16 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल
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सवाल- मैं बेंगलुरु से हूं। मेरी 7 साल की बेटी हाल ही में लिपस्टिक, नेलपॉलिश और फैंसी हेयर क्लिप जैसी चीजों की जिद करने लगी है। शुरू में मुझे लगा कि वह बस खेलने के लिए चाहती है। लेकिन जब मैंने उससे पूछा तो बताया कि उसने यूट्यूब पर बच्चों के मेकअप वीडियो देखे हैं और उसकी कुछ फ्रेंड्स भी स्कूल में मेकअप करके आती हैं। बात ही बात में उसने मेरी ओर भी इशारा किया कि ‘आप भी कहीं जाती हो तो मेकअप करके ही जाती हो’। इसलिए वह भी रोजाना मेकअप करके स्कूल जाना चाहती है ।
मैं समझ नहीं पा रही कि यह उसकी मासूम जिज्ञासा है या सोशल प्रेशर की वजह से समय से पहले बड़ी हो रही सोच का संकेत है। मैं चाहती हूं कि मेरी बेटी अपनी नेचुरल खूबसूरती और आत्मविश्वास को अपनाए। मैं उसे कैसे समझाऊं? कृपया मेरी मदद करें।
एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर
जवाब- आपने बिल्कुल सही समय पर यह सवाल किया है। जिस तरह आपने इसे सिर्फ बच्ची की एक मासूम जिद नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे सामाजिक प्रभाव और सोच को समझा, यह एक जागरूक और संवेदनशील पेरेंट की पहचान है।
दरअसल इस उम्र में बच्चे बहुत तेजी से अपने आसपास के माहौल को अब्जॉर्ब करते हैं। वहीं आजकल तो बच्चे यूट्यूब और सोशल मीडिया की दुनिया में पल-बढ़ रहे हैं, जहां उन्हें मेकअप, फैशन और ग्लैमर से जुड़े कंटेंट लगातार दिखते रहते हैं। इसका सीधा असर उनकी सोच, पसंद-नापसंद और सेल्फ इमेज पर पड़ता है।
हालांकि ऐसे समय में बच्ची को डांटने या रोकने-टोकने के बजाय प्यार, धैर्य और समझदारी से सही दिशा देना बहुत जरूरी है। ताकि वह आत्मविश्वास के साथ बड़ी हो सके। इसके लिए सबसे पहले यह समझें कि बच्ची पर किस चीज का प्रभाव ज्यादा पड़ रहा है।

ऊपर ग्राफिक में दिए पॉइंट्स से अब आप ये समझ ही गई होंगी कि बच्ची पर किन चीजों का असर पड़ा है। कई बार घर के माहौल में भी मेकअप और लुक्स को ज्यादा अहमियत दी जाती है, जिससे बच्चे अपनी नेचुरल खूबसूरती और आत्मविश्वास को नजरअंदाज करने लगते हैं। बच्चे को इससे बचाने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखें।
बच्चे की असली खूबसूरती की तारीफ करें
बच्चों को अक्सर तब ही कॉम्प्लिमेंट किया जाता है, जब वे अच्छे कपड़े पहनते हैं या तैयार दिखते हैं। जैसे ‘आज तो बहुत सुंदर लग रही हो’। इससे धीरे-धीरे बच्चे यह मानने लगते हैं कि अच्छा दिखना ही तारीफ पाने का सबसे आसान तरीका है।
इस सोच को बदलने के लिए जरूरी है कि आप बच्ची की मुस्कान, उसके सवाल पूछने की जिज्ञासा, दूसरों की मदद करने का भाव या ईमानदारी जैसे व्यवहारों की तारीफ करें। ऐसे कॉम्प्लिमेंट्स बच्ची को दिखावे से हटाकर उसके अंदर की अच्छाई से जोड़ते हैं। इससे बच्ची को समझ में आता है कि उसकी वैल्यू उसके कपड़ों, मेकअप या हेयर क्लिप से नहीं, उसके व्यवहार और सोच से तय होती है। इसलिए बच्ची के सभी अच्छे कामों पर उसकी तारीफ करें। उसे यह भरोसा दिलाएं कि ‘तुम जैसी हो, वैसी ही सबसे खास हो।’

