17 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

पल्मोनरी फाइब्रोसिस एक ऐसी बीमारी है, जिसमें फेफड़ों के अंदर धीरे-धीरे घाव बन जाते हैं और निशान पड़ जाते हैं। इस वजह से फेफड़े सख्त हो जाते हैं और उनका फैलना-सिकुड़ना मुश्किल हो जाता है। इससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है। जिन्हें पल्मोनरी फाइब्रोसिस है, थोड़ी सी मेहनत में ही उनका दम फूलने लगता है। इसके चलते शरीर को पूरी ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और धीरे-धीरे हालत गंभीर हो सकती है।
इसके कारण पैदा हुई कंडीशंस में रेस्पिरेटरी फेल्योर हो सकता है और मौत भी हो सकती है। ‘साइंस डायरेक्ट’ में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, पूरी दुनिया में 3 से 5 लाख लोग पल्मोनरी फाइब्रोसिस से प्रभावित हैं।
आज ‘फिजिकल हेल्थ’ में पल्मोनरी फाइब्रोसिस की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-
- इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस क्या है?
- पल्मोनरी फाइब्रोसिस के क्या लक्षण होते हैं?
- लाइफस्टाइल में किन बदलावों से जिंदगी आसान हो सकती है?
इडियोपैथिक फाइब्रोसिस क्या है?
जब लंग्स में घाव का कारण नहीं मालूम होता है तो इसे इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस कहते हैं। पल्मोनरी फाइब्रोसिस के ज्यादातर मामले इडियोपैथिक ही होते हैं। इसका कोई सटीक इलाज नहीं है, लेकिन इसे रोका या कंट्रोल किया जा सकता है।

पल्मोनरी फाइब्रोसिस के क्या लक्षण हैं?
पल्मोनरी फाइब्रोसिस एक क्रॉनिक डिजीज है। इसका मतलब है कि ये बीमारी धीरे-धीरे विकसित होती है और इसके लक्षण भी धीरे-धीरे विकसित होते हैं। इसके चलते पल्मोनरी फाइब्रोसिस का जल्दी पता लगा पाना थोड़ा मुश्किल होता है। इसके बावजूद अगर ध्यान दिया जाए तो हमारा शरीर सांस लेने में समस्या, बेचैनी और कमजोरी जैसे इशारे कर रहा होता है। इसके सभी लक्षण ग्राफिक में देखिए-

पल्मोनरी फाइब्रोसिस होने पर लाइफस्टाइल में क्या बदलाव जरूरी हैं?
लाइफस्टाइल में थोड़े से बदलाव से मुश्किलें कम हो सकती हैं। हल्की-फुल्की वॉक, सांसों की एक्सरसाइज, पोषण का ध्यान रखना, बार-बार इन्फेक्शन से बचना और जरूरत पड़ने पर ऑक्सीजन थेरेपी से रोजमर्रा की जिंदगी को बेहतर बनाया जा सकता है। वक्त रहते इलाज शुरू हो जाए तो मरीज की तकलीफ काफी कम की जा सकती है।

