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10 घंटे पहले
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प्रियदर्शन लेखक और पत्रकार
4 सितम्बर को संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया का नया नक्शा मंजूर किया। इस पर मतदान में 164 देशों ने मुहर लगाई, छह देश मतदान से अलग रहे, जबकि अमेरिका ने विरोध में मत दिया। भारत ने भी इस नक्शे के पक्ष में वोट दिया। लेकिन अब यह बात सामने आ रही है कि इस नक्शे में भारतीय राष्ट्र-राज्य की सीमारेखाओं के साथ छेड़छाड़ है।
असम से लगती अरुणाचल प्रदेश की दक्षिणी सीमा को ‘चीनी रेखा’ की तरह दिखाया गया है और नगालैंड-असम के बीच की रेखा गुम है। वहीं तिब्बत को भारतीय रेखा में दिखाया गया है। चीन ने भी इस नक्शे को मंजूरी दी है। भारत का कहना है कि वह समान-विश्व की भावना के साथ है और इसी के अनुरूप नक्शे का समर्थन किया है। लेकिन यह विवाद बताता है कि दुनिया का नक्शा बनाना आसान नहीं है।
वैसे भी धरती गोल है और रेखाविहीन है। दरअसल अब तक दुनिया का जो नक्शा चल रहा था, उसे सोलहवीं सदी में नक्शानवीस गेरार्डस मेर्काटर ने समुद्री यात्राओं को ध्यान में रखते हुए बनाया था। इस नक्शे में अफ्रीका एक-तिहाई छोटा है।
यूरोप, उत्तर अमेरिका, ग्रीनलैंड बड़े दिखाए गए हैं, जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया के देश भी अपने असल अनुपात से काफी कम जगह पा सके हैं। अफ्रीका में इस नक्शे को बदलने के लिए आंदोलन चला और अंततः संयुक्त राष्ट्र की आमसभा ने मतदान से नया नक्शा मंजूर कर लिया।
यह नया नक्शा 2018 में नॉर्थ अमेरिकन कार्टोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सोसाइटी की कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत “इक्वल अर्थ मैप’ है। इसमें यूरोप पहले के मुकाबले सिकुड़ा हुआ है, ब्राजील फूला हुआ है और ग्रीनलैंड जैसे गुम हो चुका है। अफ्रीका को इसमें पूरी नुमाइंदगी मिली है।
लेकिन इस पर हुए विवाद ने याद दिलाया है कि दुनिया का नक्शा बदलता रहा है। कागजों पर बना जो एटलस हमारे दिमाग में छपा हुआ है, वह भी बहुत पुराना नहीं है। हम बीसवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों के नक्शे से आज के नक्शे का मिलान करें तो हैरान रह जाएंगे कि दुनिया के ताकतवर मुल्क कहां चले गए और कौन-से नए मुल्क नक्शे में उठ खड़े हुए?
बीसवीं सदी के प्रारंभिक 15 वर्षों के नक्शे में सोवियत संघ नहीं था, जो अचानक दुनिया की बड़ी ताकत बना और आखिरी दशक आते-आते लुप्त भी हो गया। बीसवीं सदी के ही पहले चार दशकों तक पाकिस्तान नहीं था और सात दशकों तक बांग्लादेश नहीं था।
बीसवीं सदी के प्रारंभ में जो भारत था, उसकी सरहदें ईरान को छूती थीं। उसके पहले की शताब्दियों का कोई विश्व-यात्री पैदल चलता हुआ इस सदी में चला आए तो पहचान ही नहीं पाएगा कि जिस दुनिया से वह गुजरा था, वह कौन-सी थी।
यानी जिन सीमाओं को हम बिल्कुल ऐसे स्थायी मानते हैं, जैसे वे सभ्यता के उषाकाल से चली आ रही हों, वे दरअसल विकास के अलग-अलग दौर की राजनीतिक उथल-पुथल का परिणाम हैं। सभ्यताएं मुल्कों के राजनीतिक नक्शों से बड़ी और पुरानी होती हैं।
इंसानी सरोकार भी उस राजनीति से बड़े होते हैं, जो अकसर अपने स्वार्थों के लिए तमाम पहचानों का इस्तेमाल करती है और उन्हें आपस में लड़ाती भी है- फिर चाहे वे मुल्क हों या फिर मजहब हों। नया नक्शा बाध्यकारी नहीं है। यानी इसकी वजह से न मेर्काटर का मानचित्र मिटने वाला है, न पुराने ग्लोब तोड़े जाने हैं।
वे जहाजों की आवाजाही के लिहाज से अब भी कारगर हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र दुनिया भर की सरकारों, स्कूलों और अंतरराष्ट्रीय निकायों से अपील करने वाला है कि वे जब भी स्थानों की तुलना करें तो नए नक्शे के हिसाब से करें।
यानी अब हमारे पास दुनिया को देखने के दो चश्मे होंगे, जो याद दिलाते रहेंगे कि न तो दुनिया इकहरी है और न ही हमारी नजर इकहरी होनी चाहिए। लेकिन हमें इस नक्शे में अपने हिस्से सुरक्षित-स्वीकृत चाहिए, यह निर्विवाद है।
दुनिया का नक्शा बदलता रहा है। कागजों पर बना जो एटलस हमारे दिमाग में छपा हुआ है, वह भी बहुत पुराना नहीं है। वास्तव में अगर हम बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों के नक्शे से आज के नक्शे का मिलान करें तो हैरान रह जाएंगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








