रसरंग में मायथोलॉजी:  शंकराचार्य, दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद के अलग-अलग वेदांत
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देवदत्त पट्टनायक12 घंटे पहले

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स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन का बेलूर स्थित मठ और मुख्यालय। - Dainik Bhaskar

स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन का बेलूर स्थित मठ और मुख्यालय।

लगभग 1200 वर्ष पहले आदि शंकराचार्य ने जिस प्रकार हिंदू धर्म को अभिव्यक्त किया, वह लगभग 150 वर्ष पूर्व स्वामी विवेकानंद और दयानंद सरस्वती द्वारा की गई व्याख्याओं से काफी भिन्न था। इसका कारण यह था कि इन तीनों को अपने-अपने समय में अलग-अलग प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालांकि, उनके विचारों में कई समानताएं भी देखने को मिलती हैं।

तीनों महापुरुष जीवनभर ब्रह्मचारी रहे। उन्होंने जीवन के उद्देश्य और स्वरूप पर गहन चिंतन किया और अपने अनुभवों तथा ज्ञान को अपने अनुयायियों तक पहुंचाया। शंकराचार्य ने अपनी मां को तपस्वी बनने की अनुमति देने के लिए राजी कर लिया था। स्वामी विवेकानंद, जिनका जन्म एक संभ्रांत परिवार में नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में हुआ था, ने भी संन्यास का मार्ग चुना। वहीं, दयानंद सरस्वती की सगाई हो चुकी थी, लेकिन उन्होंने उसे तोड़कर संन्यासी जीवन अपना लिया।

तीनों के गुरुओं की पृष्ठभूमि भी भिन्न थी। शंकराचार्य के गुरु गौड़पाद एक साधु थे, जिन पर महायान बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था। विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस काली मंदिर के पुजारी थे। वे तंत्र के जानकार थे और अन्य धर्मों की शिक्षाओं से भी परिचित थे। दयानंद सरस्वती के गुरु विरजानंद दंडी संस्कृत व्याकरण और वेदों के प्रकांड विद्वान थे। शंकराचार्य के समय बौद्ध धर्म भारत में अत्यंत लोकप्रिय था, लेकिन वह श्रीलंका का थेरवाद संप्रदाय नहीं था, जो आज विपश्यना के लिए जाना जाता है। भारत में तब महायान, वज्रयान और तांत्रिक बौद्ध परंपराएं प्रचलित थीं, जिनमें स्त्री रूप को योगिनियों और तारा देवी के माध्यम से प्रमुखता दी जाती थी। इन संप्रदायों में बुद्ध को हेरुक जैसे उग्र रूपों में दर्शाया गया। वहीं, विवेकानंद और दयानंद को अंग्रेजों और ईसाई मिशनरियों के विरोध का सामना करना पड़ा, जो हिंदू धर्म को पिछड़ा और मूर्तिपूजक मानते थे।

यद्यपि शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म को चुनौती दी, लेकिन उनके लेखनों में बौद्ध ‘शून्यवाद’ और वैदिक ‘निर्गुण ब्रह्म’ की अवधारणाओं के बीच स्पष्ट समानताएं थीं। इसी कारण उन पर यह आरोप भी लगे कि उन्होंने बौद्ध विचारों को हिंदू धर्म में मिला दिया। इसी तरह, विवेकानंद और दयानंद पर यह आरोप लगे कि उन्होंने ईसाई प्रथाओं को अपनाकर उन्हें हिंदू स्वरूप देने का प्रयास किया। शंकराचार्य के समय न तो भारतवासी विदेशों में बसने जाते थे और न ही विदेशी भारत में आकर बसते थे। जाति व्यवस्था उस समय प्रचलित थी, लेकिन कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से अपनी जाति नहीं बदल सकता था। जाति जन्म पर आधारित थी। शंकराचार्य के लिए धर्म-परिवर्तन की अवधारणा भी अज्ञात रही होगी, जो 19वीं सदी में आम हो गई थी। उस समय हिंदू लोग ईसाई धर्म अपनाने लगे, यूरोपीय लोग हिंदू धर्म में रुचि लेने लगे और विदेशों में रहने वाले हिंदुओं को बार-बार अपने धर्म की व्याख्या करनी पड़ी।

इसलिए, शंकराचार्य के लेखनों में शुद्धिकरण (पुनः हिंदू बनाए जाने) के किसी अनुष्ठान का उल्लेख नहीं मिलता है। वास्तव में, इस प्रकार का अनुष्ठान सबसे पहले दयानंद सरस्वती ने स्थापित किया, ताकि धर्मांतरण कर चुके लोग फिर से हिंदू बन सकें। वहीं, विवेकानंद ने एक अभूतपूर्व कदम उठाया। वे उस समय विदेश गए, जब ऐसा करना अधिकांश लोगों की कल्पना से परे था। उन्होंने पश्चिमी समाज को वेदांत से परिचित कराया। शंकराचार्य का योगदान वेद और पुराणों को जोड़ने में भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उस समय ब्राह्मण समाज दो धाराओं में विभाजित था। एक ओर वे थे जो पुराने वैदिक यज्ञों के अनुष्ठान में विश्वास रखते थे और दूसरी ओर वे जो नए मंदिर-आधारित अनुष्ठानों का पालन करते थे। शंकराचार्य ने इन दोनों धाराओं को जोड़ने की नींव रखी। उन्होंने निर्गुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म की अवधारणाओं को जोड़ा। वे शैव, वैष्णव, स्मार्त और सिद्ध परंपराओं से भी भली-भांति परिचित थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे सभी धाराओं को एकीकृत करने का प्रयास कर रहे थे। यही कारण है कि भारत के अधिकांश प्रमुख तीर्थस्थल शंकराचार्य से जुड़े हुए हैं।

19वीं सदी में भी कई प्रकार के वैचारिक तनाव देखे गए। दयानंद सरस्वती वेद संहिताओं में हिंदू धर्म का मूल सार खोजने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने पुराणों और मंदिर-आधारित परंपराओं को नकार दिया था। इसके विपरीत, विवेकानंद ने मंदिर पर आधारित परंपराओं का सम्मान किया और रामकृष्ण मिशन के अंतर्गत काली पूजा को संस्थागत रूप दिया। शंकराचार्य ने उपनिषदों पर आधारित वेदांत दर्शन अर्थात उत्तर मीमांसा को स्वीकार किया और यज्ञ-कर्म पर आधारित पूर्व मीमांसा को अस्वीकार कर दिया। विवेकानंद भी इसी वैचारिक परंपरा के समर्थक थे। इसके विपरीत, दयानंद ने वैदिक स्तोत्रों के जप और यज्ञ अनुष्ठानों को उपनिषदों की अपेक्षा अधिक महत्व दिया।

शंकराचार्य, शारदा देवी के भक्त थे और उन्होंने उभय भारती नामक एक विदुषी स्त्री से ज्ञान प्राप्त किया था। विवेकानंद मां काली के भक्त थे। शंकराचार्य के समय से समाज में महिलाओं की शिक्षा को मिलने वाला महत्व धीरे-धीरे कम होने लगा था। इस शिक्षण परंपरा का पुनरुत्थान लगभग एक सहस्राब्दी बाद तब हुआ, जब विवेकानंद और दयानंद के अनुयायियों ने महिलाओं के लिए पाठशालाएं स्थापित कीं।



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