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने उमर खालिद और शर्जील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था, जबकि कई सह-अभियुक्तों को राहत प्रदान की गई। पीठ ने कहा कि मुकदमे में देरी को यूएपीए मामलों में जमानत के लिए ट्रम्प कार्ड नहीं बनाया जा सकता। साथ ही उन्होंने आरोपों की गम्भीरता पर भी बल दिया। हालांकि इसके कुछ ही महीनों बाद हुए एक उल्लेखनीय घटनाक्रम में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की पीठ ने सार्वजनिक रूप से उस पूर्व-निर्णय पर गम्भीर आपत्तियां व्यक्त कीं। 18 मई 2026 को यूएपीए से जुड़े एक अलग मामले में एक अभियुक्त को जमानत देते हुए पीठ ने दृढ़ता से दोहराया कि जमानत नियम है और जेल अपवाद- यहां तक कि यूएपीए के मामलों में भी। पीठ ने यह भी कहा कि उमर खालिद को जमानत देने से अतीत में किया गया इनकार भारत सरकार बनाम केए नजीब वाले मामले में वृहत्तर पीठ द्वारा दिए निर्णय के अनुरूप प्रतीत नहीं होता। इसके निहितार्थ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि यदि किसी अभियुक्त को बिना दोषसिद्धि के- और मुकदमे में किसी सार्थक प्रगति के अभाव में- पांच वर्षों से अधिक समय तक कारावास में रखा जा सकता है, तो प्रक्रिया स्वयं ही दंड में बदल जाती है। ऐसी स्थिति में यदि दस वर्ष बाद अभियुक्त बरी भी हो जाए, तब भी उसके जीवन के खोए हुए वर्ष, उसकी धूमिल हुई प्रतिष्ठा, खंडित पारिवारिक जीवन और कारावास के दौरान झेला गया मानसिक आघात वापस नहीं लौटाया जा सकता। मुद्दा केवल उमर खालिद तक सीमित नहीं है। यह सभी सरकारों द्वारा यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के लगातार विस्तृत होते प्रयोग से जुड़ा प्रश्न है। इन प्रावधानों को मूलतः आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के गम्भीर खतरों से निपटने के लिए बनाया गया था, लेकिन धीरे-धीरे इनका विस्तार राजनीतिक असहमति और वैचारिक संघर्ष के क्षेत्र तक हो गया है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियां संकेत देती हैं कि अदालत इस बात से अवगत है कि कठोर वैधानिक प्रावधानों के प्रति अत्यधिक झुकाव- या अंतहीन प्रक्रियात्मक विलम्ब- स्वयं संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता के वचन को क्षीण कर सकते हैं। प्रश्न कहीं बड़ा है। वो यह है कि क्या भारतीय गणराज्य राज्यसत्ता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच के संवैधानिक संतुलन को बनाए रखना चाहता है? सर्वोच्च न्यायालय ने सही प्रश्न उठाया है। राष्ट्र को उसके उत्तर का सामना करने का साहस दिखाना होगा।यूएपीए जैसे कठोर कानूनों को मूलतः आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के गम्भीर खतरों से निपटने के लिए बनाया गया था। लेकिन दु:खद है कि धीरे-धीरे इनका विस्तार राजनीतिक असहमति और वैचारिक संघर्ष के क्षेत्र तक हो गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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