ऑटो-ट्रांसपोर्ट

ब्रांड से सबक: कभी एक रुपए में बिकने की नौबत आई, आज देश की शीर्ष टायर निर्माताओं में है अपोलो

Spread the love


  • Hindi News
  • Business
  • Once On The Verge Of Being Sold For Just One Rupee, Apollo Is Now One Of The Top Tyre Manufacturers In The Country.

नई दिल्ली43 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक
रेवेन्यू के लिहाज से अपोलो आज देश की दूसरे नंबर की टायर कंपनी है। दिसंबर 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार अपोलो सालाना करीब 3.17 करोड़ टायर बनाती है।   - फाइल फोटो - Dainik Bhaskar

रेवेन्यू के लिहाज से अपोलो आज देश की दूसरे नंबर की टायर कंपनी है। दिसंबर 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार अपोलो सालाना करीब 3.17 करोड़ टायर बनाती है। – फाइल फोटो

1978, देश की तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने गंभीर रूप से आर्थिक संकट में घिरी अपोलो टायर्स कंपनी के मैनेजमेंट का नियंत्रण अपने हाथों ले लिया था। आर्थिक संकट का आलम यह था कि 1972 में शुरू हुई इस कंपनी पर 1978-79 तक 8 करोड़ रुपए की पूंजी पर करीब 30 करोड़ रुपए का घाटा था।

रिपोर्ट्स के अनुसार कंपनी के पास कर्मचारियों को वेतन देने तक के पैसे नहीं थे। हालांकि मैनेजमेंट ने सरकारी नियंत्रण के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की। संस्थापक रौनक सिंह कानूनी पचड़ों से इतने परेशान हो गए कि उन्होंने अपने बेटे ओंकार कंवर को कंपनी को एक रुपए में सरकार को बेचने की सलाह दे दी, ताकि कर्ज के झंझट और कानूनी पचड़ों से मुक्त हुआ जा सके। हालांकि ओंकार कंवर ने कंपनी बेचने के बजाय खुद कमान संभाली और आज यह देश की शीर्ष टायर निर्माता कंपनियों में शामिल है।

रेवेन्यू के लिहाज से आज यह देश की दूसरे नंबर की टायर कंपनी है। पहले स्थान पर एमआरएफ है। दिसंबर 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार कंपनी सालाना करीब 3.17 करोड़ टायर बनाती है। खासकर ट्रक और बसों के टायरों के निर्माण के मामले में यह लीडिंग पोजिशन में है। महत्वपूर्ण बात यह है कि करीब एक चौथाई रेवेन्यू यूरोप से आता है।

वर्तमान स्थिति: 25 हजार करोड़ रुपए से अधिक का मार्केट कैप

वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का रेवेन्यू करीब 28,471 करोड़ रुपए रहा, जो कि इसके वर्तमान मार्केट कैप करीब 25 करोड़ रुपए से ज्यादा है। कंपनी का करीब 26% रेवेन्यू यूरोप से आता है। वर्तमान में इसके कुल 6 प्लांट हैं, जिनमें से 5 भारत में जबकि एक हंगरी में है।

हालांकि इनका एक प्लांट नीदरलैंड्स में भी था, जिसमें जून 2026 में उत्पादन बंद हो गया है। 2025 में अपोलो भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी स्पॉन्सर बनी। करीब ढाई साल का यह करार 579 करोड़ रुपए का है और इसमें 121 द्विपक्षीय और 21 आईसीसी क्रिकेट मैच शामिल हैं।

शुरुआत : उद्योगपति रौनक सिंह ने साथियों के साथ मिलकर रखी नींव

अपोलो टायर्स 28 सितंबर 1972 को पब्लिक लिमिटेड कंपनी के रूप में दर्ज हुई। इसके प्रमोटरों में उद्योगपति रौनक सिंह, मैथ्यू टी. मरट्टुकलम और जैकब थॉमस शामिल थे। रौनक सिंह बंटवारे के बाद पाकिस्तान के पंजाब से आए शरणार्थी थे। 1975 में कंपनी का आईपीओ आया। 1977 में केरल के पेरम्ब्रा में पहला प्लांट शुरू हुआ।

