प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम:  धरती को बचाने की नहीं, जीने के तरीके बदलने की जरूरत है
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प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम: धरती को बचाने की नहीं, जीने के तरीके बदलने की जरूरत है

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10 घंटे पहले

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प्रो. चेतन सिंह सोलंकी आईआईटी बॉम्बे में प्रोफेसर - Dainik Bhaskar

प्रो. चेतन सिंह सोलंकी आईआईटी बॉम्बे में प्रोफेसर

पिछले कुछ वर्षों से मैं देशभर में यात्रा करते हुए हजारों लोगों से मिला हूं। पर्यावरण विषय पर लगभग हर शहर, कॉलेज और कार्यक्रम में मुझे एक ही वाक्य दीवारों पर, पोस्टरों पर और भाषणों में दिखाई देता है- पृथ्वी बचाओ या धरती बचाओ। पर जितनी बार मैं यह वाक्य सुनता हूं, उतना ही मुझे लगता है इसमें गहरी भूल है।

यह मान लेना कि मनुष्य धरती को बचा सकता है, हमारे अहंकार का प्रतीक है। चार-साढ़े चार अरब वर्ष पुरानी यह पृथ्वी आग, बर्फ, उल्कापात और कई प्रजातियों की विलुप्ति झेल चुकी है। मनुष्य तो उसके इतिहास में एक बहुत छोटा-सा अध्याय है। हम इस धरती पर एक अणु तक नहीं बना सकते, रेत का कण भी खुद से पैदा नहीं कर सकते, फिर भी हम सोचते हैं कि हम धरती को बचा सकते हैं।

हमें धरती या प्रकृति को नहीं, खुद को बचाने की जरूरत है। प्रकृति को हमारी आवश्यकता नहीं, हमें प्रकृति की आवश्यकता है। यदि मनुष्य कल समाप्त हो जाएं, तो जंगल लौट आएंगे, नदियां साफ हो जाएंगी, समुद्र अपने आप ठीक हो जाएंगे और जीव-जंतु फिर से फैल जाएंगे। प्रकृति चलती रहेगी। पर यदि धरती पर जलवायु पूरी तरह से बदल जाए, पानी, मिट्टी और हवा पूरी तरह से प्रदूषित हो जाए, तो मनुष्य प्रजाति नहीं बच सकेगी।

भारतीय दर्शन में यह बात बहुत पहले से कही गई है। पंचतत्व के अनुसार हमारा शरीर भी उसी मिट्टी, जल, वायु, अग्नि और आकाश से बना है, जिससे प्रकृति बनी है। बाहर की हवा वही है, जो हमारे फेफड़ों में जाती है। बाहर का पानी वही है, जो हमारे शरीर में रक्त और द्रव बनता है। मिट्टी ही भोजन के रूप में हमारे भीतर आती है। हम और प्रकृति अलग नहीं हैं, हम उसी का हिस्सा हैं। जो प्रकृति में है, वही मनुष्य के शरीर में भी है।

लेकिन आधुनिक जीवन में हर काम और हर उपभोग से- चाहे वह वॉट्सएप पर मैसेज भेजना हो, गाड़ी चलाना हो, बिजली का उपयोग हो या कोई सामान खरीदना हो- हम हवा, पानी और मिट्टी को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से प्रदूषित करते हैं। इसका मतलब ये है कि वास्तव में हम खुद को ही, अपने ही शरीर को दूषित करते हैं।

कभी-कभी तो मुझे आधुनिक मनुष्य की समझ पर बड़ा शक होने लगता है। हम उसी हवा को कैसे खराब कर सकते हैं, जिसमें खुद ही श्वास लेना है? उसी पानी को कैसे गंदा कर सकते है, जिसे खुद ही पीना है। क्या मनुष्य सच में ही ईश्वर की बनाई गई सबसे उत्कृष्ट और बुद्धिमान कृति है?

इतिहास हमें जलवायु परिवर्तन के परिणाम का उदाहरण दे चुका है। कभी इस धरती पर डायनासोर राज करते थे। वे शक्तिशाली थे, हर जगह थे। किंतु जलवायु बदली तो वे विलुप्त हो गए। धरती बची रही। जीवन बचा रहा। केवल वह प्रजाति समाप्त हुई। परंतु उस समय जलवायु परिवर्तन के लिए डायनासोर स्वयं जिम्मेदार नहीं थे। पर आज का जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक नहीं है।

यह मनुष्य द्वारा पैदा किया गया है और बहुत तेजी से बढ़ रहा है। हम जीवाश्म ईंधन जला रहे हैं, जंगल काट रहे हैं और वातावरण में कार्बन डाल रहे हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, मौसम अस्थिर हो रहा है और आपदाएं बढ़ रही हैं। यह इस बात का संकेत नहीं है कि धरती मर रही है। यह इसका संकेत है कि मानव सभ्यता स्वयं को नष्ट कर रही है।

इसलिए अगली बार जब आप धरती बचाओ कहें, तो रुककर सोचिए। धरती को बचाने की जरूरत नहीं है। हमें अपने जीने के तरीके को बदलकर खुद को बचाने की जरूरत है। आधुनिक दुनिया एक खतरनाक भ्रम पर टिकी है कि सीमित धरती पर असीमित उपभोग संभव है। जब हमारी आय सीमित होती है तो हमारे खर्चे भी सीमित हो जाते हैं। उसी तरह से हमारी धरती सीमित है तो हम अपनी जरूरतों को सीमित क्यों नहीं करते हैं? (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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