मेंटल हेल्थ- पेरेंट्स से मिलने पर ट्रिगर होता चाइल्डहुड ट्राॅमा:  वे आज भी बहुत लड़ते हैं, एक-दूसरे को ताने देते हैं, क्या करूं
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मेंटल हेल्थ- पेरेंट्स से मिलने पर ट्रिगर होता चाइल्डहुड ट्राॅमा: वे आज भी बहुत लड़ते हैं, एक-दूसरे को ताने देते हैं, क्या करूं

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4 घंटे पहले

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सवाल- मेरी उम्र 40 साल है। मेरे पेरेंट्स काफी बूढ़े और कमजोर हो चुके हैं। लेकिन मैं जब भी उनसे मिलती हूं, तो मेरे बचपन का पुराना ट्रॉमा ट्रिगर हो जाता है। मेरे पेरेंट्स एक-दूसरे को बहुत नापसंद करते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने पूरी जिंदगी साथ बिता दी। आज भी वो हर वक्त आपस में सिर्फ लड़ते रहते हैं।

उन्हें देखकर बहुत अजीब लगता है कि लोग कैसे पूरी-पूरी जिंदगी खुद को सप्रेस करके बिता देते हैं। जब तक मैं उनसे दूर रहती हूं, सब ठीक रहता है। लेकिन उनके पास जाते ही मुझे अजीब सी उदासी और डिप्रेशन घेर लेता है। क्या ये PTSD (पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) है? मैं इस सिचुएशन को ज्यादा माइंडफुली कैसे हैंडल करूं?

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आपकी परेशानी को गंभीरता से समझने की जरूरत है। आपने सवाल में जितनी बातें कही हैं, सिर्फ उनके आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि आपको PTSD या कोई दूसरी मानसिक बीमारी है। लेकिन यह साफ है कि माता-पिता के साथ रहना आपके लिए भावनात्मक रूप से मुश्किल है।

बचपन के माहौल का असर

अगर किसी बच्चे ने अपने पेरेंट्स को हमेशा लड़ते-झगड़ते, एक-दूसरे को नीचा दिखाते या तनाव में रहते देखा हो, तो इसका असर लंबे समय तक उसकी मेमोरी में रह सकता है। बच्चे के लिए घर का मतलब है– सुरक्षा। लेकिन जब उसी जगह पर लगातार तनाव हो, तो बच्चे को लग सकता है कि जीवन में कुछ भी सुरक्षित या स्थिर नहीं है।

आज जब आप अपने माता-पिता को उसी तरह लड़ते देखती हैं, तो बचपन की वही बेबसी फिर महसूस हो सकती है। उस समय आप छोटी थीं। न वहां से निकल सकती थीं और न उनके झगड़े को रोक सकती थीं।

लेकिन आज स्थिति अलग है। अब आप बड़ी हैं और अपने फैसले खुद ले सकती हैं। लेकिन बावजूद इसके आपका इमोशनल रिएक्शन वही पुराना वाला हो सकता है। आपके मामले में तीन भावनाएं एक साथ काम कर सकती हैं।

1. पुरानी बेबसी

उनके झगड़े आपको उस समय में वापस ले जा सकते हैं, जब आप कुछ बदल नहीं सकती थीं।

2. आज का तनाव

आपके माता-पिता अभी भी लड़ते हैं। इसलिए परेशानी सिर्फ अतीत की नहीं है। मौजूदा माहौल भी आपको प्रभावित कर रहा है।

3. दुख और अपराधबोध

उन्हें बूढ़ा और कमजोर देखकर आपको उस परिवार के लिए भी दुख हो सकता है, जिसकी आपने बचपन में उम्मीद की थी। साथ ही उनकी देखभाल का दबाव भी महसूस हो सकता है।

इन अनुभवों का असर जीवन के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है। जैसेकि–

  • हर किसी के मूड पर नजर रखना।
  • बहस से बचना।
  • अपनी जरूरतें न बता पाना।
  • दूसरों को खुश करना।

लेकिन इन चीजों को देखकर खुद से किसी बीमारी का नाम देना जरूरी नहीं है। इन्हें ऐसे पैटर्न की तरह देखें, जिन्हें समझने की जरूरत है।

क्या यह PTSD है?

