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मनोज जोशी का कॉलम: ईरान में बढ़ता तनाव दुनिया की इकोनॉमी के लिए अच्छा नहीं है

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7 घंटे पहले

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मनोज जोशी विदेशी मामलों के जानकार - Dainik Bhaskar

मनोज जोशी विदेशी मामलों के जानकार

मध्य-पूर्व में तनाव की घटनाओं में स्पष्ट रूप से तेजी आई है। 8 अप्रैल को हुए दो सप्ताह के युद्धविराम के बाद संघर्ष बीच-बीच में चलता रहा था। लेकिन अब तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल का स्तर पार करने की ओर हैं, जो स्थिति में गंभीर गिरावट का संकेत है और जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। अमेरिकी खुफिया आकलनों से संकेत मिलता है कि ईरान मध्य-पूर्व में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के ठिकानों पर हमला करने की अपनी क्षमता को लेकर आश्वस्त है और संघर्ष जारी रखने के इरादे पर कायम है।

ईरान को चिंता है कि होर्मुज पर उसका नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के कारण उसकी अर्थव्यवस्था दम तोड़ रही है। ईरान द्वारा अमेरिकी बेड़ों को निशाना बनाए जाने में रूस और चीन से मदद मिलने को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं, क्योंकि उसके अपने लंबी दूरी के रडार अब तक नष्ट किए जा चुके हैं।

अप्रैल के युद्धविराम के बाद जेडी वेंस और उनके ईरानी समकक्षों के बीच उच्चस्तरीय बातचीत हुई थी। लेकिन मतभेद दूर नहीं हो सके और बातचीत बेनतीजा रही। 13 अप्रैल को ट्रम्प ने ईरान की नाकेबंदी की घोषणा की, जिसके तहत ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले सभी समुद्री यातायात को निशाना बनाया जाना था। उन्होंने युद्धविराम को एकतरफा रूप से अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा भी दिया। हालांकि, जून के मध्य में दोनों पक्ष नए युद्धविराम की शर्तों पर सहमत हुए और युद्धविराम को 60 दिनों के लिए औपचारिक रूप से बढ़ाया गया।

लेकिन 8 जुलाई तक औपचारिक युद्धविराम और समझौता ज्ञापन पूरी तरह विफल हो गया और दोनों पक्षों ने फिर से सीधे हमले शुरू कर दिए। ईरान ने होर्मुज से गुजर रहे जहाजों को निशाना बनाया और अमेरिका ने इसके जवाब में ईरान पर हमले किए।

जुलाई के मध्य तक अमेरिका ने अपनी पूर्ण नौसैनिक नाकेबंदी फिर से लागू कर दी। सितम्बर में ईरान ने फारस की खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोतों पर हमला किया और अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई में ईरान के तीन तेल टैंकर डुबो दिए।

अब ईरान ने कहा है कि अगर उस पर दोबारा हमला किया गया तो वह खाड़ी में मौजूद अमेरिकी ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर जवाब देगा। इससे फारस की खाड़ी में एनर्जी के बुनियादी ढांचे को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंच सकता है। इसका खामियाजा समूची वैश्विक अर्थव्यवस्था को उठाना होगा।

अमेरिका को उम्मीद थी कि उसकी नाकेबंदी और कठोर प्रतिबंध ईरान को घुटनों पर ला देंगे, लेकिन अब तक ऐसा होने के कोई संकेत नहीं हैं। इसके बजाय हम तेहरान की प्रतिक्रिया को और तीखा होते देख रहे हैं। अमेरिका ने अब ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट शुरू किया है, जिसका उद्देश्य ईरान के बचे हुए वित्तीय सहारों और आय के स्रोतों को काट देना है।

नौसैनिक नाकेबंदी के साथ-साथ इस अभियान में उन अंतरराष्ट्रीय कंपनियों, वित्तीय संस्थानों और देशों पर प्रतिबंध और व्यापारिक दंड लगाने की धमकी दी गई है, जो तेहरान के साथ कारोबार जारी रखते हैं। इन उपायों का निशाना डिजिटल एसेट्स, शिपिंग, विमानन, तकनीक और सोने तक ईरान की पहुंच है।

भारत को अमेरिका ने चेतावनी दी है कि वे ईरानियों की ऐसी व्यवस्थाएं बनाने में मदद न करें, जिनके जरिए वे राजस्व जुटा सकें। सरल भाषा में कहें तो इसका मतलब है- ईरान से कोई व्यापार या वित्तीय लेन-देन नहीं। यह चेतावनी प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पिछले महीने एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान से मुलाकात के बाद दी गई।

लेकिन अमेरिका ने चीन के साथ टकराव से बड़ी सावधानी से परहेज किया है, जबकि चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार और उसका प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। 24 सितम्बर को शी जिनपिंग ट्रम्प के साथ शिखर बैठक के लिए अमेरिका जाएंगे। ऐसे में अमेरिका चीन को नाराज नहीं करना चाहता। पिछले साल जब चीन ने रणनीतिक खनिजों और मैग्नेट के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया था, तब उसने दिखा दिया था कि वह अपने प्रतिबंधों के जरिए अमेरिका को भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है। अमेरिकी समझ चुके हैं कि चीन के मामले में निर्भरता एकतरफा नहीं, बल्कि दोनों तरफ है।

अमेरिका को उम्मीद थी कि उसकी नाकेबंदी और प्रतिबंध ईरान को घुटनों पर ला देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बजाय हम तेहरान की प्रतिक्रिया को और तीखा होते देख रहे हैं। इसीलिए अमेरिका ने अब ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट शुरू किया है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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