रसरंग में चिंतन:  भीगी धरती और भीगा दिल, यही जीवन के मुक्तिधाम!
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रसरंग में चिंतन: भीगी धरती और भीगा दिल, यही जीवन के मुक्तिधाम!

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गुणवंत शाह11 घंटे पहले

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इन दिनों मेरे चेतना-आकाश में मेघदूत महोत्सव चल रहा है। झमाझम बारिश के साथ विस्मय की भी वर्षा हो रही है। मेरे घर की बगिया हर पल नई-सी लगती है। मेरा बाग हर क्षण रंग बदलता रहता है। इस बात का आभास केवल तितलियों को होता है। जो पौधा कई दिनों तक दिखाई भी न दे, वह अचानक फूलों से भर जाता है। रातों-रात उसमें रंग-बिरंगी छटा बिखर जाती है। मेरे बहुत करीब मोगरे का एक फूल खिला हुआ है। उसकी खुशबू की पात्रता केवल कुछ संवेदनशील नाकों को ही होती है। असल में, मोगरे का खिलना ही उसका मोक्ष है। कविवर रवींद्रनाथ टैगोर कहते हैं- फूल जब खिलता है और खुलता है, तब वह अपनी महक बिखरेता है। यही उसका मोक्ष है। ऋतुएं बहती रहती हैं और महीने मानो उड़ते चले जाते हैं। हर पल समय इधर से उधर भागता दिखाई देता है। कालचक्र एक क्षण के लिए भी नहीं रुकता। हम जिस कन्वेयर बेल्ट पर आगे बढ़ते हैं, वह दरअसल समय का ही रूप है।

रामायण में बारिश का वर्णन: वाल्मीकि रामायण के किष्किंधाकांड का 28 वां सर्ग पूरी तरह से वर्षा ऋतु के वर्णन से भीगा हुआ है। इसका वर्णन सीता वियोग में डूबे राम स्वयं कर रहे हैं। बालि का वध और सुग्रीव का राज्याभिषेक हो चुका है। राम-लक्ष्मण माल्यवंत पर्वत पर निवास कर रहे हैं। कुल 66 श्लोकों में राम, लक्ष्मण से केवल वर्षा ऋतु के बारे में ही बात करते हैं। सुनो, वे क्या कहते हैं:

हे, सुमित्रानंदन! नीले रंग के सहारे चमकने वाली यह बिजली मुझे तड़पती सीता जैसी लगती है। मंद-मंद हवा ऐसी लगती है, मानो किसी के आंसुओं से भीगी सांस हो। बादलों की गड़गड़ाहट से मृदंग की ध्वनि सुनाई देती है। वर्षा की धारा मानो स्वर्ग की अप्सराओं की मणियों के टूटने जैसी लगती है। हे! लक्ष्मण… मेरा दुख अब तो और बढ़ गया है। दिन बिताना कठिन हो गया है। इधर वर्षा है कि रुकने का नाम ही नहीं लेती। वर्षा से राम भी व्यथित हो गए, वहीं दूसरी ओर हम हैं कि सूखे के सूखे। यदि उस समय सीता राम के साथ होतीं, तो भी श्रीराम पीड़ित ही होते। पर वह पीड़ा वियोग की नहीं, प्रेम की होती।

वर्षा में धर्म का सार: झमाझम बारिश हो रही हो, तब मन में एक विचित्र प्रार्थना का भाव पैदा हो रहा है। हे! ईश्वर मुझमें यह भाव आ रहा है कि मैं उससे सुंदर दिखाई दूं, मुझे इस गंदे विचार से मुक्त करो। अगर मेरा पतन हो जाता है, तो इसका दोष मैं किसी और पर न डालूं। पतन के पलों में यदि मैं आत्मनिर्भर रहूं, तो यह किसी चमत्कार से कम न होगा। अगर मैं सुधर जाता हूं, तब भी मैं स्वावलंबी बना रहूं, यही प्रार्थना है। इन सारी बातों को छोड़ो, अपनी उम्र को भूल जाओ, फिर भीगो। बारिश में तो धर्म का सार समझ में आ जाएगा।

सावन में विचलित मन: बारिश हो रही हो और मन विचलित न हो, ऐसे इंसान से सावधान रहने की आवश्यकता है। हमारे समाज में न जाने कितनी ही बेमानी परेशानियां हैं, जिनसे हम सभी घिरे रहते हैं। जो व्यक्ति बारिश के दौरान भीतरी झंझावातों से गुजरे, वास्तव में वही साधु है। जो बारिश में प्रेम की टीस को महसूस करे, वह शायर है। जो बारिश में अकेले ही यादों की बूंदों से भीगे, वो ही सच्चा प्रेमी है। और जो बारिश उसे एक क्षण के लिए भी विचलित न करे, ऐसे निर्मोही को तो देशनिकाला दे देना चाहिए। इससे एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकता है। निजी अवरोध क्या है? आपने जिसे पाने की चाहत की, लेकिन उसे पा न सके और जीवन की धारा में बस बहते ही चले गए, ऐसे किसी व्यक्ति के स्मरण से भीगी आंखें सभी के भाग्य में नहीं होतीं। भीगी धरती, भीगा हृदय और भीगी आंखें, यही जीवन के मुक्तिधाम हैं। शहीद होने के लिए मरना जरूरी है, ऐसा किसने कहा? जीते जी भी भीनी-भीनी शहादत का स्वाद चखा जा सकता है।

बात पते की दुनिया में सबसे दुखी इंसान कौन है? जिसे वर्षा ऋतु के आगमन की प्रतीक्षा न हो, ऐसा आदमी जीवनभर सूखा ही रहेगा। इससे अधिक दुख उसके लिए और क्या होगा?



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