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- Priyadarshan’s Column Now New Kinds Of Threats Are Emerging On Democracy
7 घंटे पहले
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प्रियदर्शन लेखक और पत्रकार
ट्रम्प के वक्तव्यों और फैसलों से दुनिया हैरान है। इतिहास में ऐसा कोई नेता याद नहीं आता, जिसने इतनी ढिठाई से नोबेल सम्मान की मांग की हो। जिसने लगातार शेखी भरे बयान दिए हों और उनसे पीछे भी हटा हो। जो लगभग ब्लैकमेलिंग की भाषा में दूसरे देशों को धमकाने की कोशिश करता हो। सवाल है कि ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति कैसे बन गए- वो भी दूसरी बार?
इस सवाल का जवाब उनके पहली बार चुने जाने के समय दो लेखकों- स्टीवेन लेवित्स्की और डेनियल जिब्लाट ने अपनी किताब ‘हाऊ डेमोक्रेसीज़ डाई’ में खोजने की कोशिश की थी। इस किताब में अमेरिकी लोकतंत्र और संविधान में ‘गेटकीपिंग’ के इंतजामों की नाकामी पर विचार किया गया है।
किताब बताती है कि अब लोकतंत्र को फौजी बूटों और संगीनों से नहीं, बिल्कुल लोकतांत्रिक तरीकों से कुचला जाता है। लेखक इस बात पर मायूस होते हैं कि लोकतंत्र के खात्मे का जो अध्ययन वे दूसरे, छोटे समझे जाने वाले मुल्कों को आधार में रखकर कर रहे थे, वह उनके अपने मुल्क में भी घटित होता दिखेगा, इसकी उन्होंने कल्पना नहीं की थी।
वे लोकतंत्र की पोशाक पहन कर आने वाले अधिनायकों की पहचान की चार कसौटियां भी बताते हैं- पहली यह कि वे लोकतांत्रिक तौर-तरीकों को अस्वीकृत करते हैं या उनके प्रति कम प्रतिबद्धता दिखाते हैं। दूसरे, वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की वैधता को नकारते हैं- उन्हें देश के लिए खतरा या विदेशी एजेंट बताते हैं। तीसरी- वे हिंसा को सहन करते या बढ़ावा देते हैं। चौथी- वे नागरिक अधिकारों और मीडिया की आजादी में कटौती की मंशा रखते हैं।
ट्रम्प जिस तरह विरोधियों से पेश आते हैं, जिस तरह अमेरिकी सत्ता-प्रतिष्ठान के भीतर अपनी निजी राय को अहमियत देते हुए मीडिया सहित अन्य लोगों को झूठा साबित करने पर आमादा दिखाई देते हैं और इस प्रक्रिया में एक के बाद एक गलतबयानी करते हैं- उससे लगता है उनके भीतर अधिनायकवाद की प्रवृत्ति इन चारों कसौटियों से और आगे की है।
लेकिन यह अधिनायकवादी प्रवृत्ति अमेरिकी लोकतंत्र ने स्वीकार क्यों की? क्योंकि उन्होंने ‘अमेरिका फर्स्ट’ जैसा नारा दिया, अपने को वहां का प्रथम नागरिक मानने वाली श्वेत आबादी के भीतर अन्याय झेलने की नकली तकलीफ पैदा की और बताया कि वे सच्चे अमेरिकी हैं।
दुर्भाग्य से यह सच्चा अमेरिकी सबसे ज्यादा अमेरिका के उन उदारवादी मूल्यों के ही खिलाफ खड़ा दिखता है, जिन्होंने बीती दो सदियों में अमेरिका को दुनिया का महान देश बनाया है। इन तमाम वर्षों में अमेरिका सबका स्वागत करता रहा, सबके लिए घर बना रहा, दुनिया भर से उद्यमी और पेशेवर आकर अमेरिकी बनते रहे और अमेरिका को बनाते रहे।
लेकिन यह प्रक्रिया अब खतरे में है। ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नाम पर जो नया अमेरिका बन रहा है, वह उसे कुछ कमजोर ही करेगा। वैसे भी अमेरिकी हितों के नाम पर अमेरिका के सत्ता-प्रतिष्ठान ने दुनिया भर में जितने बम गिराए हैं, युद्ध कराए हैं, उससे अमेरिकी राष्ट्र-राज्य की प्रतिष्ठा पहले ही धूमिल हुई है।
दुनिया के कई देशों में उस प्रक्रिया की प्रतिच्छायाएं दिखाई पड़ती हैं, जिससे ट्रम्प पैदा होते हैं। लोकतंत्र सिर्फ वोटतंत्र नहीं होता, वह सामूहिकता की ऐसी भावना भी होता है, जिसमें सारे नागरिक बराबर हों- भारतीय संविधान ने इस बराबरी की गारंटी देकर इस लोकतांत्रिक भावना को ऐसी जमीन दी है, जिसे खत्म करना लगभग असंभव है।
लेकिन इस पर लगातार निगाह रखने की जरूरत है कि लोकतंत्र की पोशाक में कहीं अधिनायकवादी प्रवृत्तियां विस्तार तो नहीं पा रहीं? कहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने वाली संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता खतरे में तो नहीं, कहीं संसदीय प्रणाली उपेक्षित तो नहीं हो रही? कहीं मीडिया की स्वतंत्रता पर दबाव तो नहीं हैं और कहीं नागरिकों के मौलिक अधिकार छीने तो नहीं जा रहे।
आज दुनिया के कई देशों में उस प्रक्रिया की प्रतिच्छायाएं दिखाई पड़ती हैं, जिससे ट्रम्प जैसे नेता पैदा होते हैं। सनद रहे कि लोकतंत्र सिर्फ वोटतंत्र ही नहीं होता, वह सामूहिकता की ऐसी भावना भी होता है, जिसमें सारे नागरिक बराबर हों। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