ग्राफिक में दिए सभी पॉइंट्स विस्तार से समझें-
1. आराम से लंबी सांस लें
तेज और उथली सांसें लेने से दम घुटने जैसा महसूस हो सकता है। ऐसे में कुछ आसान तकनीकें, जैसे होंठों को सिकोड़कर धीरे-धीरे सांस लेना या पेट से सांस लेना मददगार हो सकता है। ये कोई जादू नहीं हैं, लेकिन जब सांस उखड़ने लगे तो यह तरीका थोड़ी राहत जरूर देता है। फिजियोथेरेपिस्ट आपको ये टेक्नीक्स सिखा सकते हैं।
2. सावधानी से एक्सरसाइज करते रहें
कई मरीज डरते हैं कि चलने-फिरने से हालत बिगड़ सकती है, लेकिन ज्यादा सुस्त रहने से शरीर और भी कमजोर हो सकता है। हल्की-फुल्की एक्सरसाइज जैसे टहलना या स्ट्रेचिंग धीरे-धीरे सहनशक्ति और मूड दोनों सुधार सकती है। इसका मतलब अपनी हदों को पार करना नहीं है, बल्कि अपनी हदों के अंदर रहकर एक्टिव रहना है।
3. ऊर्जा संभालकर खर्च करें
थकावट लगातार परेशान कर सकती है, इसलिए दिन भर की प्लानिंग समझदारी से करनी चाहिए। जैसे सारे जरूरी काम एक साथ निपटाएं, खाना बनाते समय या नहाते समय स्टूल का इस्तेमाल करें, रोजमर्रा की चीजें हाथ के पास रखें। ऊंचे-नीचे कामों को संतुलन में रखें। ऐसा करना बीमारी से हार मानना नहीं है, बल्कि समझदारी से उसे मैनेज करना है।
4. बहुत भारी खाना खाने से बचें
भारी खाना डायाफ्राम पर दबाव डालता है, जिससे सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। इसकी बजाय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार पोषण से भरपूर चीजें खाएं। प्रोटीन और हेल्दी फैट वाली चीजें ताकत बनाए रखने में मदद करती हैं। अगर निगलने में दिक्कत हो तो मुलायम चीजें खाना बेहतर है। यहां परफेक्ट डाइट नहीं, बल्कि आराम और पोषण जरूरी है।
5. संक्रमण से बचाव जरूरी है
जब फेफड़े पहले से ही कमजोर हों, तो हल्का सा इन्फेक्शन भी बड़ा असर डाल सकता है। फ्लू और निमोनिया के वैक्सीन लगवाएं। हाथ धोना, धूल या धुएं से बचना और ज्यादा भीड़भाड़ वाली जगहों से दूर रहना जरूरी है। मास्क साथ रखें, खासकर पब्लिक प्लेस पर पहनकर निकलें।
6. मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज न करें
ये बीमारी सिर्फ शरीर पर ही नहीं, दिमाग पर भी असर डालती है। ऐसे में कुछ लोग गहरी सांस लेने की तकनीकों, काउंसलिंग या माइंडफुलनेस से सुकून पाते हैं। अपनी परेशानी किसी से कहना कमजोरी नहीं है, बल्कि अंदर से मजबूत बनने का एक और तरीका है।
7. ऑक्सीजन सपोर्ट हार नहीं है, ये सहारा है
कुछ लोग ऑक्सीजन थेरेपी से डरते हैं, उन्हें लगता है कि ये आखिरी स्टेज है। लेकिन बहुतों के लिए इससे राहत मिलती है, नींद बेहतर होती है और हिलने-डुलने में भी मदद मिलती है। आज के ऑक्सीजन उपकरण पहले की तुलना में छोटे, हल्के और आसान हैं। ये आपकी आजादी या जिंदगी छीनते नहीं, बल्कि सांस लेना आसान बनाते हैं।
पल्मोनरी फाइब्रोसिस है तो खाने में क्या अवॉइड करना चाहिए?
अगर किसी व्यक्ति को पल्मोनरी फाइब्रोसिस है तो उसे खाने में नमक और चीनी वाली चीजें बहुत कम मात्रा में खानी चाहिए। सैचुरेटड और ट्रांस फैट भी अवॉइड करना चाहिए। कुल मिलाकर तला-भुना और प्रोसेस्ड फूड नहीं खाना चाहिए। स्मोकिंग बिल्कुल न करें। धूल और धुएं से भी दूरी बनाकर रखें। इससे सांस लेने में मुश्किल हो सकती है और समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
पल्मोनरी फाइब्रोसिस होने पर कोई कितने दिन तक जीवित रहता है
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के मुताबिक, IPF आमतौर पर 50 से 70 वर्ष की उम्र के लोगों को प्रभावित करता है। इस उम्र तक लोगों का शरीर किसी बीमारी का सामना करने में बहुत सक्षम नहीं रह जाता है। इसलिए IPF के डायग्नोसिस के बाद लोग 3-5 साल ही जीवित रहते हैं।
हालांकि पल्मोनरी फाइब्रोसिस होने पर कोई कितने समय तक जीवित रहेगा, यह इन फैक्टर्स पर भी निर्भर करता है:
- व्यक्ति की उम्र कितनी है।
- व्यक्ति की ओवरऑल हेल्थ कंडीशन क्या है।
- बीमारी कितनी तेजी से बढ़ रही है।
- लक्षण कितने तीव्र हैं।
…………………..
ये खबर भी पढ़ें
फिजिकल हेल्थ- हेपेटाइटिस D से कैंसर का रिस्क- WHO:बीमारी के 6 कारण, जानें किसे है ज्यादा रिस्क, डॉक्टर से जानें बचाव के 9 तरीके

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) से संबद्ध इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने हेपेटाइटिस D को कैंसर कारक (Carcinogenic) घोषित किया है। इससे पहले WHO हेपेटाइटिस B और C को भी कैंसर कारक बता चुका है। पूरी खबर पढ़िए…








