पिनेलोपी गोल्डबर्ग का कॉलम:  दुनिया की दो महाशक्तियों को साथ काम करना होगा
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पिनेलोपी गोल्डबर्ग का कॉलम: दुनिया की दो महाशक्तियों को साथ काम करना होगा

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बीजिंग में डोनाल्ड ट्रम्प और शी जिनपिंग के बीच हुई समिट में भले ही टैरिफ, ताइवान या ईरान युद्ध जैसे मुद्दों पर कोई निर्णायक चर्चा नहीं हुई हो, फिर भी जिस संयमित और सौहार्दपूर्ण तरीके से वह ​शिखर-वार्ता सम्पन्न हुई, उसने एक नए, व्यावहारिक दृष्टिकोण का संकेत दिया। इसने बताया कि दोनों महाशक्तियों को अब एक-दूसरे पर गहरी आर्थिक निर्भरता को स्वीकार करना होगा। यह तो स्पष्ट था कि बीजिंग में अमेरिकी और चीनी राष्ट्रपति द्विपक्षीय संबंधों को केवल भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चश्मे से नहीं देख रहे थे। अगर अमेरिका चीन को एक ताकतवर आर्थिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्वीकार करता है तो इसका मतलब अपने रसूख को कम करना नहीं, बल्कि वास्तविकता का एहसास है। चीन के उदय पर अमेरिका में होने वाली बहसें वर्षों से एक सुपरिचित पैटर्न का पालन करती रही हैं : पहले तो वे इससे इनकार करते हैं, फिर इस पर नाराजी जताते हैं, और फिर अंततः इसे मान बैठते हैं। दोहरे अंकों वाली आर्थिक वृद्धि के युग के दौरान कई अमेरिकी विश्लेषकों ने आधिकारिक चीनी आंकड़ों को अविश्वसनीय या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हुआ बताकर खारिज कर दिया था। लेकिन जैसे-जैसे चीन के आर्थिक चमत्कार की अनदेखी करना मुश्किल होता गया, उसकी सफलता का श्रेय उसकी औद्योगिक नीति, बौद्धिक सम्पदा की चोरी और मुद्रा में हेरफेर जैसे अनुचित तौर-तरीकों को दिया जाने लगा। लेकिन अब उन नैरेटिव को बनाए रखना मुश्किल है, क्योंकि चीन कई रणनीतिक उद्योगों में तकनीकी उत्कर्ष तक पहुंच गया है। सबसे खास बात यह है कि चीनी ईवी निर्माता कम लागत वाले मॉडलों से लेकर तेजी से परिष्कृत प्रीमियम ब्रांडों तक- बाजार के विभिन्न क्षेत्रों में प्रमुख वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के रूप में उभरे हैं। दवाइयों के क्षेत्र में चीनी फर्में इनोवेटिव हो गई हैं। सेमीकंडक्टर में भी चीन ने एडवांस्ड-चिप्स के उत्पादन में महत्वपूर्ण प्रगति की है, हालांकि यह अभी भी टीएसएमसी से पीछे है। ऐसे में चीन की तकनीकी प्रगति को नकारने या उसकी राह में अड़ंगे डालने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अमेरिका को स्वीकार करना चाहिए कि चीनी प्रतिस्पर्धा अब स्थायी रूप से बनी रहने वाली है और आर्थिक सह-अस्तित्व तथा सीमित सहयोग के लिए ढांचे स्थापित करने चाहिए। ट्रम्प के साथ बीजिंग गए प्रमुख अमेरिकी सीईओ और बिजनेस-लीडर्स ने भी इस संदेश पर जोर दिया कि पूरी तरह से अलग-थलग हो जाना न तो यथार्थवादी होगा और न ही वांछनीय। एक अधिक संभावित मार्ग उस पारस्परिक निर्भरता में है, जो चुनिंदा क्षेत्रों में जारी रहनी चाहिए। शी ने अपनी ओर xसे थ्यूसीडाइड्स ट्रैप का हवाला देकर द्विपक्षीय संबंधों को परिभाषित किया है। यह शब्द राजनीतिक वैज्ञानिक ग्राहम एलिसन ने उस संघर्ष के खतरे को बताने के लिए गढ़ा था, जिसमें एक उभरती हुई ताकत किसी स्थापित शक्ति को बेदखल करने की चुनौती देती है। लेकिन अमेरिका के सामने मौजूद कई चुनौतियों के बावजूद उसे एक क्षीण होती ताकत के रूप में बताना अभी बहुत जल्दबाजी होगी। अमेरिका आज भी इनोवेशन और आंत्रप्रेन्योरशिप का दुनिया का अग्रणी केंद्र बना हुआ है, जिसने कंप्यूटिंग और इंटरनेट से लेकर स्मार्टफोन और एआई तक- पिछले सदी की कई परिवर्तनकारी टेक्नोलॉजी का उत्पादन किया है। कोई भी अन्य देश अमेरिका के वैज्ञानिक नेतृत्व, पूंजी बाजार, उद्यमी संस्कृति और संस्थागत लचीलेपन के संयोजन का मुकाबला नहीं कर सकता। जैसा कि अरबपति निवेशक वॉरेन बफे ने एक बार कहा था, 1776 के बाद से अमेरिका के खिलाफ दांव लगाकर कोई भी कभी सफल नहीं हुआ है। ऐसे में दुनिया को दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच अधिक सहयोग की आवश्यकता होगी। आज अमेरिका और चीन एक जैसी ही चुनौतियों का सामना कर रहे हैं : तीव्र तकनीकी परिवर्तन, एआई, वित्तीय अस्थिरता, सामाजिक विषमता और जलवायु परिवर्तन। इनके समाधान भी उन्हें साथ मिलकर ही खोजने होंगे।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)



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