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पूजा-पाठ करते समय भगवान की परिक्रमा करने की परंपरा है, इसे प्रदक्षिणा भी कहते हैं। मंदिरों में आप अक्सर देखेंगे कि लोग मूर्ति के चारों ओर घूमते हैं। इस परंपरा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा बताते हैं कि शास्त्रों के अनुसार प्रदक्षिणा करने से हमारे पुराने पाप धुल जाते हैं और अक्षय पुण्य मिलता है। ऐसा पुण्य, जिसका शुभ असर जीवनभर बना रहता है। यह एक ऐसा तरीका है जिससे मन और शरीर दोनों शुद्ध होते हैं। अगर इसे विज्ञान की नजर से देखें तो परिक्रमा करने से भगवान की मूर्ति और मंदिर में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा से हमारे शरीर को भी सकारात्मक ऊर्जा मिलती है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं, विचारों में पवित्रता आती है और ईश्वर के प्रति समर्पण भाव जागता है। जब हम मंदिर या मूर्ति के चारों ओर घूमते हैं, तो हमारे हमारी ऊर्जा संतुलित होती है। दाएं हाथ की ओर से करनी चाहिए परिक्रमा परिक्रमा हमेशा दाहिने हाथ (सीधा हाथ) की तरफ से शुरू करनी चाहिए। दाहिने हाथ की तरफ से चलने को भी प्रदक्षिणा कहा जाता है, क्योंकि दक्षिण दिशा को दाहिना माना गया है। यही वजह है कि जब भी आप किसी मंदिर में जाएं, हमेशा दाहिने हाथ से ही परिक्रमा शुरू करें। परिक्रमा की संख्या अलग-अलग देवताओं के लिए परिक्रमा की संख्या अलग बताई गई है, जैसे- शिवजी के लिए केवल आधी परिक्रमा का नियम है। इसका कारण यह माना जाता है कि शिव जी के मंदिर में जलधारी (पानी की धार) को पार करना नहीं चाहिए। जब आप जलधारी तक पहुंच जाते हैं, तब परिक्रमा पूरी मान ली जाती है। परिक्रमा करते समय बोलें ये मंत्र शास्त्रों में एक मंत्र बताया गया है- “यानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च। तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे।।” इसका मतलब है कि हमारे जाने-अनजाने में किए गए पाप और पिछले जन्मों के पाप प्रदक्षिणा के साथ-साथ नष्ट हो जाएं। साथ ही यह हमारे मन को शुद्ध करता है और भगवान हमें सही सोच और बुद्धि प्रदान करें, यह कामना करता है। परिक्रमा का तरीका
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