पेरेंटिंग- बच्चा पटाखों की जिद करता है:  दोस्तों को देखकर महंगे खिलौनों की डिमांड करता है, उसे कैसे समझाएं
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पेरेंटिंग- बच्चा पटाखों की जिद करता है: दोस्तों को देखकर महंगे खिलौनों की डिमांड करता है, उसे कैसे समझाएं

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8 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल

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सवाल- मैं नई दिल्ली से हूं। मेरा 8 साल का बेटा है। वह पढ़ने-लिखने में काफी अच्छा है। दिवाली का त्योहार नजदीक है। इस मौके पर उसके ज्यादातर दोस्त पहले से ही पटाखे और खिलौने खरीद रहे हैं। वे उसे स्कूल या पार्क में रोज अपने खिलौने और पटाखे दिखाते हैं और गर्व से बताते हैं कि “मेरे पापा ने ये सब खरीदे हैं।” इन्हें देखकर मेरा बेटा भी अब जिद करने लगा है कि उसे भी ढेर सारे पटाखे और खिलौने चाहिए। मैंने उसे प्यार से समझाने की कोशिश की कि पटाखे सेहत और पर्यावरण, दोनों के लिए नुकसानदायक हैं और खिलौनों पर ज्यादा पैसे नहीं खर्च करने चाहिए। लेकिन वह कहता है, “जब मेरे दोस्तों के पापा उन्हें दिला सकते हैं, तो आप क्यों नहीं?” सच यह है कि मेरी आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। इसलिए उसकी सभी इच्छाएं पूरी करना मेरे लिए संभव नहीं है। ऐसे में मैं उसे कैसे समझाऊं कि दूसरों की नकल करना अच्छी बात नहीं है? कृपया मार्गदर्शन करें।

एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

जवाब- आपने बहुत महत्वपूर्ण सवाल किया है। दिवाली जैसे त्योहार पर बच्चे अक्सर दोस्तों की चीजों को देखकर जिद करने लगते हैं। यह एक आम समस्या है, लेकिन यहां समझने वाली बात ये है कि बच्चा बाहर की दुनिया से तभी ज्यादा प्रभावित होता है, जब घर में उसका लगाव कम होता है। अगर वह आपसे ज्यादा अटैच्ड होगा तो बाहरी दुनिया की ओर कम आकर्षित होगा।

ऐसे में सबसे पहले आपको अपने बच्चे के साथ जुड़ने की जरूरत है। इससे ही बच्चा जिद छोड़कर वैल्यू को समझेगा। अब मैं अपने जवाब की शुरुआत एक क्लासिक फिल्म की कहानी से करना चाहती हूं, जो इस मुद्दे को खूबसूरती से दर्शाती है।

फिल्म ‘घर-घर की कहानी’ से मिलती है सीख

दिग्गज दिवंगत अभिनेता बलराज साहनी की एक बहुत सुंदर फिल्म है– ‘घर घर की कहानी’। ये फिल्म साल 1970 में रिलीज हुई थी। फिल्म में शंकरनाथ (बलराज साहनी) एक ईमानदार और मेहनती सरकारी कर्मचारी के किरदार में हैं। शंकरनाथ के बच्चे, राजू और उसके भाई-बहन महंगी चीजों की जिद करते हैं और अपने पिता को कंजूस समझते हैं क्योंकि वह उनकी सभी मांगें पूरी नहीं कर पाते।

बच्चे पड़ोसी के अमीर बच्चों को देखकर तुलना करते हैं और घर में पिता से असंतोष व्यक्त करते हैं। बच्चों की जिद से परेशान होकर शंकरनाथ एक अनोखा समझौता करते हैं। वह राजू को अपनी 6 महीने की सैलरी पर घर चलाने की जिम्मेदारी सौंप देते हैं, इस शर्त के साथ कि अगर वह पैसे बचा पाया तो उनकी इच्छाएं पूरी की जाएंगी। राजू खुशी-खुशी ये स्वीकार कर लेता है।

बजट संभालते ही बच्चों को जल्द ही बचत करने की चुनौती और पैसे की सही कीमत का एहसास हो जाता है। वे अपनी मनचाही चीजें खरीदने और पैसे बचाने के लिए नौकरानी को हटाकर घर के कामों में हाथ बंटाना शुरू करते हैं और अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव लाते हैं। उन्हें समझ आता है कि सीमित पैसों में घर चलाना कितना मुश्किल है। मां की बीमारी पर महंगी दवाइयां खरीदने या दिवाली पर बिन बुलाए मेहमानों जैसी मुश्किलों का सामना करने पर उन्हें यह सीख मिलती है कि कम बजट को समझदारी से मैनेज करना कितना कठिन और जिम्मेदारी भरा काम है। अंत में बच्चे पिता की ईमानदारी और मेहनत की कद्र करते हैं।

इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि बच्चों को सिखाने का तरीका हमेशा हेल्दी होना चाहिए। बच्चे को डांटकर या मना करके नहीं, बल्कि उन्हें जिम्मेदारी देकर और इन्वॉल्व करके भी समझाया जा सकता है। इससे वे बाहर की चकाचौंध से हटकर घरेलू मूल्यों को अपनाते हैं।

अब आइए, आपके सवाल पर आते हैं। इसके लिए सबसे पहले हमें बच्चे की जिद और नकल की मुख्य वजहों को समझना जरूरी है।

इन कारणों को आइडेंटिफाई करने के बाद बच्चे को समझाना आसान हो जाएगा। छोटे बच्चों में समझदारी नहीं होती, वे दूसरे बच्चों को देखकर स्वाभाविक रूप से पटाखों और खिलौनों की जिद करते हैं। लेकिन 8 साल के बच्चे में धीरे-धीरे सोचने-समझने की क्षमता होती है। ऐसे में उन्हें आसानी से समझाया जा सकता है।

