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हाल ही में जब अभिनेत्री तृषा को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय के स्वतंत्रता दिवस समारोह में देखा गया, तो इसके बाद तूफान खड़ा हो गया। तृषा वहां प्रमुख स्थान पर बैठी थीं और विजय के परिवार के सदस्यों से बातचीत कर रही थीं। इसके बाद तो राजनीतिक तंज, सोशल मीडिया पर अटकलों और- जाहिर है- दोनों के रिश्तों को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू होना ही था। लेकिन सबसे पहले हमें सिर्फ एक सवाल पूछना चाहिए : हर बार स्त्री ही क्यों ऐसी किसी कहानी की पात्र बन जाती है? ‘दूसरी औरत’ समाज के सबसे पुराने और स्थायी खलचरित्रों में से एक है। उसे ऐसी महिला के रूप में देखा जाता है, जो पुरुष को बहकाती है, घर तोड़ती है, महत्वाकांक्षी है और उस जगह घुसपैठ कर बैठती है, जहां उसका कोई अधिकार नहीं था। उसने क्या पहना है, वह कहां बैठी है, उसने किसका अभिवादन किया है और कितनी गर्मजोशी से मुस्कराई है- हर चीज का मुआयना किया जाता है। जबकि कहानी के केंद्र में मौजूद पुरुष अकसर “पैसिव’ दिखलाया जाता है- मानो उसके आसपास सब कुछ अपने-आप होता रहा हो। यह किसी खास रिश्ते का बचाव नहीं है, क्योंकि विजय और तृषा की निजी जिंदगी की सच्चाई गढ़ना हमारा काम नहीं है। पर यह इस बात पर टिप्पणी जरूर है कि किस तरह सार्वजनिक अटकलें बहुत जल्दी महिलाओं पर नैतिक जिम्मेदारी डाल देती हैं, जबकि पुरुष की भूमिका को नजरअंदाज कर दिया जाता है। अगर ताकतवर पोजिशन पर मौजूद कोई पुरुष किसी महिला को बुलाने, उसे अपने साथ शामिल करने, उससे मित्रता करने या मेलजोल रखने का फैसला करता है, तो वह उसका अपना निर्णय है। अगर उनमें कोई रिश्ता है, तो इस कथानक में भी पुरुष असहाय पात्र नहीं है। वह वयस्क है। उसकी अपनी इच्छा है। वह अपने फैसले खुद लेता है। पर पितृसत्ता महिलाओं को ही एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी करना आसान समझती है। शायद इसलिए कि महत्वाकांक्षी स्त्री आज भी हमें असहज करती है। आकर्षक स्त्री हमें संशय में डालती है। और अगर कोई महिला किसी जगह पर अपनी मौजूदगी के लिए “अपोलोजेटिक’ नहीं है, तो वह देखते ही देखते लोगों के निशाने पर आ सकती है। हम आज भी महिलाओं को मर्यादित, संकोची और नैतिक रूप से आश्वस्त करने वाली ही देखना पसंद करते हैं। अगर वे खूबसूरत, सफल और सत्ता के करीब हों, तो हम उनके दोषी होने के सबूत तलाशने लगते हैं। हम पुरुष के निर्णयों पर भी इतनी ही शिद्दत से सवाल क्यों नहीं उठाते? आखिर सत्ता में होने भर से व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता कम नहीं होती; उलटे और बढ़ जाती है। प्रभावशाली पुरुषों को उनके निजी या पेशेवर संबंधों में निष्क्रिय-पक्ष की तरह पेश करना सिर्फ लैंगिक भेदभाव ही नहीं है- यह बेतुका भी है। सदियों से महिलाएं पुरुषों के फैसलों के परिणाम ढोती आई हैं : पत्नियों से विवाह बचाए रखने की उम्मीद की जाती है, मांओं से परिवार को जोड़े रखने की, बेटियों से परिवार की ‘इज्जत’ बचाने की और ‘दूसरी औरतों’ से दोष अपने सिर लेने की। शायद अब इस पटकथा को बदलने का समय आ गया है। इस प्रसंग में फेमिनिस्ट-दृष्टिकोण का प्रश्न सीधा-सरल है : हम महिलाओं को पुरुषों के फैसलों की नैतिक जिम्मेदार मानना कब बंद करेंगे?
जब तक हम ऐसा नहीं करेंगे, हर कथित ‘दूसरी औरत’ को जनमत की अदालत के कठघरे में खड़ा किया जाता रहेगा- जबकि पुरुष आरामदेह तरीके से दोषारोपण की फ्रेम के बाहर निकल जाएगा!
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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