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- N Raghuraman Column | Weekend Sunday Spoilt Blame TIM Sudhir Agarwal
28 मिनट पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
शुक्रवार रात 9:10 बजे थे। मैं उसी शाम मिली नई किताब के कुछ पन्ने पढ़ने की तैयारी में था और जल्दी सोने की सोच रहा था। ठीक तभी मेरे फोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ इस अखबार और पूरे डीबी कॉर्प ग्रुप के मालिक सुधीर अग्रवाल थे।
उन्होंने मुझे कुछ काम बताकर उसकी टाइम-लाइन दी। मैंने कहा कि ‘चिंता मत कीजिए, यह हो जाएगा, क्योंकि मैं उन व्यक्ति को जानता हूं।’ उन्होंने धन्यवाद कहा और उनकी अगली लाइन थी कि ‘काम की प्रगति को लेकर मुझे वॉट्सएप पर अपडेट करते रहना।’
किसी भी अच्छे एम्प्लॉयी की तरह मैं भी बताए गए काम को पूरा करने में जुट गया। बदकिस्मती से जिन टॉप व्यक्ति से मुझे वह काम करवाना था, उन्होंने मेरा फोन नहीं उठाया। हायरार्की में उनसे निचले पद की महिला अधिकारी, जिनका नाम मैंने सुधीर जी के सामने लिया था, उन्होंने जॉब छोड़ कर डब्ल्यूएचओ जॉइन कर लिया था।
डब्ल्यूएचओ की उन महिला से बातचीत के दौरान सुधीर जी का कॉल आया। मैंने वापस फोन किया, लेकिन उनका फोन अन-रीचेबल था। मैंने पूरी प्रगति बताते हुए मैसेज ड्रॉप किया और बेड पर जाकर किसी बच्चे की तरह सो गया। शनिवार को मेरे रोजमर्रा के काम थे, जो मैंने दोपहर 3 बजे तक पूरे कर लिए। फिर मैंने शुक्रवार रात 9:45 बजे अधूरा छोड़ा गया काम फिर से उठाया और करने लगा।
अब कल्पना कीजिए कि शुक्रवार या शनिवार शाम ऑफिस से जाते वक्त रिसेप्शन पर आपका सामना अपने बॉस से हो जाता है। वे जल्दबाजी में कहते हैं कि ‘मैं मौजूदा घटनाक्रम को लेकर थोड़ा डिस्टर्ब हूं, सोमवार की सुबह हम सबसे पहले इसी पर बात करते हैं’ और वे कार में बैठकर चले जाते हैं।
सब कुछ इतना जल्दी हुआ कि आप यह तक नहीं कह पाए कि सोमवार को घरेलू काम के लिए ऑफ लेने का प्लान कर रहे हैं। अब आगे क्या होता है? आप भी घर चले जाते हैं, लेकिन अब तक अच्छा चल रहा आपका दिन धीरे-धीरे खराब होने लगता है। मूड बदल जाता है।
कुछ लोग सो नहीं पाते और सोचते रहते हैं कि आखिर उनके बॉस को कौन-सी चीज परेशान कर रही है और उस परेशानी के लिए वो खुद कैसे जिम्मेदार हो सकते हैं। इस सोच का नतीजा सिर्फ यह नहीं होता कि उनका वीकेंड या संडे खराब हो जाता है, बल्कि इससे मंडे-ब्लूज भी शुरू हो जाता है।
नया हफ्ता शुरू होने से पहले ही वे थके हुए नजर आ सकते हैं। क्यों? विलेन है ‘TIM’ (थॉट-इन्फ्लुएंस्ड माइंडसेट)। ऐसी परिस्थितियों में TIM हावी हो जाता है और हमारे दिन को खराब करने की एकमात्र वजह बन जाता है। सोच रहे हैं कैसे? रिसर्च के निष्कर्ष यहां पेश हैं।
दोनों ही मामलों में हमारे बॉस ने जो कहा, वह सामान्य और वास्तविक था। लेकिन उनके इर्दगिर्द जो कहानी हम अपने मन में बनाते हैं, वह हमारी अपनी होती है और जरूरी नहीं कि वह सच हो। कुछ बातचीत हमारे एक शब्द बोलने से पहले ही शुरू हो जाती है। वे उस अर्थ से शुरू होती हैं, जो हम पहले ही अपने दिमाग को बता चुके हैं। शायद हमें पहले उस बातचीत को बदलने की जरूरत है, जो पहले से हमारे भीतर चल रही है।
यह बहुत कुछ वैसा ही है, जैसे शादी के बाद बेटी दूसरे शहर चली जाती है। धीरे-धीरे वह अपने पिता से हर बात शेयर करना बंद कर देती है। पिता अपने मन में एक कहानी बनाने लगते हैं। कहानी नंबर 1. अब उसे मेरी जरूरत नहीं है। 2. शायद मैंने कुछ गलत तो नहीं कर दिया।
पिता ने TIM को इस तथ्य पर हावी होने दिया कि उनकी बेटी अब उतने फोन नहीं करती, जितने कॉलेज के दिनों में करती थी। TIM ने इस तथ्य की व्याख्याएं दीं और पिता ने उस कहानी पर प्रतिक्रिया देना शुरू किया, जो उन्होंने अपने विचारों से बनाई थी। इस मामले में उनकी बेटी कहीं नहीं जा रही थी। वह नई नौकरी, नए शहर और नई जिंदगी के साथ तालमेल बैठा रही थी।
फंडा यह है कि जब कोई घटना हो तो मन को उसका अर्थ तय करने की इजाजत न दें। वह अर्थ हमारी प्रतिक्रिया को आकार देने लगता है। तथ्य का सीधे सामना करेंगे तो TIM दूर रहेगा।








