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- Syed Ata Hasnain Column | SCO Summit Diplomacy India Strategy Analysis
8 घंटे पहले
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सैयद अता हसनैन बिहार के राज्यपाल और कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर
यूक्रेन में युद्ध जारी है, ईरान युद्ध ने खाड़ी क्षेत्र को झकझोर दिया है, समुद्री व्यापार अब भी असुरक्षित है और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था एक नए संतुलन की तलाश में है। ऐसे समय में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का महत्व इस बात में कम है कि उसके घोषणापत्र क्या कहते हैं और इस बात में अधिक है कि मेज के चारों ओर कौन बैठा है। इस बार की समिट में नरेंद्र मोदी के साथ व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग, मसूद पेजेश्कियान और मध्य एशिया के नेता मौजूद थे। भारत के लिए यह ठीक वही जगह थी, जहां उसे होना चाहिए था।
एससीओ भारत के लिए कभी भी पूरी तरह सहज रणनीतिक मंच नहीं रहा है। इसके आर्थिक ढांचे पर चीन का प्रभुत्व है; रूस का राजनीतिक प्रभाव अब भी बहुत है और पाकिस्तान की मौजूदगी इसमें भारत की भागीदारी को जटिल बनाती है। लेकिन इनमें से कोई भी बात इस संगठन के महत्व को कम नहीं करती।
यूरेशिया के भविष्य पर चर्चा करने वाली उन मेजों से दूर रहकर हम इस क्षेत्र की अग्रणी शक्ति बनने की आकांक्षा नहीं रख सकते। इसीलिए मोदी की पुतिन के साथ द्विपक्षीय बातचीत महत्वपूर्ण थी। रूस अब भी भारत का अहम रणनीतिक साझेदार है, भले ही भारत यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के लिए लगातार संवाद और कूटनीति की वकालत करता रहा हो।
समिट में शी जिनपिंग की मौजूदगी भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी, भले ही उनके साथ हमारी कोई औपचारिक द्विपक्षीय बैठक न रही हो। भारत और चीन अब भी प्रतिस्पर्धी हैं और सीमा विवाद अनसुलझा है, लेकिन वे दो प्राचीन सभ्यताएं, बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और ऐसे पड़ोसी भी हैं, जिनके हित पूरे एशिया में एक-दूसरे से जुड़े हैं।
ऐसे में एससीओ जैसे साझा मंच प्रतिस्पर्धा को संभालने के अवसर देते हैं, बिना यह दिखावा किए कि बुनियादी मतभेद खत्म हो गए हैं। यही रणनीतिक स्वायत्तता है : वॉशिंगटन, मॉस्को और बीजिंग- तीनों से संवाद करने की क्षमता, बिना किसी एक रिश्ते को दूसरे रिश्तों को तय करने देने के।
ईरान युद्ध ने दिखाया है कि पश्चिम एशिया का कोई संकट कितनी तेजी से यूरेशिया पर असर डाल सकता है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रपति पेजेश्कियान के साथ बैठक का महत्व द्विपक्षीय संबंधों से कहीं आगे तक जाता है। भारत के लिए ईरान एक महत्वपूर्ण भूगोल भी है।
पाकिस्तान भारत को मध्य एशिया तक सीधे जमीनी रास्ते से पहुंचने नहीं देता। अफगानिस्तान की स्थिति अब भी अनिश्चित है। ऐसे में चाबहार और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे जैसी परियोजनाओं के लिए ईरान बेहद महत्वपूर्ण है।
पश्चिम एशिया और मध्य एशिया को अब पूरी तरह अलग-अलग रणनीतिक मोर्चों के रूप में नहीं देखा जा सकता। मध्य एशिया के तमाम देश हालात की नजाकत को समझते हैं। उनके रूस के साथ संबंध हैं, चीन से उनका आर्थिक जुड़ाव लगातार मजबूत हो रहा है और साथ ही वे अमेरिका, यूरोप, भारत तथा अन्य देशों के साथ व्यापक साझेदारियां भी तलाश रहे हैं। रणनीतिक विविधता अपने फैसलों और विकल्पों पर अधिक नियंत्रण देती है। भारत भी इससे अनभिज्ञ नहीं है।
गत जून में मैं किर्गिस्तान में इस्सीक-कुल इंटरनेशनल फोरम में था। इससे कुछ समय पहले मैंने एससीओ के महासचिव से पटना स्थित लोक भवन में मुलाकात की थी। इस्सीक-कुल में मैंने उस विचार की चर्चा की, जिसे हम बिहार में अब ‘नालंदा एप्रोच’ कहने लगे हैं।
प्राचीन नालंदा केवल एक विश्वविद्यालय ही नहीं था, वह ज्ञान का एक अंतरराष्ट्रीय इकोसिस्टम था, जो पूरे एशिया के विद्वानों और सभ्यताओं को जोड़ता था। इस सिद्धांत को आज के संदर्भ में निरंतर बौद्धिक संवाद के जरिए नया अर्थ दिया जा सकता है।
एससीओ जैसे मंच चर्चा का अवसर देते हैं, बिना यह दिखाए कि मतभेद खत्म हो गए हैं। यही रणनीतिक स्वायत्तता है- वॉशिंगटन, मॉस्को, बीजिंग- सभी से संवाद की क्षमता, किसी एक रिश्ते को दूसरे रिश्तों को तय करने देने के बिना। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








