एन. रघुरामन का कॉलम:  आपको मशीनों से प्यार है तो एक एआई-प्रूफ नौकरी आपके इंतजार में है
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एन. रघुरामन का कॉलम: आपको मशीनों से प्यार है तो एक एआई-प्रूफ नौकरी आपके इंतजार में है

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3 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

बचपन से ही उसे अपने खिलौने खोलकर फिर से जोड़ना पसंद था, हालांकि वह इसमें विफल होता था। फिर, स्कूली दिनों में वह पिता की कार से छेड़छाड़ करता और उसे ठीक करने की कोशिश करता। कभी ठीक कर भी देता, लेकिन कभी-कभी उसके पिता को मैकेनिक का भारी बिल चुकाना पड़ता था।

लेकिन पिता को इससे फर्क नहीं पड़ता था। उन्होंने उसे अपनी महंगी कार के साथ खेलने दिया। पेशे से पायलट पिता मानते थे कि मैकेनिकल माइंडसेट वाले लोग ही एआई को मात दे सकते हैं। लड़का बड़ा हुआ और पिता की तरह मशीनें उड़ाने का सपना देखने लगा। लेकिन उसकी आंखों की रोशनी इस लायक नहीं थी।

अब हाई स्कूल का यह लड़का एक दूसरी नौकरी की ट्रेनिंग ले रहा है, जो उसे छह अंकों की सैलरी वाली एविएशन जॉब दिलवाएगी। पिछले छह वर्षों में इस नौकरी की मांग पायलट से भी ज्यादा है।

दरअसल, उसके पिता जैसे लोग इन विशाल मशीनों को तब तक नहीं उड़ा सकते, जब तक ये लोग उनकी एयरवर्थिनेस को प्रमाणित न कर दें। क्योंकि पायलट जहां विमान उड़ाते हैं, वहीं टेक्नीशियन कानूनी तौर पर उनकी एयरवर्थिनेस के संरक्षक होते हैं। अभी यह 17 साल का लड़का अमेरिका के एक रीजनल एयरपोर्ट पर 10 हजार स्क्वायर फीट के हैंगर (जहां विमानों की मरम्मत होती है) में एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस टेक्नीशियन (एएमई) की ट्रेनिंग ले रहा है।

यकीन मानिए, ट्रेनिंग पूरी होते ही उसे किसी एयरलाइन में नौकरी मिल जाएगी, जहां उसकी सैलरी छह अंकों से शुरू होगी। एविएशन इंडस्ट्री मशीनों के ऐसे दीवानों को पाकर खुश है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इंडस्ट्री में उन लोगों की कमी हो रही है, जो विमानों की सुरक्षित और समय पर उड़ान को बनाए रखते हैं। 40% से ज्यादा एविएशन मैकेनिक्स उम्रदराज हो रहे हैं और रिटायरमेंट के करीब हैं। कई तो 60 की उम्र पार कर एक्सटेंशन पर हैं।

अमेरिका जैसे देशों में एविएशन ट्रैफिक बहुत ज्यादा है। अगले साल अकेले नॉर्थ अमेरिका में करीब 7 हजार सर्टिफाइड मैकेनिक्स की कमी का अनुमान है। इसमें 15 हजार नॉन-सर्टिफाइड मेंटेनेंस स्टाफ शामिल नहीं हैं। इस कमी के कारण 2020 के बाद से एएमई की एंट्री लेवल सैलरी में 50% से ज्यादा का इजाफा हुआ है। यह उन गिनी-चुनी नौकरियों में से है, जहां जॉइनिंग पर 75 हजार डॉलर तक का साइनिंग बोनस दिया जाता है।

सैलरी और ओवरटाइम मिलाकर सालाना पैकेज करीब 1.35 लाख डॉलर तक पहुंचता है। फिर भी एविएशन कंपनियां रिक्त पद नहीं भर पा रही हैं और कई बड़ी एयरलाइंस तो खुद के ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू कर रही हैं। सोच रहे हैं कि उसकी यह यात्रा कैसे शुरू हुई?

यह हाई स्कूल के तुरंत बाद शुरू हो गई थी। भारत और कई अन्य देशों में इसके लिए न्यूनतम योग्यता फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमेटिक्स (पीसीएम) के साथ 10+2 है। इसके लिए चार साल की डिग्री जरूरी नहीं, बल्कि आपको एक स्पेशलाइज्ड लाइसेंस-आधारित ट्रेनिंग प्रोग्राम करना होता है। यह आम गलतफहमी है कि अच्छी ट्रेनिंग सिर्फ विदेशों में ही उपलब्ध है।

हकीकत यह है कि भारत में इसका मजबूत ट्रेनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर है, जिसका नियमन नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) करता है। भारत में कई ऊंचे दर्जे के सरकारी और निजी कॉलेज उपलब्ध हैं। इसके लिए यूरोप में ईएएसए पार्ट-147 सर्टिफाइड स्कूल्स या अमेरिका के एफएए अप्रूव्ड पार्ट–147 स्कूल्स देखे जा सकते हैं। कनाडा और जर्मनी जैसे देश अपनी एडवांस्ड एमआरओ (मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल) सुविधाओं के कारण इंटरनेशनल स्टूडेंट्स के लिए बड़े हब हैं।

पूरी ट्रेनिंग और पढ़ाई में करीब तीन साल लगते हैं। भारत में मई के दूसरे हफ्ते से जून के दूसरे हफ्ते तक कई सीईटी होते हैं। इनमें कई छात्र कैटेगरी बी लाइसेंस (मैकेनिकल के लिए बी1 या एवियोनिक्स के लिए बी2) हासिल करने का लक्ष्य रखते हैं। इसके लिए उन्हें डीजीसीए के कई मॉड्यूलर एग्जाम पास करने होते हैं और प्रैक्टिकल घंटे पूरे करने होते हैं।

फंडा यह है कि अगर आपको मशीनों से प्यार है तो कॅरिअर को एएमई की दिशा में ले जाने की कोशिश करें। यह एआई-प्रूफ और ऊंची कमाई वाली नौकरी है।

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