9 घंटे पहले
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आज (27 अक्टूबर) पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि है। आज उन मृत लोगों का श्राद्ध किया जाएगा, जिनकी मृत्यु किसी महीने की प्रतिपदा तिथि पर हुई थी। पितृ पक्ष में पितरों के लिए श्राद्ध, धूप-ध्यान, पिंडदान, तर्पण, दान-पुण्य जैसे धर्म-कर्म करने की परंपरा है। इस साल 10 अक्टूबर तक पितृ पक्ष रहेगा।
घर-परिवार के मृत सदस्यों को पितर देवता माना जाता है। मान्यता है कि पितृ पक्ष में पितरों को याद करते हुए धूप-ध्यान करने से पितरों की कृपा मिलती है और घर-परिवार की नकारात्मकता दूर होती है और सुख-समृद्धि बनी रहती है।
पितृ पक्ष में श्राद्ध और धूप-ध्यान क्यों करना चाहिए?
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, शास्त्रों में इंसानों के लिए तीन ऋण बताए गए हैं- देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण।
- देव ऋण – भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य देवी-देवताओं की पूजा करने से देव ऋण उतरता है।
- ऋषि ऋण – साधु-संतों को दान-पुण्य करने से ऋषि ऋण उतरता है। पितृ पक्ष में साधु-संतों की संगत करनी चाहिए और सत्संग सुनना चाहिए। संतों के उपदेशों को जीवन में उतारने से यह ऋण उतरता है।
- पितृ ऋण – पितृ पक्ष में पितरों के लिए श्राद्ध, पिंडदान, धूप-ध्यान और तर्पण करने से पितृ ऋण उतरता है। एक साल में 12 अमावस्या तिथि आती है और इस तिथि पर भी पितरों के लिए धर्म-कर्म करना चाहिए। घर-परिवार के मृत सदस्यों यानी पितरों की आत्म शांति के लिए पितृ पक्ष में श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण जैसे धर्म-कर्म किए जाते हैं।
मान्यता- पितृ पक्ष में पितर देव आते हैं अपने कुटुंब के लोगों के घर
मान्यता है कि पितृ पक्ष में पितृ लोक से अपने कुटुंब के लोगों के घर आते हैं। इस दौरान हमारे द्वारा किए गए श्राद्ध और धूप-ध्यान से तृप्त होकर वे अपने धाम पितृ लोक लौट जाते हैं। जो लोग पितरों के लिए ये धर्म-कर्म नहीं करते हैं, उनके पितर देव अतृप्त रहते हैं और दुखी होकर पितृ लोक लौटते हैं। माना जाता है कि जिन लोगों के पितृ अतृप्त होते हैं, उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
अब जानिए कौन किसके लिए श्राद्ध कर्म कर सकता है?
- अगर किसी मृत व्यक्ति का कोई पुत्र नहीं है, तो उसके भाई-भतीजे, माता के कुल के लोग, मामा या ममेरा भाई या शिष्य भी श्राद्ध कर सकता है। इन रिश्तेदारों में से भी कोई न हो, तो कुल-पुरोहित या गुरु भी श्राद्ध कर सकते हैं।
- पिता के लिए श्राद्ध, पिंड दान और जल-तर्पण पुत्र-पुत्री को करना चाहिए। किसी व्यक्ति की संतान न हो, तो उसकी पत्नी श्राद्ध कर्म कर सकती है। पत्नी भी न हो, तो सगा भाई श्राद्ध कर सकता है। मृत महिला के लिए उसका पति या पुत्र श्राद्ध कर सकता है।
- माता-पिता कुंवारी मृत कन्या का श्राद्ध कर सकते हैं। शादीशुदा मृत बेटी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो, तो उसका पिता और पिता के घर-परिवार के योग उसका श्राद्ध कर सकते हैं।
- बेटी की मृत संतान के लिए उसके नाना और मृत नाना के लिए उनका नातिन श्राद्ध कर सकते हैं। मृत दामाद के लिए ससुर, मृत ससुर के लिए दामाद भी श्राद्ध कर सकते हैं। बहू अपनी मृत सास के लिए श्राद्ध कर सकती है।








