पैरेंटिंग में अब परफेक्शन नहीं संवेदनशीलता जरूरी:  बच्चों से पहले खुद भी थोड़े बड़े हों; हर डांट बच्चे के मन पर कुछ लिख जाती है
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पैरेंटिंग में अब परफेक्शन नहीं संवेदनशीलता जरूरी: बच्चों से पहले खुद भी थोड़े बड़े हों; हर डांट बच्चे के मन पर कुछ लिख जाती है

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भागदौड़ भरे इस दौर में बच्चों का लालन-पालन कैसा हो? अक्सर पढ़ाई, करियर या अनुशासन मानक के तौर पर देखे जाते हैं। पर अब माता-पिता की भावनात्मक परिपक्वता भी अहम मानी जा रही है। मनोवैज्ञानिक डॉ. लिंडसे गिब्सन अपनी नई किताब ‘हाऊ टु रेज एन इमोशनली मैच्योर चाइल्ड’ में कहती हैं कि बच्चों को स्वस्थ और खुश इंसान बनाने की शुरुआत माता-पिता की समझ से होती है। बच्चों की क्षमता और सीमाएं समझ लें तो पैरेंटिंग का तनाव कम हो सकता है। ये कैसे होगा? डॉ. गिब्सन से जानिए… बच्चा हर उम्र में दुनिया को अलग तरह से समझता है। उसे प्रतिक्रिया भी उसी हिसाब से चाहिए होती है। वे भी उतना ही अपमान, उपेक्षा या शर्मिंदगी महसूस करते हैं, जितना कोई बड़ा। फर्क सिर्फ इतना है कि वे कह नहीं पाते। बच्चा खामोशी से ये सब झेलते हुए आत्म-छवि गढ़ता रहता है। वह मानने लगता है कि शायद उसमें कोई कमी है। – गलती के अहसास पर माफी मांगें जीवन की शुरुआत में आप बच्चे के साथ गलत रवैया अपना चुके हैं, तो अब भी देर नहीं हुई। माता-पिता अगर गलती स्वीकार कर माफी मांगें, तो बच्चे की आत्म-छवि बदल सकती है। मैंने अपने बेटे के बड़े होने पर उससे उन बातों के लिए माफी मांगी, जहां मैं जरूरत से ज्यादा कठोर थी। इससे उसके मन में ‘मैं गलत हूं’ के बजाय ये समझ बनी कि ‘मेरे साथ गलत हुआ था’। यही भावनात्मक मरम्मत बच्चे के भीतर जमा पुराना बोझ हल्का कर सकती है। – परफेक्ट बनने की जरूरत नहीं जरूरी नहीं कि हमेशा भावनात्मक परिपक्वता दिखे। तनाव, बीमारी या थकान में व्यक्ति कैसी भी प्रतिक्रिया दे सकता है। लेकिन, फर्क इससे पड़ता है कि आप बाद में उसे समझ पाते हैं या नहीं। परफेक्ट पैरेंट्स बनने की जरूरत नहीं है। जरूरी ये है कि बच्चा महसूस करे कि उसकी भावनाएं देखी और समझी जा रही हैं। वह उत्साह से कुछ बताने आए और माता-पिता व्यस्त हैं, तो अनसुना करने के बजाय कहें- ‘मैं सुनना चाहता हूं, पर अभी ध्यान नहीं दे पा रहा। बाद में बात करेंगे।’ यह उसे एहसास देगा कि उसकी भावनाएं मायने रखती हैं। वरना वह मान सकता है कि खुशी या उत्साह साझा करना सुरक्षित नहीं है। – अनुशासन जरूरी, अपमान नहीं इन सब बातों का मतलब ढील देना बिल्कुल भी नहीं है। बच्चों को सीमाएं, नियम और जिम्मेदारी सिखाना जरूरी है। लेकिन गलती पर सिर्फ चिल्लाना या मारना बच्चे को सीखने के बजाय अपमानित महसूस कराता है। किशोरों के मामले में बात का लहजा अहम होता है। पार्टी के लिए रोकते वक्त सिर्फ आदेश के बजाय कारण समझाएं। संभव है कि किशोर तब सहमत न हो, पर ये बातें उसके विवेक का हिस्सा बनती हैं। – कैसे पहचानें कि बच्चा भावनात्मक रूप से स्वस्थ है क्या बच्चे के भीतर ‘रोशनी’ बची है? क्या उसमें खुशी, जिज्ञासा और ऊर्जा है? भावनात्मक परिपक्वता सिर्फ आत्मनियंत्रण नहीं, बल्कि सहानुभूति, आत्मचिंतन और अपने व्यवहार पर दोबारा सोचने की क्षमता भी है। बच्चा खुद माफी मांग पाता है, तो यह भावनात्मक स्वास्थ्य का मजबूत संकेत है।



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