हर दर्दनाक या परेशान करने वाला बचपन PTSD नहीं होता। ट्रॉमा किसी ऐसे अनुभव और उसके लंबे असर को कहा जा सकता है, जिसने व्यक्ति को गहराई से प्रभावित किया हो। वहीं PTSD एक खास मेंटल हेल्थ कंडीशन है। कुछ लोगों में बचपन के मुश्किल अनुभवों के बाद उदासी, चिंता, अपराधबोध या रिश्तों में परेशानी हो सकती है, लेकिन उन्हें PTSD नहीं होता।

इसलिए सिर्फ माता-पिता से मिलते ही उदास होना PTSD का प्रमाण नहीं है। अगर बचपन में हिंसा या दुर्व्यवहार हुआ था, तो इस बारे में किसी मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से विस्तार से बात करना जरूरी है।

पेरेंट्स से मिलने पर क्या ट्रिगर होता है?

माता-पिता के घर पहुंचते ही पुराना माहौल कई तरह की भावनाएं जगा सकता है। किसी की ऊंची आवाज, एक-दूसरे को बुरा कहना, पुराना झगड़ा या किसी एक का पक्ष लेने का दबाव आपको फिर उसी भूमिका में पहुंचा सकता है, जिसमें आप बचपन में थीं। पेरेंट्स से मिलने पर ये फीलिंग्स ट्रिगर हो सकती हैं–

इन ट्रिगर्स को पहचानना ही बदलाव की पहली सीढ़ी है।

दो हफ्तों की सेल्फ एक्सरसाइज

अपने अनुभवों को बेहतर ढंग से समझने के लिए आप दो हफ्ते तक एक डायरी मेन्टेन करें। इसमें आपको पेरेंट्स से मिलने से पहले और बाद के अपने इमोशंस का ट्रैक रिकॉर्ड रखना है। यह कोई मेडिकल टेस्ट नहीं है। इस एक्सरसाइज का मकसद सिर्फ अपने पैटर्न को समझना है।

हर मुलाकात से पहले और बाद में डायरी में ये बातें नोट करें।

ट्रिगर क्या था?

  1. क्या आवाज ऊंची हुई?
  2. क्या किसी ने आलोचना की?
  3. क्या दोनों चुप रहे?
  4. क्या आपसे किसी एक का पक्ष लेने को कहा गया?
  5. आपने क्या महसूस किया?
  6. (जैसेकि उदासी, डर, गुस्सा, तनाव, सुन्नपन या खुद को बहुत छोटा।)

मन में क्या विचार आया?

  1. “मुझे इनका झगड़ा रोकना चाहिए।”
  2. “मेरी जरूरतें मायने नहीं रखतीं।”
  3. “अगर मैं चली गई तो मैं स्वार्थी हूं।”

आपने क्या किया?

  1. झगड़ा रोकने की कोशिश की।
  2. किसी एक को शांत किया।
  3. चुप हो गईं, वहां से चली गईं।
  4. बाद में उसी घटना को बार-बार सोचती रहीं?

असर कितना हुआ?

  1. अपनी परेशानी को 0 से 10 के बीच अंक दें।
  2. साथ ही देखें कि सामान्य होने में कितना समय लगा।
  3. क्या नींद, काम या दूसरे रिश्तों पर भी असर पड़ा?

खुद से पूछें ये 5 सवाल

ऐसे समय में अपने विचारों को समझना भी जरूरी है। खुद से पूछें कि अभी क्या हो रहा है। इससे भावनाओं और पुराने अनुभवों के बीच फर्क करना आसान हो सकता है। यह भी देखें कि यह उदासी सिर्फ माता-पिता के साथ ही महसूस होती है या बाकी समय भी।

हर झगड़ा ठीक करना आपकी जिम्मेदारी नहीं

पेरेंट्स के झगड़े सुलझाना आपकी जिम्मेदारी नहीं है। आप उन्हें समझा सकती हैं। मदद की पेशकश कर सकती हैं। लेकिन उनके रिश्ते को ठीक करना सिर्फ आपकी जिम्मेदारी नहीं है। उसमें उन दोनों की भागीदारी जरूरी है। आप अपने लिए एक सीमा तय कर सकती हैं, जैसेकि–

“अगर आवाज ऊंची होगी या एक-दूसरे को अपशब्द कहे जाएंगे, तो मैं वहां से चली जाऊंगी।”

यह माता-पिता की उपेक्षा करना नहीं है। यह अपनी मानसिक शांति की रक्षा करना है।

चिंता और सोच में फर्क

माता-पिता के झगड़े के बाद बार-बार आपके मन में ये विचार आ सकते हैं–

  • “उन्होंने अपनी जिंदगी ऐसे क्यों बिताई?”
  • “वे एक-दूसरे के साथ क्यों रहे?”
  • “काश, मेरा बचपन अलग होता।”

इन सवालों का कोई आसान जवाब नहीं है। बार-बार इन्हीं बातों को सोचने से दुख बढ़ सकता है। इसलिए इसके बजाय खुद से पूछें-

“मैं अभी क्या कर सकती हूं?”

