15 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

आज (29 सितंबर) नवरात्रि की सप्तमी तिथि है। कल (30 सितंबर) महाअष्टमी और 1 अक्टूबर को महानवमी है। अष्टमी और नवमी तिथियों पर अधिकतर भक्त अपने-अपने घर में कन्या पूजन करते हैं। कन्या पूजन यानी छोटी-छोटी बालिकाओं को घर आमंत्रित करते हैं, उन्हें खाना खिलाते हैं।
उज्जैन ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, नवरात्रि के अंतिम दिनों में कन्याओं को उनके घर जाकर ससम्मान भोजन के लिए आमंत्रित करना चाहिए। नवरात्रि उत्सव की सीख ये है कि कभी भी महिलाओं का अनादर नहीं करना चाहिए, हमेशा महिलाओं का सम्मान करें। सभी देवता महिषासुर का वध नहीं कर पा रहे थे, जो काम देवता नहीं कर पाए, वो काम देवी दुर्गा ने किया था।
कन्या पूजन क्यों किया जाता है?
छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप माना गया है। 2 से 10 साल की कन्याओं को नवरात्रि में भोजन कराने की परंपरा है। शास्त्रों में उम्र के अनुसार छोटी कन्याओं को अलग-अलग देवियों का स्वरूप बताया गया है। 2 साल की कन्या को कुमारिका कहते हैं। 3 साल की कन्या त्रिमूर्ति, 4 साल की कल्याणी, 5 साल की रोहिणी, 6 साल की कालिका, 7 साल की चंडिका, 8 साल की सांभवी, 9 साल की दुर्गा और 10 साल की कन्या सुभद्रा कहलाती है।
छोटी कन्याओं के मन में किसी भी तरह के बुरे भाव नहीं होते हैं। इनके मन में सभी के लिए प्रेम रहता है। इसीलिए इन्हें देवी स्वरूप मानकर नवरात्रि में पूजा करने की परंपरा है।
कन्या पूजन में कन्याओं का सुंदर श्रृंगार करें या श्रृंगार की चीजें उपहार में दें। कन्या के पैरों की पूजा करनी चाहिए। पैरों पर चावल, फूल और कुंकुम अर्पित करें। पैरों में महावर और हाथों में मेहंदी लगाएं। कन्याओं को खीर-पूरी खिलानी चाहिए। दक्षिणा अवश्य दें। कन्याओं को लाल चुनरी भेंट में दें। दुर्गा चालीसा की पुस्तकें दें। लाल रंग की ड्रेस उपहार में देनी चाहिए।
2 अक्टूबर को विजयादशी
शारदीय यानी आश्विन मास की नवरात्रि 22 सितंबर से शुरू हुई है। इस साल नवरात्रि 9 नहीं, 10 दिनों की है, क्योंकि चतुर्थी तिथि दो दिन थी। 1 अक्टूबर को महानवमी है और 2 तारीख को विजयादशमी मनाई जाएगी।
हिन्दी पंचांग के मुताबिक, एक साल में चार बार नवरात्रि मनाई जाती है, चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ मास में। इनमें से चैत्र और आश्विन की नवरात्रियां सामान्य (प्रकट) होती हैं, जबकि आषाढ़ और माघ की नवरात्रियों को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है, जो तांत्रिक साधनाओं और आध्यात्मिक प्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। नवरात्रि ऋतुओं के संधिकाल में आती है। संधिकाल यानी वह समय, जब एक ऋतु समाप्त होकर दूसरी ऋतु शुरू होती है।
चैत्र नवरात्रि शीत ऋतु के बाद ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत में आती है। आषाढ़ नवरात्रि ग्रीष्म ऋतु के बाद वर्षा ऋतु की शुरुआत में आती है। आश्विन नवरात्रि वर्षा ऋतु के बाद शीत ऋतु की शुरुआत में आती है। माघ नवरात्रि शीत ऋतु के बाद वसंत ऋतु की शुरुआत में आती है।








