रसरंग में मायथोलॉजी:  नेपाल में इस तरह फला-फूला हिंदू धर्म, नाथ-जोगियों का रहा असर
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रसरंग में मायथोलॉजी: नेपाल में इस तरह फला-फूला हिंदू धर्म, नाथ-जोगियों का रहा असर

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देवदत्त पट्टनायक6 घंटे पहले

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नेपाल के डांग जिले में स्थित गोरक्ष मंदिर, जो योगी गोरखनाथ को
समर्पित है। - Dainik Bhaskar

नेपाल के डांग जिले में स्थित गोरक्ष मंदिर, जो योगी गोरखनाथ को समर्पित है।

पिछले सप्ताह हमने नेपाल के इतिहास पर बौद्ध धर्म के प्रभाव के बारे में जाना था। आज के लेख में हम समझेंगे कि कैसे वह प्रभाव घटता गया और नेपाल धीरे-धीरे हिंदू धर्म की ओर मुड़ता चला गया। भारत की तरह ही नेपाल में भी बौद्ध धर्म मुख्यतः व्यापारी समुदायों में फला-फूला, जबकि हिंदू धर्म कृषि-आधारित समुदायों में जड़ें जमाने लगा। इसलिए जब नेपाल की अर्थव्यवस्था में व्यापार का प्रभाव घटा और कृषि का वर्चस्व बढ़ा तो हिंदू धर्म के अनुयायियों की संख्या भी बढ़ती गई। बौद्ध अनुयायियों ने न केवल ब्रह्मचारी भिक्षुओं को संपत्ति और भूमि दान की, बल्कि उन पर विहार भी बनवाए। चूंकि भिक्षुओं की संतान नहीं होती थी, इसलिए इन संपत्तियों पर भिक्षु संघ का अधिकार होता था। इसके विपरीत, कृषक परिवारों की भूमि और संपत्ति उनकी संतानों को विरासत में मिलती थी।

इस परिवर्तन का श्रेय निस्संदेह आदि शंकराचार्य को दिया जाता है, जिन्होंने बौद्धिक वाद-विवादों के माध्यम से बौद्ध धर्म को चुनौती दी और भिक्षु-भिक्षुणियों को रहस्यमय तांत्रिक साधनाओं के बजाय सांसारिक जीवन अपनाने के लिए प्रेरित किया। यह भी मान्यता है कि उन्होंने बौद्ध पुण्यस्थलों को हिंदू मंदिरों में परिवर्तित किया, उनमें वैदिक विधियां स्थापित कीं और केरल के वैदिक पुजारियों की नियुक्ति की परंपरा शुरू की। हालांकि, गौतम बुद्ध और सम्राट अशोक की तरह 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य की नेपाल यात्रा का उल्लेख भी ऐतिहासिक तथ्य से अधिक एक आख्यान-सा प्रतीत होता है।

नेपाल पर शंकराचार्य के वैदिक प्रभाव के साथ-साथ वज्रयान बौद्ध धर्म के 64 महासिद्ध कवियों और उनकी ‘चर्या-पद’ कविताओं का भी गहरा प्रभाव पड़ा। इसके बाद 10वीं सदी में नाथ-जोगियों का नेपाल आगमन हुआ। माना जाता है कि इन उग्र तपस्वियों ने स्थानीय योगिनी देवियों और नाग-देवताओं को परास्त कर प्रकृति, विशेषकर मौसम पर नियंत्रण पाया। एक प्रसिद्ध आख्यान के अनुसार, जब गोरखनाथ अपने गुरु मत्स्येन्द्रनाथ का स्वागत करने हेतु ध्यान से उठे तो उनके आसन के नीचे दबे नाग बाहर निकल आए और नेपाल का लंबा सूखा समाप्त हुआ।

