पवन के. वर्मा का कॉलम:  हम अपनी सुरक्षा को दुनिया के भरोसे नहीं छोड़ सकते
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पवन के. वर्मा का कॉलम: हम अपनी सुरक्षा को दुनिया के भरोसे नहीं छोड़ सकते

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6 घंटे पहले

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पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक - Dainik Bhaskar

पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक

जीवन की तरह कूटनीति में भी जो अनकहा रह जाता है, वह कहे जितना ही मुखर होता है। जब ट्रम्प ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद संघर्ष-विराम की घोषणा- जाहिराना तौर पर श्रेय लेने की गरज से- की, तो आतंकवाद के केंद्र के रूप में पाकिस्तान की भूमिका पर उनकी चुप्पी बहुत मुखर थी।

भला अमेरिका यह कैसे भूल सकता है कि वह मानव इतिहास में सबसे घातक इस्लामिक आतंकवादी हमले का शिकार हुआ था, जब वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन-टॉवर को नष्ट कर दिया गया था और पेंटागन पर भी हमला किया गया था।

अल-कायदा के ओसामा बिन लादेन की सरपरस्ती में हुए उस हमले में 2977 अमेरिकी मारे गए थे, हजारों घायल हुए थे, 10 अरब डॉलर से अधिक की सम्पत्ति नष्ट हो गई थी और 430,000 लोगों की नौकरी चली गई थी। उसके बाद से 9/11 को 2000 और अकाल-मृत्युओं के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है, और टॉक्सिक-एक्स्पोजर के कारण उस हादसे से जीवित बचे लोगों में भी कैंसर का खतरा 30% बढ़ गया है।

अमेरिका को लादेन को खोजकर मारने में दस साल लगे और उसे इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। और लादेन कहां मिला? एबटाबाद में पाकिस्तान की हुकूमत द्वारा मुहैया कराए एक कड़ी सुरक्षा वाले घर में, जहां वह परिवार के साथ मजे से रह रहा था। यह भवन पाकिस्तान की सैन्य अकादमी से कुछ ही दूरी पर था। अगर यह आतंकवाद से पाकिस्तानी-तंत्र की मिलीभगत का खुलासा नहीं करता तो और क्या करता है?

आज भी पाकिस्तान में दर्जनों ऐसे आतंकवादी समूह और व्यक्ति हैं, जिन पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाया है। इनमें मसूद अजहर के नेतृत्व वाला जैश-ए-मोहम्मद भी शामिल है। मसूद 2019 से ही संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकवादियों की सूची में शामिल है।

लश्कर-ए-तैयबा और हाफिज सईद के नेतृत्व वाला उसका प्रमुख संगठन जमात-उद-दावा भी अमेरिका, ईयू, रूस और भारत द्वारा आतंकवादी संगठन के रूप में नामजद है। 2008 के मुंबई हमले के पीछे जिस जाकिर रहमान लखी का दिमाग था, वह यूएन सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध-सूची में शुमार है। हिज्बुल मुजाहिदीन का लीडर सैयद सलाहुद्दीन और 1993 मुंबई धमाकों के ​लिए जिम्मेदार दाऊद इब्राहिम को भी अमेरिका ने वैश्विक आतंकवादी घोषित किया है।

आतंकवाद के प्रायोजकों पर अमेरिकी सरकार की एक अधिकृत सूची पाकिस्तान को आतंक की ऐसी ‘सुरक्षित पनाहगाह’ बताती है, जहां आतंकवादी और उनके समूह हुकूमत की मदद से दहशतगर्दी को अंजाम देने की योजनाएं बना सकते हैं, धन जुटा सकते हैं, भर्तियां कर सकते हैं, रंगरूटों को प्रशिक्षित कर सकते हैं और वारदातों को अंजाम दे सकते हैं। लेकिन अमेरिका और यूएन ने जिन आतंकवादियों को प्रतिबंधित किया है, वे पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं।

इस सबके बावजूद ट्रम्प ने संघर्ष-विराम की घोषणा करते हुए भारत और पाकिस्तान को एक साथ कैसे जोड़ दिया? उन्हें पता था कि ऑपरेशन सिंदूर पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित पहलगाम हमले के प्रतिशोध के रूप में शुरू किया गया था।

एक ऐसा देश- जिसने खुद पाकिस्तान में पनाह लेने वाले लादेन को खोजकर मार गिराया था- उसी का राष्ट्रपति सीजफायर के बाद पाकिस्तान प्रायोजित अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की निंदा किए बिना भारत और पाकिस्तान दोनों को उनके बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय के लिए कैसे बधाई दे सकता है?

दशकों से पाकिस्तानी प्रतिष्ठान ने जवाबदेही से बचते हुए रियायतें पाने के लिए अपनी भू-राजनीतिक स्थिति का लाभ उठाने की कला में महारत हासिल की है। लेकिन भारत को इन दोहरे मानदंडों का कड़ा विरोध करना होगा। दुनिया ने पाकिस्तान की हकीकत से न केवल आंखें मूंद ली हैं, बल्कि आईएमएफ ने एक बार फिर इस आतंकवादी देश को पुरस्कृत भी किया।

लेकिन भारत के पास इस तरह से अतीत को भूलने की सुविधा नहीं है। हमारे लिए पाकिस्तान में मौजूद आतंकवाद का बुनियादी ढांचा एक अस्तित्वगत खतरा है। यह हमारे लिए भू-राजनीतिक सौदेबाजी का साधन मात्र नहीं है।

ऑपरेशन सिंदूर भारत के आत्मरक्षा के अधिकार का साहसिक प्रयास था। इसके माध्यम से हमने संदेश दिया कि निष्क्रिय सहिष्णुता का युग समाप्त हो गया है। लेकिन जहां भारत ने निर्णायक रूप से कार्रवाई की, वहीं इस पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया बहुत लुंज-पुंज थी।

आतंकवादियों को पनाह देने में पाकिस्तान की भूमिका की स्पष्ट निंदा करने से दुनिया ने जैसी कोताही बरती, वह इस संगीन हकीकत को उजागर करती है कि हम अपनी सुरक्षा को दुनिया के भरोसे नहीं छोड़ सकते। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई हमें ही लड़नी होगी।

भारत के पास आतंकवाद के अतीत को भूलने की सुविधा नहीं है। हमारे लिए पाकिस्तान में मौजूद आतंकवाद का बुनियादी ढांचा एक अस्तित्वगत खतरा है। यह हमारे लिए भू-राजनीतिक सौदेबाजी का साधन मात्र नहीं है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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