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- Pawan K. Verma’s Column There Is An Opportunity For Us In The US China Tussle
8 घंटे पहले
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पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक
ट्रम्प के बेतुके टैरिफ-युद्ध ने वैश्विक संकट को जन्म दिया है। हालांकि अमेरिका की यह नूराकुश्ती विशेषकर चीन के साथ चल रही है, जिस पर उसने 145 प्रतिशत टैरिफ थोप दिया है। लेकिन यह सभी देशों के लिए चुनौती है, खासकर भारत जैसी प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए।
इस तरह की चुनौतियां फौरी झटका तो देती हैं, लेकिन उनमें एक अवसर भी होता है। अब यह हम पर है कि क्या हम इस अवसर का उपयोग अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और भविष्य में इसी तरह की चुनौतियों के लिए खुद को बेहतर तरीके से तैयार करने के लिए कर सकते हैं?
भारत को इस टैरिफ-युद्ध पर संतुलित, रणनीतिक प्रतिक्रिया अपनानी चाहिए, जो उसके आर्थिक हितों की रक्षा करे, अवसरों का लाभ उठाए, बिना सोचे-समझे की गई प्रतिक्रियाओं के नुकसान से बचे और लोकलुभावनवाद के बजाय व्यावहारिकता पर आधारित रहे।
बेकार का पलटवार किसी काम का नहीं। 2019 में भी जब भारत ने स्टील और एल्युमीनियम ड्यूटी के जवाब में अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ लगाया था तो उससे हमें बहुत कम हासिल हुआ था। इसके बजाय, भारत को अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, व्यापार साझेदारी में विविधता लाने और खुद को दोफाड़ हो रही वैश्विक व्यवस्था में एक स्थिर विकल्प के रूप में स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
चीन अमेरिका से जोर-आजमाइश करने का जोखिम उठा सकता है क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था हमसे कहीं मजबूत है। अलबत्ता अमेरिका-चीन के बीच आर-पार का ट्रेड-वॉर वैश्विक मांग को कम कर सकता है, आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित कर सकता है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को एशिया में निवेश पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है। इसमें हमारे लिए एक अवसर है- लेकिन केवल तभी, जब हम अपने पत्ते सही तरीके से खेलें।
ये अवसर क्या हैं? इनमें सबसे महत्वपूर्ण है लागतों की प्रतिस्पर्धात्मकता में आमूलचूल सुधार करके और ‘ईज़ ऑफ डुइंग बिजनेस’ के अपने एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना। भारत के कॉर्पोरेट क्षेत्र में एक उल्लेखनीय आत्मसंतुष्टि आ गई है और देश में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ कैप्टिव-बाजारों के अस्तित्व ने इनोवेशन और प्रोडक्शन-लाइनों की गुणवत्ता और मात्रा में सुधार को धीमा कर दिया है।
देश में आर्थिक प्रतिस्पर्धा पर अकसर एकाधिकार रखने वाले उद्योग-घरानों की ग्रोथ का असर पड़ता है, क्योंकि उन्हें अपने आर्थिक प्रदर्शन को उन्नत करने में कोई वास्तविक प्रोत्साहन नहीं दिखता है। सरकार ने बिजनेस को आसान बनाने के लिए उतना नहीं किया है, जितना करना था।
हमारी अर्थव्यवस्था में अभी भी बहुत ज्यादा लालफीताशाही, बेकार के कानून, बदनाम ‘इंस्पेक्टर राज’ और भ्रष्टाचार है। 2020 के ग्लोबल ईज़ ऑफ डुइंग बिजनेस सूचकांक के अनुसार हम 190 देशों में से 63वें स्थान पर हैं। अभी हमें बहुत काम करना बाकी है।
चीन पर ट्रम्प के टैरिफ ने भारतीय निर्माताओं के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले अभाव की पूर्ति का अवसर दे दिया है। लेकिन इसका लाभ उठाने के लिए भारत को अपने घरेलू उद्योग को अधिक प्रतिस्पर्धी बनना होगा।
उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाएं एक अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन श्रम कानूनों, बुनियादी ढांचे और व्यापार-सुगमता में अभी भी बड़े सुधारों की दरकार है। दुर्भाग्य से, अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन विकास संस्थान के 2024 वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता सूचकांक में हम अभी 39वें स्थान पर ही हैं।
चीन की एक बड़ी कमजोरी यह थी कि वह निर्यात के डेस्टिनेशन के रूप में अमेरिका पर बहुत ज्यादा निर्भर था। भारत को इस तरह के जोखिमों को कम करने के लिए अपनी व्यापार साझेदारी में विविधता लानी चाहिए।
ये सच है कि अमेरिका हमारे लिए एक महत्वपूर्ण बाजार है, लेकिन हमें यूरोपीय संघ, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के साथ भी व्यापार का विस्तार करना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया और यूएई के साथ हाल ही में संपन्न व्यापार समझौते सही दिशा में उठाए गए कदम हैं, लेकिन इस तरह के और सौदों- खास तौर पर यूके-ईयू के साथ- को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
चीन के आर्थिक प्रभुत्व का मुकाबला करने के अमेरिका के प्रयास हमारे हित में हो सकते हैं। अमेरिका पहले से ही चीनी आपूर्ति शृंखलाओं के विकल्प तलाश रहा था और भारत- अपनी बड़ी वर्कफोर्स और लोकतांत्रिक साख के चलते इसका एक स्वाभाविक दावेदार है।
‘आत्मनिर्भर भारत’ के नारे का तब तक ज्यादा मतलब नहीं है, जब तक कि हम इसे अमल में नहीं लाते और विपरीत परिस्थितियों में इसकी आजमाइश नहीं करते। यह समय ताजा और इनोवेटिव सोच का है, कामचलाऊ उपायों का नहीं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)