13वीं सदी तक आते-आते इस्लामी तुर्क सरदारों ने गंगा के मैदानों से आगे बढ़ते हुए बंगाल पर अधिकार कर लिया। परिणामस्वरूप, अनेक हिंदू नेपाल के राजाओं के पास शरण लेने लगे। उस समय नेपाल में मिथिला क्षेत्र से जुड़े मल्ल राजाओं का प्रभुत्व था। उन्होंने मनुस्मृति की संहिता को नेपाल में औपचारिक रूप से लागू किया, जिसके तहत नेपाल के 64 समुदायों को चार वर्णों में विभाजित किया गया। इन हिंदू राजाओं ने स्वयंभूनाथ जैसे बौद्ध तीर्थस्थलों, मत्स्येन्द्रनाथ और पशुपतिनाथ जैसे हिंदू तीर्थस्थलों तथा स्थानीय देवियों की उपासना को अपने राजसत्ता की वैधता का साधन बनाया। धीरे-धीरे नेपाल का अपना धार्मिक साहित्य विकसित हुआ, जैसे पशुपति पुराण, नेपाल माहात्म्य और हिमालय खंड जैसे ग्रंथ रचे गए। साथ ही, स्वस्थानी माता जैसी स्थानीय देवियों की व्रत-कथाओं में अन्य हिंदू देवी-देवताओं की कथाएं भी समाहित होने लगीं। इस प्रकार, नेपाल का क्षेत्र (नेपाल मंडल) विस्तृत हिंदू ब्रह्मांड के अंग के रूप में देखा जाने लगा।

तिब्बत के रास्ते नेपाल का चीन से संपर्क था। चीनी सम्राट चाहता था कि नेपाल उसे कर अदा करे, किंतु नेपाल ने इसे अस्वीकार किया। उस समय नेपाल में अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य थे, जिनमें आपसी झगड़े होते रहने के बावजूद उनके राजपरिवार परस्पर संबंधों से जुड़े थे और उनकी संस्कृति लगभग समान थी।18वीं सदी में नेपाल के उत्तर-पश्चिमी पहाड़ों के गोरखा (छेत्री) राजाओं ने पूरे नेपाल को एकीकृत किया। वे स्वयं को भारतीय राजपूतों का वंशज मानते थे। ‘गोरखा’ नाम महान नाथ योगी गोरखनाथ से आया है। नेपाल के एकीकरण के बाद राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 18वीं सदी में नेपाल को ‘असल हिंदुस्तान’ घोषित किया और देश निर्णायक रूप से हिंदू धर्म की ओर मुड़ गया। 19वीं सदी में उनके उत्तराधिकारियों ने ‘मुलुकी ऐन’ नामक विधि संहिता लागू की, जिसने समाज को जाति के आधार पर वर्गीकृत किया। इस व्यवस्था में ऊंची जातियों को जनेऊ धारण करने का अधिकार था। कुछ जातियों को दास बनाया जा सकता था, जबकि कुछ को नहीं। कुछ जातियों के लोगों से पानी लिया जा सकता था, पर उन्हें स्पर्श करना वर्जित था। वहीं कुछ से पानी लेना सख्त निषिद्ध था। इस प्रकार, शुद्धता और अशुद्धता की धारणा पर आधारित एक श्रेणीबद्ध समाज निर्मित हुआ, जिसमें प्रत्येक समुदाय के लिए अलग-अलग नियम लागू थे। 20वीं सदी में सती प्रथा और दासप्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया तथा जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था शुरू की गई। और अंततः 2008 में धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की स्थापना के साथ ही नेपाल का हिंदू राजतंत्र समाप्त हो गया। नेपाली हिंदू धर्म की प्रमुख विशेषता उसका उग्र रूप है, क्योंकि वह तांत्रिक देवियों, शिव और कनफटा नाथ जोगियों से जुड़ा है। दूसरी ओर, नेपाल में स्थानीय संगीत और नृत्य परंपराओं पर आधारित भक्ति आंदोलन नहीं फला-फूला।



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