गुणवंत शाह5 घंटे पहले
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टीवी पर हम रोज देखते हैं और अखबारों में पढ़ते हैं कि हमारे देश से सुदूर किसी देश में चल रहे युद्ध में कितने लोग मारे गए। मृतकों के आंकड़े बताए जाते हैं। लेकिन अब हम इन आंकड़ों के अभ्यस्त हो चले हैं। रोज हजारों निर्दोष मारे जाते हैं और अब तो हमारे भीतर अफसोस करने की भावना भी फीकी पड़ गई है।
एक अज्ञात कवयित्री ने लिखा है:‘मैं ऐसे बच्चे को जन्म देना चाहती हूं, जो मुझसे पूछे- मां!… मां!… युद्ध का मतलब क्या होता है?’
बुद्ध हार गए, महावीर हार गए, यीशु हार गए, पैगंबर हार गए… गांधी भी हार गए… सब हार गए, पर युद्ध नहीं हारा। हिंसा अब तक नहीं हारी। मारकाट का दौर आज भी जारी है।
दुर्योधन के सामने युधिष्ठिर हारते हैं, अर्जुन भी दुर्योधन के स्वभाव के आगे हार जाता है। शकुनि आज भी जिंदा है। वह जुए के पासों की तरह युद्ध की तैयारी में लगा हुआ है। उधर नेतन्याहू को चैन नहीं है और इजराइल को हिंसा से घृणा नहीं, बल्कि प्रेम है।
कवि ऑडेन ने लिखा है: ‘Let us honour if we can the vertical man, though we value none but the horizontal one.’
अर्थात्, ‘यदि संभव हो तो हम उस खड़े यानी सक्रिय मनुष्य का सम्मान करें, पर हम तो केवल आड़े यानी मृतप्राय लोगों का मूल्य समझते हैं और उन्हीं की पूजा करते हैं।’
आर्थर कोसलर अपनी पुस्तक ‘Janus: A Summing Up’ में लिखते हैं कि मानव इतिहास में कानों पर लगातार सुनाई देने वाली ध्वनि है तो वह है सैनिक बैंड की मधुर ध्वनि। एक अमेरिकी वैज्ञानिक अपनी किताब ‘द साइंटिस्ट स्पेक्युलेट्स’ में लिखते हैं: जब मेरे कानों में ‘बंदूक’ शब्द प्रवेश करता है, तब मैं अपने भीतर के संस्कारों को खंगालने लगता हूं।
उपरोक्त उद्धरण अर्जुन के उस तर्क का समर्थन करते हैं, जो उसने युद्ध के अनिष्टों के विरुद्ध श्रीकृष्ण के सामने प्रस्तुत किया था। अर्जुन धरती पर जन्मा पहला महामानव था, जिसके मन में युद्ध-विरोधी चेतना जाग्रत हुई थी। वह महान इसलिए था कि उसने सवाल उठाए। उधर कृष्ण ही थे, जिन्होंने उसे संकट से उबारा और उसे ‘स्वधर्म’ का संदेश दिया। गीता को समझना हो, तो पहले अर्जुन को समझना जरूरी है।
युद्ध मानव को रुलाता है। आंसू बहाना केवल दुख व्यक्त करना नहीं है, बल्कि मन और हृदय का बोझ हल्का करना है। यही रोना तन-मन के तनाव को धोकर शांति और स्थिरता लाता है। जब कोई पति अपने जीवन की परेशानियों और दुखों में चुपचाप रोता है, तो वह अपने भीतर के बोझ को कम करता है। इसी प्रकार पत्नी भी अपने ढंग से आंसू बहाती है, कभी-कभी अधिक मुखरता से, पर उद्देश्य समान होता है- मन की पीड़ा से मुक्ति। स्वामी कृपालु ने रोने वाले सभी के प्रति गहरी करुणा व्यक्त की है। वे कहते हैं कि रोना उच्च स्तर का भक्ति-संगीत है। जो लोग रोना जानते हैं, वही सच्चाई से अध्यात्म की गहराई को समझ पाते हैं। यदि कोई शुद्ध हृदय से रोता है तो उसका यह आंसू किसी प्रार्थना से कम नहीं है। आंसू में योग के सभी लक्षण छिपे हैं- धैर्य, सहनशीलता, आत्म-निरीक्षण और मानसिक शुद्धता। सीता, द्रोपदी और दमयंती जैसी पात्रों की करुणा हमें इस सच्चाई की वास्तविक परिभाषा दिखा सकती है।
मानवता का महाकाव्य है रामायण
सितम्बर 2003 में न्यूयॉर्क के मैनहटन सेंटर में मुझे असम की प्रतिष्ठित लेखिका इंदिरा गोस्वामी से मिलने का अवसर मिला। मैंने उनसे पूछा कि आपको रामायण पर शोध करने की प्रेरणा कहां से मिली। उन्होंने प्यारे अंदाज में उत्तर दिया कि यह प्रेरणा उन्हें जहांगीर काल के एक व्यक्ति, मुल्ला मसीही से मिली। मुल्ला मसीही फारसी में कविताएं रचते थे और सीता के प्रति उनका गहरा सम्मान था। सीता के दुखों से वे इतने व्यथित हुए कि उन्होंने अपनी कविताओं में उनकी करुणा को मुख्य विषय बनाया। इस प्रेरणा ने इंदिरा गोस्वामी को रामायण पर विस्तृत शोध करने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे उनका ग्रंथ तैयार हुआ और जिसे ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला।
सच तो यह है कि रामायण किसी एक जाति, धर्म या राष्ट्र का महाकाव्य नहीं है। यह मानवता का महाकाव्य है, जिसमें करुणा, न्याय, भक्ति और सच्चाई का सार्वभौमिक संदेश समाया है। यही कारण है कि आज भी यह ग्रंथ सभी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।








