मेघना पंत का कॉलम:  स्त्रियों के लिए फ्री बस टिकट चैरिटी नहीं, एक जरूरत है…
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9 घंटे पहले

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मेघना पंत, पुरस्कृत लेखिका, पत्रकार और वक्ता - Dainik Bhaskar

मेघना पंत, पुरस्कृत लेखिका, पत्रकार और वक्ता

शाम होते ही भारत में बस स्टॉप पर खड़ी कोई महिला बस के रूट नंबर से पहले आसमान की ओर झांकने लगती है। इसलिए नहीं कि उसे बारिश की चिंता है, बल्कि इसलिए कि अंधेरे में यहां महिलाओं के लिए हर चीज के मायने बदल जाते हैं। रात को बाहर निकले किसी पुरुष को यहां यात्रा करने वाला एक आम इंसान माना जाता है, लेकिन सूरज ढलने के बाद कोई महिला बाहर निकले तो सवाल उठने लगते हैं। कहां जा रही है? अकेली क्यों है? कौन इंतजार कर रहा है?

इसीलिए बंगाल में हाल ही शुरू की गई महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा के प्रावधान वाली योजनाएं अहम हैं। इनकी अहमियत इसलिए नहीं है कि बस का टिकट महंगा होता है, बल्कि इसलिए है कि भारत में महिलाओं के लिए बाहर निकलना आवाजाही की जरूरत से ज्यादा एक भावनात्मक विषय होता है। और यों देखें तो महज 40 रुपए भी लाखों महिलाओं के लिए कर्ज और सम्मान के बीच का फर्क हो सकते हैं।

कोई महिला घर से बाहर महज काम पर जाने के लिए ही नहीं निकलती। वह आत्मनिर्भरता और सम्भावनाओं की ओर भी जा रही हो सकती है। वह बिना किसी की इजाजत दुनिया में अपने अस्तित्व के अधिकार की ओर बढ़ रही हो सकती है। सम्भव है वह शहरभर में दो बसें बदलकर अपनी आर्थराइटिस से पीड़ित मां की देखभाल करने जा रही हो।

सम्भवत: शादी के बाद छोड़ दिए गए किसी पाठ्यक्रम में उसका फिर दाखिला हो गया हो। या फिर शायद वो बेहतर कमाई वाली नौकरी के लिए यात्रा कर रही हो। या फिर किसी एब्यूसिव पति से दूर शांति से कुछ घड़ी बिताने अपनी बहन के यहां जा रही हो। और यह भी हो सकता है कि वह ऑफिस के बाद बस चंद पलों के सुकून के लिए समुद्र किनारे बैठ गई हो, क्योंकि घर लौटने पर सिंक भर कर बर्तन तो उसका इंतजार कर ही रहे हैं, जो उसका बिना वेतन वाला काम है।

खैर, बहुतेरे पुरुषों को यह बात समझ नहीं आती, क्योंकि भारत में सार्वजनिक जगहें हमेशा से उन्हीं की मानी गई हैं। आप हर जगह ऐसा देख सकते हैं। वे पूरे फुटपाथ पर वाहन पार्क कर देते हैं। जहां महिलाएं बच्चों की प्राम लेकर चलती हैं, वहां वे बाइक चलाते हैं।

शहरों की दीवारों को तो उनमें से कइयों ने अपनी सुविधा के लिए बनाए पब्लिक टॉयलेट मान ही लिया है। सड़कों, रेलवे स्टेशनों, सीढ़ियों और कोनों में वे अमूमन बिना किसी हिचकिचाहट थूकते-पीकते दिखलाई दे सकते हैं। सार्वजनिक जगहों पर हर तरफ आपको पुरुषों की मौजूदगी के निशान मिलेंगे- बुलंद, बिना किसी संकोच और सवाल के। वहीं महिलाओं को सिखाया जाता है कि खुद को सीमित रखो, आंख मिलाने से बचो, अंधेरा होने से पहले घर लौट आओ।

मुंबई जैसे कुछ शहरों को छोड़ दें- जहां सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की मौजूदगी अपेक्षाकृत सामान्य मानी जाती है- तो आज भी भार के ज्यादातर शहर शाम छह-सात बजे बाद महिलाओं से खाली होने लगते हैं- अगर उनके साथ कोई पुरुष नहीं है तो। रात को अकेली महिला आज भी असामान्य, या उससे भी बदतर, एक निमंत्रण के जैसी मानी जाती है।

इसलिए जब सरकारें महिलाओं के लिए ‘पिंक टिकट’ यानी फ्री बस यात्रा जैसी योजनाएं शुरू करती हैं तो यह चैरिटी नहीं होती। यह फ्रीबी नहीं है। यह छोटा, किन्तु क्रान्तिकारी ऐलान है कि महिलाओं को भी आवाजाही का अधिकार है। उन्हें शहरों में रहने और नजर आने का हक है।

लेकिन सुरक्षा सिर्फ टिकट तक ही सीमित नहीं हो सकती। पर्याप्त रोशनी वाले बस स्टॉप, सीसीटीवी, महिला कंडक्टर, सुरक्षाकर्मी, पैनिक बटन और अंतिम छोर तक भरोसेमंद कनेक्टिविटी भी चाहिए। क्योंकि अकसर किसी महिला के लिए सबसे जोखिमभरा सफर बस स्टॉप से अकेले घर तक जाना होता है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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