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एप्स्टीन फाइल्स से मैं चौंकी नहीं, लेकिन मुझे ऐसा जरूर महसूस हुआ जैसे भीतर से खाली हो गई हूं। यह सब नया नहीं, जाना-पहचाना है। ताकत छिपाती है, बचाती है और जब शोर मचने लगे तो घबरा जाती है। जेफ्री एप्स्टीन को ही देखिए। सुर्खियां उसे राक्षस बता रही हैं, जबकि वह अकेला तो कभी था ही नहीं। उसके साथ एक पूरा नेटवर्क था- वित्तीय, सामाजिक, राजनीतिक और वैश्विक। और जब ऐसे नेटवर्क से परदा उठता है तो कोई इकलौता खलनायक सामने नहीं आता। परतें उधड़ती हैं। नाम उजागर होते हैं। महत्वपूर्ण संस्थान ऐसा जताने लगते हैं, जैसे उनकी याददाश्त जा चुकी हो। लेकिन यहां एक बेचैन करने वाली हकीकत भी है। समाज को सपाट कहानियां पसंद हैं। उसे फिल्मी विलेन सरीखे डरावने चेहरे चाहिए। हम चाहते हैं कि अपराधी देखने में ही खौफनाक लगे। और पीड़ित बहुत मासूम, बेदाग, निष्कवच हो। लेकिन ये दोनों ही फंतासियां हैं। असल अपराधी आकर्षक दिखते हैं- मिलनसार, परोपकारी, किसी डिनर गेस्ट जैसे। और असली पीड़ित आक्रोशित, डावांडोल, चोटिल होते हैं। खुद को यह झूठी तसल्ली मत दीजिए कि ऐसा तो पश्चिम में ही होता है। अपराध और ताकत में सांठगांठ है- लंदन-न्यूयॉर्क हो या भारत का कोई छोटा शहर। तरीका एक ही जैसा है : पहुंच, नेटवर्क और खामोशी। अपने यहां के उदाहरण ही देख लीजिए। 2012 के दिल्ली गैंग रेप के बाद देश उबल पड़ा था। कानून बदले गए। किशोर न्याय कानून संशोधित हुआ, ताकि जघन्य अपराधों में 16-18 साल के कुछ किशोरों पर भी वयस्कों की तरह मुकदमा चलाया जा सके। ये सुधार आक्रोश से निकला था, जरूरी भी था लेकिन उलझा-सा, राजनीति से प्रभावित और अस्थिर। हाई प्रोफाइल हिट एंड रन केसेस देखें। वर्षों तक मुकदमे और अपीलें चलती रहती हैं। भले आप फैसले से सहमत हों या नहीं, लेकिन यह साफ है कि पैसों से समय खरीदा जा सकता है। जरूरी नहीं कि ताकत हमेशा जवाबदेही को खत्म ही करे, वह उसे टाल भी देती है। और विलम्ब के अपने फायदे तो हैं ही। एप्स्टीन मामले में हर दस्तावेज तमाशा बन रहा है। जिसका नाम आया, हम उसे तत्काल दोषी ठहरा देते हैं। किसी के साधारण जुड़ाव को सहभागिता और नजदीकी का सबूत समझ लिया जाता है। यह खतरनाक है। एक फेमिनिस्ट के तौर पर मैं किसी भी ऐसे पुरुष के खिलाफ खड़ी रहूंगी, जो दोषी साबित हो। लेकिन ये नहीं चाहती कि पितृसत्ता का स्थान भीड़ का न्याय ले ले। सबूत तो मायने रखते ही हैं और निर्धारित प्रक्रिया भी जरूरी है। क्योंकि अगर हम इसे छोड़ देंगे तो न्याय को मजबूत नहीं, सस्ता कर देंगे। मैं दिखावटी गुस्से से थक चुकी हूं। मुझे ठोस आक्रोश चाहिए। मैं चाहती हूं कि पीड़ितों के मामले अच्छे से प्रबंधित हों, उन्हें सुरक्षा मिले और उन पर भरोसा किया जाए। मैं यह सुनते-सुनते थक गई हूं कि हमारे यहां ऐसा नहीं होता। अरे, होता है, हर जगह होता है। अभी और नाम सामने आएंगे। ऐसे नेटवर्क किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, धीरे-धीरे खुलते हैं- दस्तावेजों, बयानों, फ्लाइट लॉग्स और सिविल मुकदमों से। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या हम सावधानी से जांच करेंगे, या हर नई हेडलाइन पर महज भावनात्मक प्रतिक्रिया देकर शांत हो जाएंगे? क्यों ना हम डॉक्यूमेंटेशन शुरू कर दें। हैशटैग वाला गुस्सा नहीं। पक्षपाती नारे नहीं। असली, वैज्ञानिक आधार वाला और बिना किसी भय वाला न्याय। क्योंकि वास्तविक घोटाला एप्स्टीन फाइल्स नहीं, उन पर कायम चुप्पी थी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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