शेखर गुप्ता का कॉलम:  युद्ध के दौर में हम अपने विकल्प चुन रहे हैं
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शेखर गुप्ता का कॉलम: युद्ध के दौर में हम अपने विकल्प चुन रहे हैं

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कोई भी युद्ध कहीं भी हो, बुरा है। खासकर वह युद्ध तो और बुरा है, जो हमारे इलाके के इतना पास हो और हमारी एनर्जी की सप्लाई को दबा रहा हो। खाड़ी के देशों में लगभग 1 करोड़ भारतीय कामगार काम कर रहे हैं, उन देशों से बड़े स्तर पर हमारा आपसी निवेश हुआ है और तीन दशकों से उनसे हमारी रणनीतिक साझेदारी बनती रही है। लेकिन युद्ध पर चल रही चर्चाओं को देश में जारी बहस के नजरिए से भी देखा जा सकता है। भाजपा/केंद्र सरकार के समर्थक हमें समझाना चाहेंगे कि यह युद्ध दिखाता है भारत अब परिपक्व हो गया है; कि सरकार ने बहुत समझदारी से कदम उठाए हैं। उसने अरब देशों से दोस्ती मजबूत करने के साथ-साथ ईरान के साथ भी संतुलन बनाए रखा है, जबकि ईरान से युद्ध कर रहे अपने रणनीतिक पार्टनरों अमेरिका और इजराइल की वह चुपचाप तारीफ भी करती रही है। यहां यह बता दें कि मध्य-पूर्व में अब भारत के सात औपचारिक रणनीतिक पार्टनर हैं : यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, कतर, ओमान, कुवैत और इजराइल। आलोचक कहेंगे कि ईरान पर हमले की नहीं, तो कम-से-कम इस युद्ध की निंदा न करके हमने अपनी रणनीतिक आजादी खो दी है; कि भारत अमेरिका और इजराइल पर इतना निर्भर हो गया है कि उसने अपनी निष्पक्षता छोड़ दी है; कि भारत अपने ‘पुराने और भरोसेमंद दोस्त’ ईरान के प्रति इतना असंवेदनशील कैसे हो सकता है? भारत ऑपरेशन सिंदूर को लेकर ट्रम्प के दावों और टैरिफ के मामले में हुई बेइज्जती का जवाब तक नहीं दे पाया। इजराइल के प्रति भारत जो ज्यादा प्रतिबद्धता दिखा रहा है, उसके लिए भाजपा की मुस्लिम विरोधी राजनीति को जिम्मेदार बताया जा रहा है। वैसे इजराइल वाला मामला उलझा हुआ है। सच यह है कि ज्यादातर मुस्लिम दुनिया ईरान विरोधी खेमे में है। खाड़ी के अरब देश क्या हैं? खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य देशों पर ईरानी हमले की निंदा का जो संयुक्त प्रस्ताव रियाद में जारी हुआ, उसमें तुर्किये, अजरबैजान और पाकिस्तान भी शामिल थे। इन देशों की कुल मुस्लिम आबादी ईरान की आबादी से पांच गुना ज्यादा है। सरकार के समर्थक कहेंगे कि जरा देखिए इस उथल-पुथल में भारत कितनी मजबूत स्थिति में है, जबकि पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ किए गए सुरक्षा वादों और ईरान के प्रति समर्थन दिखाने की उलझन में फंसा है। ये समर्थक कहेंगे कि जरा होर्मुज को पार कर रहे टैंकरों को देखिए, कोच्चि में सुरक्षित खड़े ईरानी नौसेना के जहाज को देखिए और यह भी देखिए कि खाड़ी देशों के नेताओं के साथ ही नहीं बल्कि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से भी मोदी की फोन पर कितनी बातचीत हो रही है। यह भी देखिए कि एक महीने से ट्रम्प ने हमारे खिलाफ कोई कड़ी बात नहीं कही है। इसे हम दो और नजरियों से भी समझ सकते हैं। एक पक्ष ऊपर कही गई बातों को देखकर सोचता है कि भारत अपनी क्षमताओं से ज्यादा कर पा रहा है। दूसरा पक्ष सोचता है कि गांधी और नेहरू के मूल्यों से भारत को जो पारंपरिक ताकत मिली थी, वह कमजोर हुई है। पहले हमें कितनी गंभीरता से लिया जाता था। अपनी रणनीतिक आजादी के साथ ही वह सब