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- Makarand Paranjape’s Column The Real Fight Is Not With Pakistan But With Its Army
7 घंटे पहले
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मकरंद परांजपे लेखक, चिंतक, जेएनयू में प्राध्यापक
भारत-पाकिस्तान संघर्ष केवल दो देशों की ही कहानी नहीं, बल्कि दोनों में स्थित दो भिन्न देशों की भी कहानी है। भारतीय उपमहाद्वीप का एक हिस्सा जहां आज भी विभाजन-पूर्व वाले भारत की स्थिति में भरोसा करता है, बल्कि यों कहें कि उसी मानसिकता में रहता है, वहीं पाकिस्तान का एक हिस्सा भारत के साथ शांति की हर सम्भावना को खारिज करता है।
न चाहते हुए भी इस विचारधारा को हमें जिहादी कहना पड़ेगा, क्योंकि इसे पाकिस्तानी सेना के आदर्श-वाक्य के तौर पर प्रस्तुत किया गया है- ईमान, तकवा, जिहाद-फि-सबिलिल्लाह। फौज का जो मूल आदर्श-वाक्य था- इत्तेहाद, यकीन, तंजीम- उसमें जिहाद नहीं था।
इन दोनों पड़ोसी मुल्कों के बीच का अंतर उदभ्रान्त कर देने वाला है। एक शांति चाहने वाला भारत है, और पाकिस्तान में भी एक बड़ी असैन्य आबादी ऐसी ही होगी। लेकिन दूसरी तरफ युद्धलिप्सा से भरा, हिंदू विरोधी और भारत विरोधी पाकिस्तान भी है। इस दूसरे वाले पाकिस्तान में उसकी फौज की अगुवाई में नियमित और अनियमित वर्दीधारी सैनिक हैं, जिन्हें एक विशेष विचारधारा में प्रशिक्षित किया गया है।
पाकिस्तान की इस खंडित मानसिकता का असर उसके समाज के सभी वर्गों में फैला हुआ नजर आता है। एक ओर व्हिस्की पीने वाले अय्याश जनरल हैं तो दूसरी ओर जंग में कुर्बान कर देने के लिए मदरसों में ब्रेनवॉश्ड किए गए लोग।
एक तरफ कुलीन तबका है, जो मजहबी कट्टरता का पोषक है, तो दूसरी तरफ गरीब और हताश निचला तबका, जिनका वे अपने मनसूबे पूरे करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन सवाल है कब तक? ऑपरेशन सिंदूर के बाद अब आगे क्या?
इस बारे में एक विश्वसनीय एक्शन-प्लान सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल पी. रविशंकर ने प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि आप पाकिस्तानी फौज को जंग के मोर्चे के बजाय सियासी और कूटनीतिक तौर पर कहीं बेहतर मात दे सकते हैं।
सनद रहे कि पाकिस्तान कोई ऐसा मुल्क नहीं है, जिसके पास फौज है। बल्कि वह फौज है, जिसके पास एक मुल्क है! फौज ही वहां रियल एस्टेट, कृषि और स्टील जैसे आर्थिक फैक्टरों को नियंत्रित करती है। घरेलू और विदेश नीति तय करती है। उसके पास हार को जीत में बदलने का दुष्प्रचार वाला हुनर भी है।
पाकिस्तान में एक सत्ता का केंद्र है और दूसरा प्रशासन का केंद्र है। सत्ता का केंद्र फौज है। 1947-1948, 1965, 1971 और 1999 जैसे किसी भी सैन्य-टकराव में हमने पाकिस्तान को भले हराया हो, लेकिन उसकी फौज को खत्म नहीं कर पाए।
जनरल रविशंकर कहते हैं कि हर युद्ध के साथ फौज खुद को और मजबूत करती गई। भारत के खिलाफ हर सैन्य कार्रवाई पाकिस्तानी अवाम पर फौज के दबदबे को और बढ़ा देती है। यह दुष्चक्र लगातार दोहराया जाता है।
इस धूर्त संस्था को हराने के लिए भारत को पीडीईआई फॉर्मूला अपनाना चाहिए, यानी पोलिटिक्स, डिप्लोमेसी, इकोनॉमिक्स और इंफॉर्मेशन वारफेयर। ऐसी समग्र रणनीति ही कारगर होगी, जैसा कि भारत ने जल संधि करके किया। अनुच्छेद 370 हटाना मास्टर-स्ट्रोक था, जिसने पाक को बेहद तकलीफ दी।
जहां तक पाकिस्तान के अंदरूनी हालात की बात है तो वह बारूद के ढेर पर बैठा है और केवल चिनगारी दिखाने की देरी है। कूटनीतिक मोर्चे पर प्रतिनिधिमंडल हमारा पक्ष रखने दुनिया में जा रहे हैं। इंफॉर्मेशन वारफेयर के मोर्चे पर जरूर हम पिछड़ रहे हैं।
लेकिन विश्व में भारत का कद, चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, जी-20, ब्रिक्स जैसे मंचों पर हमारी बुलंद आवाज हमारे प्रतिद्वंद्वी की तुलना में हमें बढ़त दिलाती है। पीडीईआई रणनीति से हम दूरगामी परिणाम हासिल कर सकते हैंं। विभाजन-पूर्व वाले भारत के दिवास्वप्न में डूबे लोगों के लिए बेहतर होगा कि वे पाकिस्तान के बाद वाले उपमहाद्वीप पर अपनी आशाएं टिकाएं!
पाकिस्तान कोई ऐसा मुल्क नहीं है, जिसके पास फौज है। बल्कि वह फौज है, जिसके पास मुल्क है! उसके पास हार को जीत में बदलने का दुष्प्रचार वाला हुनर भी है। वहां सत्ता का केंद्र फौज है। प्रशासन का केंद्र भले सरकार हो। (ये लेखक के अपने विचार हैं)








