- Hindi News
- Opinion
- Rashmi Bansal’s Column You Don’t Need A Designer Label To Make Your Status
9 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर
एक फैशन शो की रील पर मेरी नजर पड़ी, जिसमें मॉडल्स ने अजीबोगरीब कपड़े पहने थे। लेकिन पैरों में कोल्हापुरी चप्पल। जी हां, अपने शुद्ध देसी फुटवियर का स्टेटस बदल गया है। आम आदमी की चहेती यह चप्पल अब आम नहीं, खास है।
देखिए, कीचड़-करकट में हमें ना ले जाइए। बस स्टैंड, रिक्शा, ट्रेन- इनमें सफर करना हमें अच्छा नहीं लगता। एसी गाड़ी में तो सफर होना ही चाहिए। आप हमें तभी पहनिए जब किसी सहूलियत वाली जगह पर जाना हो। जैसे मॉल, 5 स्टार क्लब।
क्या? क्लब में चप्पल के साथ एंट्री अलाउड नहीं है? छी,छी छी, कितनी पुरानी सोच। देखिए, मैं प्रादा ब्रांड की बेटी हूं, जो इटली में बहुत फेमस है। वैसे तो यह चप्पल इंडिया में 300 की बिकती है, लेकिन हमारा लेबल चिपकाते ही, देखो जादू। अब लोग इसे 30 हजार में खरीदेंगे।
जादू हम करते हैं आइटम पर नहीं, कस्टमर के दिमाग पर। मैगजीन में, होर्डिंग पर और रील्स में हम सपनों की दुनिया दिखाते हैं। जहां ग्वारफली के आकार की लड़कियां हमारे कपड़े-जूते पहन कर रैम्प वॉक करती हैं। सपना इसलिए कि एक साल तक सिर्फ ग्वारफली खाओगे, तब भी मॉडल जैसे पतले ना हो पाओगे।
दादी इनकी शक्ल देख कर कहेगी, हड्डी-हड्डी व्हे री यो छोरी। ईने म्हारे कने लइजे, एक हफ्तो में खिला-पिला के थोड़ो तो शरीर बनेगो। पर दादी क्या जाने, यही तो आज का फैशन है। भरपूर आहार के जमाने में अकाल पीड़ित जैसा दिखना कोई मामूली बात नहीं!
खैर, अब इस डिजाइनर चप्पल के साथ का लुक कम्प्लीट करने के लिए हमारे इटालियन, फ्रेंच और जापानी दिग्गजों ने खूब सोचा। कौन-सा दूसरा प्रोडक्ट मार्केट में लाया जाए। काफी विचार-विमर्श के बाद उन्हें एक ऐसी चीज मिली, जिसके बारे में सुनकर आप हक्के-बक्के रह जाएंगे।
इंट्रोड्यूसिंग द हाइट ऑफ लग्जरी- थाइली टोटे बैग। जूट का यह बैग ना केवल सस्टेनेबल, बल्कि मिनिमलिस्टिक भी है। मतलब इंडिया में मिनिमम दाम पर मिलता है, तो हमारा प्रॉफिट एक लाख प्रतिशत। ये वो बैग हैं जो किराने की दुकान वाले फ्री में देते हैं, जिस पर रमेश नमकीन या चेतक स्वीट्स का नाम एक किलोमीटर की दूरी से भी दिखता है।
दादी बोली, आयो होगो कोई गोरो, वणी ने बैग पसंद आयो, ले गयो वापिस। ईने कोई पूछ्यो होगो किधर लियो यो बैग। तो वणी सोचियो, ये आईटम बेचनो चइये। दादी सेंट परसेंट करेक्ट। तो अब थाइली बैग बिक रहा है, अमेरिका के नॉर्डस्ट्रोम में, 48 डॉलर यानी 4 हजार रुपए में।
4 हजार रुपए में तो एक परिवार का महीने का राशन मिल जाता है। अरे याद आया, सपनों की दुनिया में राशन की जरूरत कहां। तो सिर्फ बैग के साथ काम चल जाएगा। ज्यादा भूख लगी तो अपने नाखून को चबाना अलाउड है, और आस-पास वालों का दिमाग खाना भी।
दादी बोली, आजकल कणी दवाई मिले, पतलो होनो वास्ते। ओह दादी, आपको भी पता है ओजेम्पिक के बारे में। क्या बताएं, एक दिन इंसान नॉर्मल दिखता है, दो महीने बाद एक सूखे पत्ते की तरह हवा में उड़ता हुआ। मुम्बई पुलिस ने तो करण जौहर को नोटिस भेजा, मरीन ड्राइव पर चलना आपको सख्त मना है।
ना दादी ना, तेरे को चिंता करने की जरूरत नहीं। मैं ना तो यह दवा लेने वाली हूं, और ना कोई खाने से परहेज। वो भी आपके हाथ का। गरम-गरम तड़के वाली दाल, घी वाले चावल, अचार-पापड़ और आपका प्यार। मेरे सपनों की दुनिया तो यही है।
जहां रही चप्पल की बात, मैं खरीदूंगी उसी कोलाबा कॉज-वे की दुकान से, जहां सालों से जाती हूं। अब तो नए-नए रंग आ गए हैं, और बेहतर सोल भी। अगर कोई मुझे कहे, लो 30 हजार रुपए, डिजाइनर चप्पल खरीद लो, तो मैं उन पैसों से 300 लोगों को भरपेट खाना खिला दूंगी।
मुझे अपना स्टेटस, अहमियत, पहचान बनाने के लिए किसी डिजाइनर लेबल की जरूरत नहीं। मैं इंडिया में इंडियन हाथों से बनी हुई चप्पल पहनकर गर्व महसूस करती हूं, रमेश नमकीन के नमकीन खाकर तृप्ति पाती हूं। शायद मेरा आकार लौकी, गाजर या बैंगन से मिलता हो, कोई बात नहीं। छोटे शॉर्ट्स में नहीं तो साड़ी में हर कोई खूबसूरत दिखता है! (ये लेखिका के अपने विचार हैं)








