मैंने पहली बार ‘वांगचुक’ नाम तब सुना था, जब मशहूर भारतीय फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ देखी थी। इसमें आमिर खान ने ‘फुंशुख वांगडू’ का किरदार निभाया था, जो सोनम वांगचुक से प्रेरित था।
.
मुझे पिछले हफ्ते इस्लामाबाद में डॉन मीडिया ग्रुप द्वारा आयोजित साउथ एशिया क्लाइमेट संगोष्ठी में सोनम वांगचुक से मिलने का मौका मिला। इस संगोष्ठी में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और अन्य देशों के जलवायु विशेषज्ञ एक मंच पर थे, जहां वे इस बढ़ते खतरे का समाधान तलाश सकते थे।

सोनम वांगचुक साउथ एशिया क्लाइमेट संगोष्ठी में शामिल हुए थे।
लद्दाख के सोनम वांगचुक एक इंजीनियर और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने अपने गृह नगर की पारिस्थितिकी को बचाने के लिए पिछले साल 16 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। उन्हें इस्लामाबाद की इस संगोष्ठी में इसलिए आमंत्रित किया गया था, क्योंकि उन्होंने पर्यावरण की रक्षा के लिए कुछ अनूठे आविष्कार किए हैं और जिनसे ‘थ्री इडियट्स’ के निर्माता भी प्रभावित हुए थे।
उनके आविष्कारों में बर्फीले स्तूप के आकार में कृत्रिम झरने बनाने की तकनीक शामिल है, जिनसे नदी के बहते पानी को संग्रहित किया जा सकता है और जिसका इस्तेमाल वसंत ऋतु में किसान सिंचाई के लिए कर सकते हैं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे इस्लामाबाद में वांगचुक से मिलने का सौभाग्य प्राप्त होगा।
दरअसल, मैं इस संगोष्ठी में अपने दो पुराने दोस्तों से मिलने आया था। निरुपमा सुब्रमण्यम (भारत) और महफूज अनाम (बांग्लादेश) पत्रकार हैं, लेकिन जलवायु व पर्यावरण संबंधी विषयों में उनकी गहरी दिलचस्पी है। निरुपमा कई वर्षों तक एक भारतीय अंग्रेजी अखबार की संवाददाता के रूप में इस्लामाबाद में कार्यरत रहीं। अब वे चेन्नई में काम करती हैं, जो खुद जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर संकटों का सामना कर रहा है।
इस संगोष्ठी में विश्व बैंक के विशेषज्ञ हमें बता रहे थे कि बढ़ते समुद्री जलस्तर की वजह से कराची, मुंबई, चेन्नई, कोच्चि, कोलकाता, चिटगांव और संपूर्ण मालदीव के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। कुछ विशेषज्ञ स्मॉग के मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे, तो कुछ बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों के पिघलने को लेकर चिंतित थे।
इस संगोष्ठी के एक सत्र में सोनम वांगचुक मंच पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की जलवायु परिवर्तन समन्वयक रोमीना खुर्शीद आलम के साथ बैठे थे। वांगचुक ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जलवायु परिवर्तन संबंधी पहलों की सराहना की। मैं दर्शकों के बीच बैठकर उनका भाषण सुन रहा था।
तभी निरुपमा ने मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा, ‘वांगचुक लद्दाख से आते हैं।’ मैंने तुरंत पूछा, ‘क्या ये थ्री इडियट्स वाले वांगचुक (फुंशुख वांगडू) हैं?’ निरुपमा मुस्कराई और ‘हां’ कहकर सिर हिलाया। फिर उन्होंने मुझे वांगचुक की हाल ही में की गई भूख हड़ताल के बारे में बताया।
वांगचुक ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने हमेशा भारत में अपनी सरकार की नीतियों को चुनौती दी है, लेकिन पाकिस्तान में वे अपने प्रधानमंत्री का बचाव कर रहे थे। पाकिस्तान की जीवनरेखा सिंधु नदी उनके ही गृह क्षेत्र से निकलती है और वे ग्लोबल वार्मिंग की समस्या का समाधान निकालने के लिए एक संयुक्त रणनीति का सुझाव दे रहे थे। उन्होंने कृत्रिम ग्लेशियरों के निर्माण का विचार प्रस्तुत किया और कहा, ‘यही हम लद्दाख में करते हैं।’
संगोष्ठी के एक अन्य सत्र में मीडिया की भूमिका और जलवायु परिवर्तन पर चर्चा की गई। इस सत्र का संचालन डॉन अखबार के संपादक जफर अब्बास ने किया। इसमें महफूज अनाम, निरुपमा सुब्रमण्यम, भारतीय पत्रकार सौमाश्री सरकार और नेपाली पत्रकार कनक मणि दीक्षित ने भाग लिया। सभी इस बात से सहमत थे कि मीडिया को पर्यावरण संबंधी मुद्दों को प्राथमिकता देनी चाहिए और दक्षिण एशिया को बचाने के लिए साहसिक जलवायु पत्रकारिता को बढ़ावा देना चाहिए।
मैंने महसूस किया कि भारत और पाकिस्तान की सरकारों के बीच तनाव के बावजूद दोनों देशों के कुछ ‘इडियट’ पत्रकार अपने क्षेत्र की जलवायु को बचाने के लिए एक साथ काम करने के लिए तैयार हैं। वर्ल्ड बैंक और यूनिसेफ के कुछ अधिकारियों ने मुझे बताया कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में शामिल होने का वादा किया था, लेकिन जब उन्हें पता चला कि खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री अली अमीन गंडापुर को भी आमंत्रित किया गया है तो उन्होंने आने से इनकार कर दिया।
गंडापुर, इमरान खान की पार्टी से ताल्लुक रखते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दक्षिण एशिया में जलवायु परिवर्तन को लेकर सहमति की सख्त दरकार है, लेकिन भारत और पाकिस्तान की सरकारें तो छोड़िए, पाकिस्तानी नेता भी साथ बैठना नहीं चाहते।
वर्ल्ड बैंक की वैश्विक जलवायु परिवर्तन निदेशक वैलेरी हिकी ने यह कहकर श्रोताओं को चौंका दिया कि सूखे के खतरे से निपटने के लिए दुनिया को हर दिन एक अरब डॉलर की जरूरत है। लेकिन हमारे पास जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए पर्याप्त धन नहीं है।
कराची, बादिन और ठट्टा जैसे शहरों को बढ़ते समुद्री जलस्तर से बचाने के लिए पाकिस्तान को 2050 तक हर साल कम से कम 40 अरब डॉलर की जरूरत होगी। क्या पाकिस्तानी सरकार इन हालात में भी आंतरिक और बाहरी झगड़ों को झेल सकती है? ऐसा लगता है कि सिर्फ ‘इडियट्स’ ही इस समस्या की गंभीरता को समझते हैं।
हमें सहयोग की जरूरत है, लेकिन हमारे शासक टकराव में अधिक रुचि रखते हैं। अच्छी बात यह है कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के ‘इडियट्स’ लोगों ने संवाद शुरू कर दिया है। हमें वांगचुक जैसे ‘इडि्यट्स’ की जरूरत है, जो हमारे नेताओं को यह मजबूर कर सकें कि वे अपनी कुर्सी बचाने के बजाय हवा और पानी को बचाने पर ध्यान दें।
————
ये कॉलम भी पढ़ें…








