प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम:  21वीं सदी में असली स्वच्छता का मतलब कुछ और होता है…
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10 घंटे पहले

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प्रो. चेतन सिंह सोलंकी आईआईटी बॉम्बे में प्रोफेसर - Dainik Bhaskar

प्रो. चेतन सिंह सोलंकी आईआईटी बॉम्बे में प्रोफेसर

पिछले पांच सालों से ऊर्जा स्वराज यात्रा पर भारत भर में यात्रा करने वाले व्यक्ति के रूप में मैंने सैकड़ों शहर, कस्बे और गांव देखे हैं- हर एक का अपना चरित्र, लय और वास्तविकताएं हैं। लेकिन इंदौर के बारे में कुछ अलग है। जैसे ही आप इस शहर में जाते हैं, आपको फर्क महसूस होता है। सड़कें साफ हैं। कूड़ेदान भरे नहीं हैं।

सार्वजनिक स्थान सुथरे हैं। यहां ऐसी नागरिक व्यवस्था है, जो आपको शायद ही कहीं और मिले। और यही वजह है कि इंदौर को लगातार आठ सालों से आधिकारिक तौर पर भारत का सबसे साफ शहर घोषित किया गया है, इसके लिए सभी इंदौरवासी बधाई के पात्र हैं।

एक समर्पित महापौर और इंदौर नगर निगम की कुशल टीम के नेतृत्व में नगर प्रशासन ने यह दर्शाया है कि निरंतर प्रयास, नागरिक भागीदारी और व्यवस्थित कचरा-प्रबंधन के जरिए कैसे दिखाई देने वाली स्वच्छता हासिल की जा सकती है।

लेकिन यह कहानी का एक हिस्सा है। इस साल की शुरुआत में- इंदौर जलवायु मिशन के तहत- इंदौर में अपने प्रवास के दौरान मुझे इस शहर के नेतृत्व और प्रशासकों के साथ मिलकर काम करने का अवसर मिला। मैंने उनकी सच्ची प्रतिबद्धता और सक्रियता देखी। लेकिन मैंने एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया- क्या हम सब कुछ साफ कर रहे हैं, या केवल वही जो हम देख सकते हैं?

हमारे द्वारा उत्पन्न कचरे को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- 1) दृश्यमान कचरा, जिसे हम देख सकते हैं, छू सकते हैं और महसूस कर सकते हैं, और 2) अदृश्य कचरा- जिसे हम न देख सकते हैं, न सूंघ सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं।

स्वच्छता दृश्यमान चीजों तक ही सीमित नहीं है। भारत में प्रत्येक घर से प्रतिवर्ष लगभग 150 किलो कचरा उत्पन्न होता है- जिसमें रैपर, खाद्य अपशिष्ट, बोतलें और पैकेट आदि होते हैं। कचरा-निष्पादन वाले इसे झाड़ते हैं, अलग करते हैं, इकट्ठा करते हैं और प्रोसेस करते हैं। इंदौर में इस प्रक्रिया को अच्छे तरह से क्रियान्वित किया गया है।

लेकिन भारत में हर परिवार एक साल में लगभग 10,000 किलो अदृश्य कचरा भी पैदा करता है- जो कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के रूप में है। यह कचरा सड़कों पर बदबू नहीं फैला रहा है। यह लैंडफिल में नहीं पड़ा है। यह चुपचाप वातावरण में बढ़ रहा है।

यह एलपीजी से खाना पकाने, पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों को चलाने, कोयले से संचा​लित होने वाले बिजली संयंत्रों से बिजली का उपयोग करने, ऊर्जा-गहन उद्योगों में बने उत्पादों का उपभोग करने और डिजिटल उपकरणों के उपयोग से भी आता है, जो 24/7 चलने वाले विशाल डेटा केंद्रों से संचालित होते हैं। हर गतिविधि, हर खरीदारी, हर उपभोग, सोशल मीडिया पर हर लाइक तक के पीछे अदृश्य कचरे का उत्सर्जन है।

हम इस कार्बन को न देख सकते हैं, न सूंघ सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं। लेकिन यह वहां है। और, दिखाई देने वाले कचरे से कहीं अधिक खतरनाक है। दिखने वाले कचरे के विपरीत, अदृश्य कचरा या सीओ2 अपघटित नहीं होता।

यह लगभग 300 वर्षों तक वायुमंडल में रहता है, गर्मी को ट्रैप करता है, तापमान बढ़ाता है और जलवायु को अस्थिर करता है। इसका मतलब है कि कार्बन या अदृश्य कचरा जो हम हर रोज वायुमंडल में फेंक रहे हैं, यह उसे 300 वर्षों तक प्रभावित करने वाला है।

इसी के कारण मानसून अनिश्चित होता जा रहा है। गर्मियां बेहद गर्म हो रही हैं। सर्दियों की अवधि कम हो रही है। फसलें खराब हो रही हैं। शहरों में बाढ़ आ रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। और, किसी को भी इस बेहद खतरनाक अदृश्य कचरे की परवाह नहीं है।

21वीं सदी में स्वच्छता का मतलब है बिजली की बर्बादी कम करना, रिन्यूएबल एनर्जी का इस्तेमाल करना, अनावश्यक खपत घटाना, साइकिलिंग और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना। अगर हम स्वच्छता की अपनी समझ में वातावरण को शामिल नहीं करते, तो हम उसी संकट में बह जाएंगे, जिसे हम पैदा करने में योगदान दे रहे हैं। दिखने वाली स्वच्छता का भ्रम और न दिखने वाले कचरे को अनदेखा करना खतरनाक है- क्योंकि यह उपाय की तात्कालिकता को छुपाता है। समय आ गया है कि हम इसके प्रति सजग हों। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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