अगर कोई व्यावहारिक कदम है, तो वह उठाएं। जो चीज आपके कंट्रोल के बाहर है, उसे छोड़ दें।

माइंडफुलनेस का मतलब दुख सहना नहीं

माइंडफुलनेस का मतलब यह नहीं कि माता-पिता लड़ते रहें और आप चुपचाप सब सहती रहें। इसका मतलब है कि आप अपनी भावनाओं को पहचानें, लेकिन उसके हिसाब से तुरंत प्रतिक्रिया न दें।

अगर उनके झगड़े के दौरान तनाव बढ़ने लगे तो-

  • अपने दोनों पैर जमीन पर रखें।
  • आसपास की कुछ सामान्य चीजों को ध्यान से देखें।
  • खुद से कहें, “मैं अब 40 साल की हूं। मैं तय कर सकती हूं कि मुझे क्या करना है।”
  • जरूरत लगे तो कुछ देर बाहर टहल आएं।
  • आंखें बंद करें और धीरे-धीरे गहरी सांस लें।
  • अगर आंखें बंद करने से बेचैनी बढ़ती है, तो आंखें खुली रखें और आसपास की चीजों पर ध्यान दें।

शांत समय में पेरेंट्स से बात करें

अगर संभव हो तो दोनों से अलग-अलग और शांत समय में बात करें।

आप कह सकती हैं-

“मैं आप दोनों से प्यार करती हूं और चाहती हूं कि अब जिंदगी के इस पड़ाव पर माहौल में थोड़ा शांति रहे। जब आप दोनों तेज आवाज में लड़ते हैं या एक-दूसरे को बुरा कहते हैं, तो मुझे बहुत परेशानी होती है। मैं मदद करना चाहती हूं, लेकिन मैं किसी एक का पक्ष नहीं ले सकती।”

साथ ही पेरेंट्स के लिए भी कुछ छोटे नियम तय किए जा सकते हैं, जैसकि–

  • वे अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
  • एक समय में एक ही मुद्दे पर बात होगी।
  • गुस्सा बढ़ने पर बातचीत रोक दी जाएगी।
  • काउंसलिंग का विकल्प भी रखा जा सकता है।

जिम्मेदारी के साथ सेल्फ-केयर भी जरूरी

माता-पिता से मिलने के बाद अगर आपकी पुरानी भावनाएं और तनाव बढ़ जाते हैं, तो खुद की देखभाल को नजरअंदाज न करें। इसके अलावा सामान्य दिनों में भी अपने शरीर और मन की जरूरतों का ध्यान रखें, जैसेकि-

  • नींद और भूख को इग्नोर न करें।
  • समय पर हेल्दी खाना खाएं।
  • नींद को प्रिऑरिटी दें। सोने-जागने का समय फिक्स करें।
  • शरीर को आराम दें। थकान में खुद पर दबाव न डालें।
  • फिजिकल एक्टिविटी को डेली लाइफ का हिस्सा बनाएं।
  • अकेले न रहें। भरोसेमंद लोगों से जुड़ी रहें।
  • अपनी भावनाओं को एक्सप्रेस करें।
  • खुद को सिर्फ जिम्मेदारियों तक सीमित न करें। पसंद की चीजों के लिए समय निकालें।
  • पेरेंट्स से मुलाकात के बाद अपने लिए रिकवरी टाइम रखें।
  • अपनी मेंटल हेल्थ पर नजर रखें। उदासी और बेचैनी को इग्नोर न करें।
  • जरूरत महसूस हो तो मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से मदद लें।

अंतिम बात

माता-पिता की परवाह करना और उनके रिश्ते की जिम्मेदारी उठाना दो अलग बातें हैं। आप उनकी मदद कर सकती हैं, लेकिन उनकी लड़ाइयों का बोझ अपने ऊपर लेना जरूरी नहीं। अपनी सीमाएं तय करना स्वार्थ नहीं है। आपका मानसिक स्वास्थ्य भी उतनी ही देखभाल का हकदार है।

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ग्राफिक्स- महेंद्र वर्मा

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