नए कदम : हंगरी में पैसेंजर कार टायर क्षमता बढ़ाने की योजना

कंपनी हंगरी में पैसेंजर कार टायर बनाने की क्षमता बढ़ा रही है, जिसका उत्पादन इसी वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में शुरू होने की उम्मीद है। भारत में नई क्षमता वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक आने लगेगी। जुलाई 2026 में जयपुर में दूसरा सुपर-प्रीमियम आउटलेट खोला है। कंपनी ने 2050 तक नेट जीरो कार्बन का लक्ष्य रखा है।

सबक… संकट में हर दिशा में भागने के बजाय मजबूत पक्ष पर ध्यान केंद्रित करना और लोगों का भरोसा जीतना जरूरी है।

इस तरह की वापसी

ट्रक टायर पर लगाया दांव

ओंकार कंवर ने घाटे के बावजूद बड़ा लक्ष्य रखा और ट्रक टायर पर फोकस किया। 1986 तक अपोलो का ट्रक टायर ‘हरक्यूलिस’ बाजार में नंबर एक बन गया था। इसने कंपनी को घाटे के दौर से निकलने का रास्ता दिया।

अलग-अलग जगहों पर शुरू किए प्लांट

कंवर ने यूनियनों से निपटने के लिए नए प्लांट शुरू किए। 1991 में गुजरात के लिमडा में और 1995 में प्रीमियर टायर्स के अधिग्रहण से कोच्चि में तीसरा प्लांट लगाया।

विवाद का अंत

पिता-पुत्र विवाद में ओंकार कंवर की सोच की जीत हुई। कई कारोबारों वाला समूह बनने की बजाय अपोलो टायर पर केंद्रित रही कंपनी।

उत्पादन सस्ती जगहों पर

नीदरलैंड्स में बनने वाले ट्रक-बस रेडियल टायर का उत्पादन भारतीय प्लांट्स में ले जाया जा रहा है। हंगरी में भी विस्तार हो रहा है।

इन चुनौतियों से जूझी कंपनी

शुरुआती घाटा, उत्पादन का संकट

प्लांट शुरू होते ही कंपनी घाटे में फंस गई। जब 1979 में ओंकार कंवर ने कमान संभाली, तब कंपनी सिर्फ दो साल में अपनी पूरी नेटवर्थ से ज्यादा गंवा चुकी थी और उत्पादन में भी गंभीर दिक्कतें थीं।

हड़ताल और तालाबंदी

अपोलो का पूरा उत्पादन तब पेरम्ब्रा प्लांट पर टिका था। मैनेजमेंट और यूनियन के टकराव से 80 के दशक में कई हड़तालें हुईं। दिसंबर 1989 से 15 जनवरी 1990 तक तालाबंदी रही।

पिता-पुत्र विवाद

90 के दशक में रौनक सिंह और बेटे ओंकार कंवर के बीच नियंत्रण को लेकर खुला विवाद हुआ। रौनक सिंह ने कई गंभीर आरोप लगाए।

यूरोप में ऊंची लागत, कमजोर मांग

यूरोप में ऊंची लागत व कमजोर मांग के कारण कंपनी को नीदरलैंड्स के एन्सखेडे प्लांट को जून 2026 में बंद करना पड़ा।

आंकड़ों में कंपनी…

– 100 से ज्यादा देशों में कारोबार कर रही कंपनी।

– 17,517 कर्मचारी थे कंपनी में वित्त वर्ष 2025-26 में।

– 7,398 करोड़ रुपए रेवेन्यू रहा अप्रैल-जून 2026 में।

– 1,372 करोड़ रु. मुनाफा रहा कंपनी का वित्त वर्ष 2025-26 में।

बड़े प्रतिद्वंद्वी : देश में सबसे बड़ी टक्कर एमआरएफ से है। वहीं यूरोप में अपोलो का मुकाबला मिशेलिन, कॉन्टिनेंटल और ब्रिजस्टोन जैसे वैश्विक दिग्गजों से है।

ऐसे पड़ा नाम : कुछ सोर्स में इसका नाम यूनानी देवता अपोलो के नाम पर रखना बताते हैं, लेकिन कहीं भी यह प्रामाणिक रूप से दर्ज नहीं है।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *