प्रियदर्शन का कॉलम:  नमक-सत्याग्रह से पहले हुआ था वह जल-सत्याग्रह
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प्रियदर्शन का कॉलम: नमक-सत्याग्रह से पहले हुआ था वह जल-सत्याग्रह

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5 घंटे पहले

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प्रियदर्शन लेखक और पत्रकार - Dainik Bhaskar

प्रियदर्शन लेखक और पत्रकार

20 मार्च 1927 को महाराष्ट्र (उन दिनों बॉम्बे प्रेसिडेंसी) के एक तालाब को हजारों दलित हाथों ने छुआ, उसमें से पानी पिया और उस जन-संघर्ष की शुरुआत की, जो अब तक जारी है। महाड सत्याग्रह के नाम से मशहूर इस आंदोलन का नेतृत्व बाबासाहेब आम्बेडकर ने किया था।

तब ढाई हजार दलित नागरिकों ने- जिनमें महिलाएं, बच्चे-बूढ़े सब शामिल थे- महाड के चादर तालाब तक चार-चार की कतार में जुलूस निकाला था और उसका पानी पीते हुए उस पर अपने कानूनी अधिकार की घोषणा की थी। इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। उन्हें मारा-पीटा गया। कई लोगों को घर छोड़ना पड़ा। तालाब का “शुद्धिकरण’ किया गया।

आम्बेडकर ने इसकी तुलना 1789 की फ्रांसीसी क्रांति से पहले हुई वर्साय बैठक से की थी। महात्मा गांधी ने भी इस सत्याग्रह की तारीफ की थी। लेकिन यह जल-संघर्ष अभी जारी रहना था। अगड़ी जातियों ने अदालत जाकर तालाब से दलितों को दूर रखने का आदेश मांगा था। दस साल यह लड़ाई चलती रही- 1937 में बॉम्बे हाइकोर्ट ने फैसला सुनाया कि- तालाब नगर पालिका का है, उसके पानी पर सबका अधिकार है।

कहने की जरूरत नहीं कि उस लड़ाई के बावजूद और भारतीय संविधान में अस्पृश्यता को अपराध करार दिए जाने के बाद भी, बहुसंख्य समाज इसे स्वीकृति देने को तैयार नहीं है। दहेज उन्मूलन या सम्पत्ति में स्त्रियों के अधिकार की तरह कुओं-तालाबों का पानी लेने का अधिकार भी बहुत सारे दलितों को हासिल नहीं है।

इसी 20 मार्च को ‘द हिंदू’ में जाने-माने वकील संजय हेगड़े ने एक टिप्पणी लिखकर महाड के इस जल-सत्याग्रह को दांडी के नमक-सत्याग्रह जितना ही महत्वपूर्ण माना है। उनका कहना है कि 1930 का नमक-सत्याग्रह अगर दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष का आह्वान था तो उससे तीन साल पहले 1927 में हुआ यह जल-सत्याग्रह देश की सबसे पुरानी गुलामी से मुक्ति का आंदोलन था।

इतिहास में इस सत्याग्रह को उसकी उचित जगह दी जानी चाहिए। उनका प्रस्ताव है कि चूंकि महाड सत्याग्रह के शती-वर्ष की शुरुआत हो रही है तो इस पूरे वर्ष ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, जो सामाजिक समानता के इस छूटे हुए संघर्ष को कुछ और आगे बढ़ा सकें।

महाड सत्याग्रह या ऐसे तमाम समतामूलक संघर्षों के एक सदी बाद इतना तो बदला है कि राजनीतिक तौर पर दलित अस्मिता की उपस्थिति को स्वीकार और सम्मानित किया जा रहा है। लेकिन इसके सामाजिक परिणाम अभी निकलने बाकी हैं।

यह परिणाम निकले, इसके लिए यह समझना और महसूस करना जरूरी है कि महाड सत्याग्रह सिर्फ दलितों के संघर्ष का इतिहास नहीं, समानता चाहने वाले सभी लोगों के संघर्ष का इतिहास है। इसमें सबकी भागीदारी होनी चाहिए और बिल्कुल सामाजिक स्तर पर होनी चाहिए।

अभी तो स्थिति यह है कि मुख्यधारा की राजनीति तमाम ऐसे आंदोलनों को जातिवादी आधार पर तोड़ने और उनके अनुकूलन में जुटी है। दलित, पिछड़ा या अगड़ा पहचानें चुनावी शतरंज पर मोहरों की तरह इस्तेमाल की जा रही हैं।

आम्बेडकर के सूत्र, पेरियार के सिद्धांत या कांशीराम के सुझाव भुला दिए गए हैं- गठजोड़वाद भर बचा है, जो समानता की लड़ाई को ही अविश्वसनीय बना दे रहा है। इसका फायदा साम्प्रदायिक राजनीति उठा रही है। अल्पसंख्यकों को तो इस राजनीतिक विमर्श के हाशिए पर डाल दिया गया है।

ऐसे में महाड की स्मृति उस जरूरी नश्तर का काम कर सकती है, जो इस मर्ज को समाज की देह से काटकर अलग कर सके। बेशक, यह आसान नहीं है, लेकिन इसे दलित संघर्ष की तरह नहीं, भारत में बराबरी के बचे-खुचे संघर्ष को पुनर्जीवित करने की मुहिम की तरह देखा जाए तो शायद इसके अच्छे परिणाम निकलेंगे।

1930 का नमक-सत्याग्रह अगर दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष का आह्वान था तो उससे तीन साल पहले 1927 में हुआ यह जल-सत्याग्रह देश की सबसे पुरानी गुलामी से मुक्ति का आंदोलन था।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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