खो दिया गया है। इसलिए भारत अपनी हैसियत से कम हासिल कर रहा है। दोनों पक्ष गलत हैं और भ्रम में हैं। आजादी के बाद के कांग्रेस दौर में और अब मोदी के दौर में भी भारत अपनी हैसियत के हिसाब से ही हासिल करता रहा है, लेकिन उसे अपनी ताकत और प्रभाव को लेकर हमेशा एक बड़ा भ्रम रहा है- पहले अपनी नैतिक, दार्शनिक और वैचारिक ताकत को लेकर; और अब अपनी रणनीतिक, आर्थिक ताकत को लेकर। दुनिया को उपदेश देना हमारा राष्ट्रीय शौक रहा है। यह शौक तब भी था जब हमारी प्रति व्यक्ति आय 92 डॉलर थी (1962 में) और अब भी है जब यह 3,000 डॉलर के करीब है। आत्म-छवि किसी भी देश की ताकत का मुख्य हिस्सा होती है, लेकिन कई दूसरे पहलू भी अहम हैं। पहले हम आर्थिक रूप से कमजोर थे, सैन्य खतरों के दबाव में थे, सोवियत संघ के साथ रणनीतिक रूप से जुड़े थे और लंबे समय तक हमें खाद्य सहायता की जरूरत पड़ी। अगर हम 1956 में हंगरी, 1968 में चेकोस्लोवाकिया और 1978 में कंबोडिया पर सोवियत हमले पर चुप रहे, तो इससे साफ दिखता है कि हमारे पास कितनी रणनीतिक आजादी थी। फिर भी हम 1971 में निक्सन और किसिंजर के सामने मजबूती से खड़े हो सके थे। इससे पता चलता है कि सोवियत संघ के साथ समझौते और हरित क्रांति के कारण हमने कितनी रणनीतिक ताकत हासिल कर ली थी। आज जब हमारी प्रति व्यक्ति आय 3,000 डॉलर है (मध्यम आय से भी कम स्तर पर) और हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं, तब हम अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी कर सकते हैं और साथ ही रूस के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रख सकते हैं; चीन, यूरोप, ब्रिटेन, कनाडा के साथ संबंधों में संतुलन रख सकते हैं; और कई मध्यम ताकत वाले देश भारत के साथ संबंध बढ़ाने में फायदा देख रहे हैं। इजराइल हमारा एक बड़ा रणनीतिक पार्टनर है और अरब देश करीबी दोस्त हैं। हमने ईरान के साथ भी कम-से-कम नागरिक स्तर के संबंध बनाए रखे हैं। दुनिया भर में कई तरह की निर्भरताओं के साथ किसी देश की यही सीमाएं होती हैं। रक्षा के मामले में उसे अमेरिका, रूस, इजराइल, फ्रांस पर निर्भर रहना पड़ता है; ऊर्जा के लिए रूस पर; सस्ती इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए चीन पर; रोजगार के लिए खाड़ी देशों और अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ता है। इन निर्भरताओं को देखते हुए भारत की नई ताकत को लेकर ज्यादा उत्साह नहीं होना चाहिए। यही वजह है कि भारत रूस को यूक्रेन पर खुलकर कुछ नहीं कह सकता, अमेरिका-इजराइल गठजोड़ को ईरान पर नहीं टोक सकता और ईरान से यह सवाल नहीं पूछ सकता कि वह अलग-अलग देशों में उग्रवादी समूहों को समर्थन क्यों देता है? यही वजह है कि भारत को एलएसी पर चीन की गतिविधियों को भी सहना पड़ता है। सभी देशों की तरह भारत भी अपनी ताकत और मौके के हिसाब से फैसले करता है। इसी दायरे में भारत अपने विकल्प चुन रहा है और अपनी हैसियत के मुताबिक कोशिश कर रहा है। हमें सबसे पहले अपने हितों का ध्यान रखना होता है…
दुनिया के देशों पर निर्भरताओं के चलते ही भारत रूस को यूक्रेन पर खुलकर कुछ नहीं कह सकता, अमेरिका-इजराइल गठजोड़ को ईरान पर नहीं टोक सकता और ईरान से यह नहीं पूछ सकता कि वह अलग-अलग देशों में उग्रवादी समूहों को समर्थन क्यों देता है?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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