डिजिटल कंटेंट देखने की सीमाएं तय करें
बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना आज के दौर में संभव नहीं है। लेकिन क्या और कितनी देर देखा जाए, यह हम जरूर कंट्रोल कर सकते हैं। छोटे बच्चे जब यूट्यूब या इंस्टाग्राम रील्स देखते हैं तो वे उसमें दिखाई गई हर चीज को सच मानते हैं। इसलिए उन्हें किड्स-फ्रेंडली, एज-एप्रोप्रिएट कंटेंट दिखाएं। स्क्रीन टाइम को 30–45 मिनट की लिमिट में बांधें और बीच में ब्रेक दें। जब वह कुछ नया देखे तो साथ बैठें और पूछें कि ‘तुम्हें इसमें क्या अच्छा लगा?’
अगर वह किसी वीडियो से प्रभावित हो रहे हैं तो उन्हें उसकी सच्चाई बताएं। जैसेकि ‘ये शूटिंग और एक्टिंग है, असल जिंदगी में ऐसा हर दिन नहीं होता है।’ इससे बच्चा तर्क के साथ सोचना सीखेगा।

उसके रोल मॉडल बदलें
बच्चों की सोच और आत्म-छवि इस बात पर बहुत हद तक निर्भर करती है कि वे किन किरदारों को देखकर बड़े हो रहे हैं। आजकल यूट्यूब इन्फ्लुएंसर, किड्स स्टार्स या ग्लैमर से भरे कैरेक्टर उनके नए ‘रोल मॉडल’ बनते जा रहे हैं, जो ज्यादातर लुक्स, मेकअप और स्टाइल पर फोकस करते हैं।
ऐसे माहौल में पेरेंट्स की भूमिका और भी अहम हो जाती है। जरूरी है कि आप अपने बच्चे को ऐसे रोल मॉडल से जोड़ें, जो सिर्फ दिखने में सुंदर न हों, बल्कि समझदार, आत्मविश्वासी, संवेदनशील और बहादुर भी हों। उदाहरण के लिए, मलाला यूसुफजई, कल्पना चावला, मैरी कॉम जैसी हस्तियों की कहानियां, जीवनी या उनसे जुड़ी डॉक्यूमेंट्रीज बच्ची को दिखा सकती हैं। इससे उन्हें असली सुंदरता के बारे में पता चलेगा।
खुद को उदाहरण बनाएं
अगर मां हर समय खुद को लेकर बातें करती है, जैसे ‘मोटी लग रही हूं’, ‘आईब्रो नहीं बनी’, ‘क्रीम नहीं लगाई’ तो बच्ची के मन में यह संदेश जाता है कि सुंदरता ही सबसे जरूरी चीज है। वह यह मानने लगती है कि अच्छा दिखना ही महिला होने की सबसे बड़ी पहचान है। ये बात अनजाने में उसके सेल्फ वैल्यू को सिर्फ लुक्स से जोड़ देती है।
वहीं पापा घर में अक्सर सजने-संवरने पर ही मम्मी की सुंदरता की तारीफ करते हैं तो बच्ची के लिए सुंदरता की परिभाषा और भी सीमित हो जाती है। इसलिए यह जरूरी है कि माता-पिता बच्ची के सामने जो बातें करें, वे आत्मविश्वास और संतुलन से भरी हों।
उसे बताएं कि हर चीज की एक उम्र होती है
बच्चों को हर चीज अभी और तुरंत चाहिए होती है। लेकिन पेरेंट्स काे चाहिए कि उन्हें ये सिखाएं कि हर चीज का अपना सही समय होता है। जब बच्ची बार-बार कहे कि ‘मुझे भी लिपस्टिक चाहिए’ तो उसे डांटने या मना करने के बजाय उदाहरण देकर समझाएं। जैसे ‘देखो, हमारे घर में जो छोटा बेबी है, वो स्कूल नहीं जाता ना? लेकिन तुम जाती हो। क्योंकि स्कूल जाने की उम्र तुम्हारी है, उसकी नहीं। वैसे ही कुछ चीजें तब की होती हैं जब हम थोड़े और बड़े हो जाते हैं।’
अंत में यही कहूंगी कि 5-8 साल के बच्चे अपने आसपास के माहौल को देखकर-सुनकर ही सबकुछ सीखते हैं। अगर उन्हें हर बार सिर्फ उनकी शक्ल-सूरत के लिए तारीफ की जाती है तो वह यकीन करने लगते हैं कि सुंदर दिखना ही सबसे जरूरी है। लेकिन अगर हम उसकी सोच, समझदारी, व्यवहार और संवेदनशीलता की तारीफ करेंगे तो वह सीखेंगे कि असली सुंदरता बाहर नहीं, अंदर होती है। इसलिए माता-पिता की जिम्मेदारी है कि बच्चे को हेल्दी माहौल दें।
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दरअसल जो बच्चे पढ़ाई में अच्छे होते हैं, वे अक्सर परफॉर्मेंस प्रेशर और परफेक्ट होने की चाह से घिरे रहते हैं। यही वजह है कि वे गलती करने से डरते हैं क्योंकि वे दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का दबाव महसूस करते हैं। इसका असर उनके बोलने, अपनी राय रखने और सामने आने पर पड़ता है। पूरी खबर पढ़िए…








