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सरकार ने अंततः शेयर और मुद्रा बाजारों की गुहार सुन ही ली। सूचीबद्ध सरकारी सिक्योरिटीज़ (जी-सेक) पर 12.5% लॉन्ग टर्म पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) को समाप्त करके विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के बीच विश्वास बहाल करने के लिए आवश्यक कदम उठाया गया है। लेकिन रुपये को मजबूत बनाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विदेशी निवेशकों (एफपीआई और एफआईआई दोनों) ने जनवरी से मई 2026 के बीच भारतीय शेयर बाजार से 2.30 लाख करोड़ रुपये से अधिक निकाले हैं तो क्या यह भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्वास की कमी का संकेत है? ऐसा नहीं है। लेकिन यह वित्त मंत्रालय के लिए अपने कर ढांचे में आवश्यक सुधारों को लेकर एक स्पष्ट चेतावनी अवश्य है। भारत के शेयर बाजार से विदेशी पूंजी का आउटफ्लो केवल भू-राजनीतिक व्यवधानों के कारण नहीं है। इसके लिए हमारी टैक्स व्यवस्था भी जिम्मेदार है। ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल और एलपीजी की लागत बढ़ने से भारत का चालू खाता घाटा पिछले वर्ष जीडीपी के 1% से बढ़कर 2026 में 2% तक पहुंचने की स्थिति में है। इससे रुपये और समग्र भुगतान संतुलन (बीओपी) पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। रुपया तिहरे आघातों का सामना कर रहा है : तेल, चालू खाता घाटा और विदेशी निवेशकों की पूंजी निकासी। एक चौथा फैक्टर भी मौजूद है- एआई की चुनौती। हालांकि भारत एआई एप्लिकेशंस में उपयोग होने वाले सेमीकंडक्टर चिप के लिए निर्माण इकाइयां (फैब) स्थापित कर रहा है, फिर भी उसे मूलतः एक एआई-वेयरहाउस के रूप में ही देखा जाता है, जहां दर्जनों डेटा केंद्र पश्चिमी देशों के तेजी से बढ़ते एआई इकोसिस्टम की जरूरतों को पूरा करने के लिए गीगावाट स्तर की बिजली का उपयोग करते हैं। ऐसे में कहीं भारत दुनिया के एआई उद्योग के लिए केवल आउटसोर्स कंप्यूटिंग पावर वेंडर बनकर न रह जाए। जब तक हमारा अपना एआई इकोसिस्टम परिपक्व नहीं हो जाता, तब तक यह धारणा भी भारतीय शेयरों के मूल्यांकन को प्रभावित करेगी।
ऐसे में सरकारी सिक्योरिटी और सूचीबद्ध बॉन्डों में विदेशी निवेशकों के लिए किए गए सुधार हमारी विकास-कथा के लिए वैश्विक रुचि को पुनर्जीवित करने में सहायक होंगे। भारत को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को संतुष्ट करने के लिए आधे-अधूरे नहीं, ऐसे निर्णायक टैक्स सुधारों की आवश्यकता है, जो राजकोषीय दृष्टि से भी विवेकपूर्ण हों और एफपीआई तथा एफआईआई को यह भरोसा भी दिलाएं कि भारत निवेश के लिए आकर्षक और विश्वसनीय गंतव्य है। एलटीसीजी को 2023 में भारतीय और विदेशी, दोनों प्रकार के निवेशकों के लिए अविवेकपूर्ण ढंग से 10% से बढ़ाकर 12.5% कर दिया गया था। अब सूचीबद्ध शेयरों और बॉन्डों के लिए इसे 5% किया जाना चाहिए। शेयरों पर एलटीसीजी (अचल संपत्ति को छोड़कर) से प्राप्त कुल कर राजस्व लगभग 35,000 करोड़ रुपये के आसपास होगा। भारत का कुल वार्षिक कर राजस्व लगभग 40 लाख करोड़ रुपये है। इसमें कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत आयकर से लगभग 22 लाख करोड़ रुपये मिलते हैं। अप्रत्यक्ष कर (जीएसटी, सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क) से लगभग 18 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व आता है। इस प्रकार सूचीबद्ध शेयरों पर एलटीसीजी कर को 12.5% से घटाकर 5% करने से सरकारी राजकोष पर कुल कर राजस्व का 0.5% से भी कम भार पड़ेगा। लेकिन इसका प्रभाव एफपीआई और एसआईपी के माध्यम से निवेश करने वाले भारतीय निवेशकों, दोनों पर पड़ेगा। कारोबार में होने वाली तेज वृद्धि एलटीसीजी कर से होने वाले मामूली राजस्व-नुकसान की भरपाई कर देगी। यह सभी पक्षों के लिए फायदे का सौदा होगा। भारत की ग्रोथ-स्टोरी अब भी मजबूत है, लेकिन वैश्विक पूंजी लाभकारी अवसरों की तलाश करती है। बीएसई और एनएसई में मिलाकर 8,367 सूचीबद्ध कंपनियां हैं। इनमें से 1,000 से अधिक उच्च गुणवत्ता वाले शेयर हैं, जो विदेशी निवेशकों को आकर्षित करते हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को पुनः भारत की ओर खींचने के लिए व्यावहारिक कर नीतियां अपनानी होंगी। एलटीसीजी को 5% करने भर से हम चीन पर बढ़त हासिल कर लेंगे, क्योंकि चीन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों पर 10% दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर लगाता है। यह भी याद रखना चाहिए कि 2004 से 2018 तक, भारत में सूचीबद्ध शेयरों पर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर शून्य था। इसे 2018 में बढ़ाकर 10% किया गया और फिर 2023 में 12.5% कर दिया गया था। हमें सूझबूझ के साथ दुनिया से प्रतिस्पर्धा करनी होगी। जैसे-जैसे भू-राजनीतिक तनाव कम होंगे, तेल की कीमतें घटेंगी, रुपया स्थिर होगा और हमारा एआई इकोसिस्टम परिपक्व होगा, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक वापस लौटेंगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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