दिवाली पर बच्चे की जिद ऐसे करें दूर

इसके लिए दिवाली के दिन पेरेंट्स हर एक चीज में खुद इन्वॉल्व हों और बच्चों को भी इसमें शामिल करें, जिससे वे बाहरी चकाचौंध में न फंसें। घर में मिठाई बन रही है तो उसमें बच्चों को शामिल करें। घर के डेकोरेशन में भी बच्चों को इन्वॉल्व करें।

उनको अथॉरिटी दें, अकाउंटबिलिटी दें। काम अच्छा करें तो शाबाशी भी दें। इससे जुड़ाव बढ़ेगा और जिद कम होगी। मेरा सुझाव है कि जिद को दबाने की बजाय, बच्चे को वैकल्पिक खुशियां और जिम्मेदारियां देकर समझाएं। इसके लिए कुछ तरीके अपना सकते हैं।

आइए, अब इन पॉइंट्स को थोड़ा विस्तार से समझते हैं।

जिद की असली वजह समझें

बच्चे की जिद अक्सर सिर्फ ‘मनमानी’ नहीं होती है। यह दोस्तों, सोशल मीडिया या घर में कनेक्शन की कमी के कारण हो सकती है। इसलिए पहले यह समझना जरूरी है कि वह क्यों ऐसा चाहता है।

उदाहरणों से सही-गलत समझाएं

फिल्मों, कहानियों या रोजमर्रा की घटनाओं के माध्यम से बच्चे को यह बताएं कि क्या सही है और क्या गलत। उदाहरण के जरिए बच्चे जल्दी सीखते हैं और समझ पाते हैं।

पटाखों के नुकसान के बारे में बताएं

बच्चों को बताएं कि पटाखे स्वास्थ्य और पर्यावरण, दोनों के लिए नुकसानदायक हैं। प्रदूषित हवा, ध्वनि प्रदूषण, चोट और एलर्जी का खतरा समझाएं।

खर्च और बचत का महत्व सिखाएं

बच्चों को सीमित संसाधनों में संतुलन बनाना, जरूरत और इच्छा के बीच अंतर समझाना जरूरी है। उनमें जरूरत के अनुसार पैसे खर्च करने और बचत करने की आदत डालें।

आर्थिक स्थिति समझाएं

अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सरल शब्दों में समझाएं। यह बच्चों को सिखाता है कि हर चीज आसानी से नहीं मिलती और सीमित संसाधनों का सही इस्तेमाल जरूरी है।

दिवाली की तैयारियों में शामिल करें

मिठाई बनाना, घर सजाना, गिफ्ट पैक करना जैसे कामों में बच्चे को शामिल करें। यह उन्हें त्योहार का हिस्सा बनाता है और जिद को कम करता है।

हर चीज में खुद इन्वॉल्व हों

माता-पिता भी बच्चों के साथ काम करें। यह दिखाता है कि योगदान परिवार का साझा काम है और बच्चे घर में जुड़े रहते हैं।

अथॉरिटी और अकाउंटबिलिटी दें

छोटे-छोटे कामों की जिम्मेदारी बच्चे को दें। जैसे घर सजाना, मिठाई बनवाने में सहयोग करना। जिम्मेदारी से बच्चे को अपने योगदान का अहसास होता है।

अच्छे काम व व्यवहार पर तारीफ करें

जब बच्चा जिम्मेदारी निभाए, उसकी मेहनत और व्यवहार की तारीफ करें। यह सकारात्मक व्यवहार को बढ़ावा देता है और जिद को धीरे-धीरे कम करता है।

कमी का अहसास न होने दें

सीमित संसाधनों में भी खुशी और उत्सव का अनुभव दें। बच्चे को लगे कि त्यौहार में हिस्सा लेने से उसकी खुशी कम नहीं होती है।

घर का माहौल खुशहाल रखें

परिवार में प्यार, सहयोग और हंसी-मजाक का माहौल बनाएं। सुरक्षित और खुशहाल माहौल में बच्चे जिद कम करते हैं और सकारात्मक व्यवहार अपनाते हैं।

बच्चे को परिवार में वैल्यू दें

उनके विचार और राय की इज्जत करें। यह उन्हें परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा महसूस कराता है और उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ाता है।

काउंसलर से बात करें

अगर जिद बहुत बढ़ जाए या समझाने में मुश्किल हो तो चाइल्ड काउंसलर की मदद लेने में संकोच न करें। यह बच्चे और माता-पिता दोनों के लिए मददगार होता है।

बच्चों के साथ न करें ये गलतियां

कभी-कभी पेरेंट्स बच्चे की जिद से परेशान होकर जाने-अनजाने में कुछ गलतियां कर बैठते हैं, जो बच्चे को और जिद्दी बनाती हैं। इसलिए पेरेंट्स को कुछ बातों का विशेष ख्याल रखना चाहिए।

अंत में यही कहूंगी कि बच्चे माता-पिता को देखकर ही सीखते हैं। इसलिए आप अपने बच्चे के साथ ज्यादा समय बिताएं, उसे घरेलू कामों और दिवाली की तैयारियों में शामिल करें। इससे उसका घर से लगाव बढ़ेगा, बाहर की नकल की आदत कम होगी और वह खुद समझेगा कि असली खुशी पटाखों या महंगे खिलौनों में नहीं, बल्कि परिवार की एकता, जिम्मेदारी और पर्यावरण की रक्षा में है। धैर्य रखें, प्यार से मार्गदर्शन करें। जल्द ही सकारात्मक बदलाव दिखेगा।

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