गौरव पाठक3 घंटे पहले
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एक घर या प्लॉट का मालिक बनने का सपना कई बार तब कड़वे अनुभव में बदल जाता है, जब बिल्डर कब्जा देने में देरी कर देते हैं, मनमाने तरीके से दाम बढ़ा देते हैं या संदिग्ध गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं। ऐसी ही एक चिंताजनक प्रवृत्ति यह है कि कभी-कभार कुछ बिल्डर उस संपत्ति को ही किसी और को बेच देते हैं, जिस पर मुकदमा चल रहा होता है। हाल ही में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने चंद्रकांत खेर मामले (2025) में इस मुद्दे पर सुनवाई की। यह फैसला उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण सबक देता है।
क्या था विवाद? शिकायतकर्ता चंद्रकांत खेर ने साल 2006 में गाजियाबाद के जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स प्रोजेक्ट में एक आवासीय प्लॉट बुक किया था। 2012 में एग्रीमेंट टु सेल साइन हुआ, जिसमें प्लॉट की कीमत 38,99,780 रु. तय की गई थी। इसके बदले उपभोक्ता ने 25,95,814 की बड़ी रकम जमा कर दी। लेकिन इसके बावजूद बिल्डर ने पजेशन नहीं दिया। 2015 में नोटिस देने के बाद उपभोक्ता ने 2018 में दिल्ली राज्य आयोग में याचिका दायर की, जिसमें पजेशन और विलंब के लिए मुआवजे की मांग की गई।
राज्य आयोग का आदेश मार्च 2023 में दिल्ली राज्य आयोग ने माना कि बिल्डर सेवा में कमी का दोषी है। लेकिन उपभोक्ता की मुख्य मांग प्लॉट का पजेशन देने के बजाय आयोग ने रकम वापसी का आदेश दिया। इसके तहत बिल्डर को जमा राशि पर 6% ब्याज (दो महीने में भुगतान न करने पर 9%), मानसिक पीड़ा के लिए 2 लाख रुपए और मुकदमेबाजी के खर्च के लिए 50,000 रुपए चुकाने के आदेश दिए गए। शिकायतकर्ता इस निर्णय से असंतुष्ट था, क्योंकि उसकी मुख्य मांग धनवापसी नहीं, बल्कि प्लॉट के पजेशन की थी। इसलिए उसने एनसीडीआरसी में अपील दायर की।
अपील के दौरान प्लॉट की बिक्री आगे जो हुआ, वह कुछ बिल्डरों की चालबाजी का उदाहरण है। दिसंबर 2023 में बिल्डर ने वही प्लॉट तीसरे पक्ष को बेच दिया, जबकि मामला अदालत में विचाराधीन था और उपभोक्ता का पैसा अब भी बिल्डर के पास था। एनसीडीआरसी ने इस आचरण को अस्वीकार्य बताया। आयोग ने कहा कि ऐसी बिक्री ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लिस पेन्डेंस’ (विचाराधीन मुकदमे के दौरान संपत्ति का हक न बदलने का सिद्धांत) का उल्लंघन है। यह सिद्धांत कहता है कि मुकदमे के दौरान कोई भी पक्ष संपत्ति का ऐसा हस्तांतरण नहीं कर सकता, जिससे दूसरे पक्ष के अधिकार प्रभावित हों। आयोग ने इसे अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवा में स्पष्ट कमी माना।
एनसीडीआरसी ने क्या दिए निर्देश? एनसीडीआरसी ने राज्य आयोग के आदेश में संशोधन करते हुए बिल्डर को निर्देश दिए कि वह तीन महीने के भीतर उपभोक्ता को उसी प्रोजेक्ट या इलाके में समान क्षेत्रफल का वैकल्पिक प्लॉट उसी कीमत पर ऑफर करे, बशर्ते खरीदार शेष राशि का भुगतान कर दे। ऐसा प्लॉट उपलब्ध न कराने की स्थिति में पूरी राशि पर 18% ब्याज के साथ धनवापसी करनी होगी (भुगतान दो महीने से अधिक देर से होता है तो ब्याज 21% होगा)। मानसिक पीड़ा के 2 लाख रुपए और मुकदमे के खर्च के 50,000 रुपए का आदेश यथावत रखा गया। आयोग ने यह भी कहा कि बिल्डर ने वही प्लॉट तीसरे व्यक्ति को बहुत अधिक कीमत पर बेचकर अनुचित लाभ कमाया और उपभोक्ता को उसके वैध अधिकार से वंचित किया।
उपभोक्ताओं के लिए क्या हैं मायने? यह निर्णय कई महत्वपूर्ण सिद्धांतों को रेखांकित करता है: 1. पजेशन का अधिकार: यदि खरीदार ने पजेशन (कब्जे) की मांग की है, तो उपभोक्ता मंच को बिना उचित कारण के उसे धनवापसी में नहीं बदलना चाहिए। 2. धोखाधड़ी से सुरक्षा: मुकदमे के दौरान संपत्ति की बिक्री ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लिस पेन्डेंस’ के तहत अमान्य मानी जाएगी। 3.अनुचित व्यापार प्रथा: जो बिल्डर एक ही संपत्ति दो बार बेचकर मुनाफा कमाते हैं, उन्हें दंडात्मक ब्याज और मुआवजा दोनों देना होगा। 4.वास्तविकता-आधारित मुआवजा: संपत्तियों की बेतहाशा बढ़ती कीमतों के दौर में सिर्फ आंशिक ब्याज के साथ राशि लौटाना पर्याप्त नहीं है। ब्याज और क्षतिपूर्ति ऐसी होनी चाहिए कि उपभोक्ता के नुकसान की सही तरह से भरपाई हो सके।
(लेखक सीएएससी के सचिव भी हैं।)








