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एआई के इस दौर में मशीनें तेजी से सोचने लगी हैं। वे इंसानों की तरह लेखन, कोडिंग और डेटा विश्लेषण करने लगी हैं। ऐसे में कठिन सवाल यह है कि भविष्य में इंसान खुद को कैसे प्रासंगिक और दिमागी रूप से चुस्त रखेगा? इसका जवाब कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. हन्ना क्रिचलो देती हैं। डॉ. हन्ना के मुताबिक, आने वाले कल में वही आगे बढ़ेगा, जो अनिश्चितता और बदलाव से डरेगा नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करेगा। हन्ना अपनी नई किताब ‘द 21st सेंचुरी ब्रेन’ में बताती हैं कि तकनीक से लैस 21वीं सदी में इंसान की असली ताकत उसका आईक्यू नहीं, बल्कि उसकी कल्पनाशक्ति, सहानुभूति, भावनात्मक समझ होगी। यानी, वही आगे बढ़ेगा, जो भावनाओं को समझे, अनिश्चितता से न डरे और कल्पनाशक्ति को जिंदा रखे। भावनात्मक समझ से ही रिश्तों, टीमवर्क, आत्म-नियंत्रण और जीवन संतुष्टि की नींव बनती है। हैरानी की बात यह है कि पिछले 10,000 सालों में इंसानी दिमाग का आकार थोड़ा छोटा हुआ है, लेकिन इसके बावजूद हमारी सोचने और नए हालात में ढलने की क्षमता बेमिसाल है। डॉ. हन्ना कहती हैं कि एआई का विकास भी न्यूरोसाइंस के सिद्धांतों पर ही हुआ है, इसलिए अब वक्त आ गया है कि हम अपने दिमाग की उन खूबियों को जगाएं, जिन्हें विज्ञान अक्सर ‘सॉफ्ट स्किल्स’ मानकर नजरअंदाज कर देता रहा है। डॉ. हन्ना कहती है कि महान वैज्ञानिक थॉमस एडिसन झपकी लेते वक्त हाथ में धातु की चीज रखते थे, ताकि झपकी आने पर उसके गिरने से नींद टूटे और अवचेतन के विचारों को लिख सकें। डॉ. हन्ना तीक्ष्ण दिमाग के लिए खान-पान से पेट सही रखना, अच्छी नींद, नियमित व्यायाम और प्रकृति में टहलने को जरूरी बताती हैं। इनके जरिए दिमाग अधिक लचीला बना रहता है और नई जानकारी को बेहतर तरीके से स्वीकार करता है। साथ ही मानसिक ऊर्जा बनी रहती है। वह स्टडी के हवाले से बताती हैं कि गट (आंत) बैक्टीरिया ऐसा रसायन बनाते हैं, जो दिमाग तक संदेश पहुंचाने में सहायक हैं। इससे सामाजिक रिश्तों समेत व्यक्ति के व्यवहार के तरीके पर असर पड़ता है। दिमाग तेज रखना है तो उसे इधर-उधर ‘भटकने’ भी दें रचनात्मकता बढ़ाने के लिए डॉ. हन्ना दिलचस्प सलाह देती हैं, ‘दिमाग को थोड़ा भटकने (डेड्रीमिंग या माइंड-वांडरिंग) दें।’ हमारा दिमाग दिन का करीब 20% वक्त बिना किसी तय लक्ष्य के इधर-उधर की बातें सोचने में बिताता है और यही वह समय होता है, जब नए और क्रांतिकारी विचार जन्म लेते हैं। प्रकृति के बीच टहलने से दिमाग में ‘अल्फा वेव्स’ (तरंगें) बढ़ती हैं, जो मन को शांत और रचनात्मक बनाती हैं।
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