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चीन के युवा आजकल गाड़ियां, मकान या महंगे गैजेट्स नहीं, बल्कि ‘भावनाएं’ और ‘सुकून’ खरीद रहे हैं। भविष्य की चिंता, सैलरी न बढ़ना और बेरोजगारी के तनाव से घिरे ये युवा अपना पैसा ऐसी चीजों और अनुभवों पर खर्च कर रहे हैं जो उन्हें पलभर की खुशी व ‘इमोशनल वैल्यू’ दे सकें। युवा अब पहाड़ चढ़ाने वाले गाइड से लेकर मनोरंजन पार्कों के कलाकारों तक को अपना मन बहलाने, भावनाएं साझा करने व सुकून पाने के लिए पैसे दे रहे हैं। कॉलेज छात्र लू झाओयू माउंट ताई पर पर्यटकों के साथ ट्रैकिंग कराते हैं। वे खुद को टूर गाइड नहीं, बल्कि लोगों को ‘भावनात्मक सुकून और खुशी’ देने वाले साथी के रूप में पेश करते हैं। लू छह घंटे की ट्रैकिंग के लिए करीब 10 हजार रुपए लेते हैं। वे पर्यटकों को ताजे फल खिलाते हैं, उनका उत्साह बढ़ाते हैं और चोटी पर पहुंचने पर जश्न मनाते हैं। थकान होने पर वे हौसला-अफजाई भी करते हैं, पीठ थपथपाते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें उठाकर जरूरी मदद भी पहुंचाते हैं। सर्विस लेने वालीं ज्यादातर 20 से 30 साल की युवतियां हैं, जो भौतिक वस्तुओं से ज्यादा खुशी, भावनाओं व मानसिक संतोष पर खर्च करना पसंद करती हैं। झाओयू कहते हैं कि कई बार वे थेरेपिस्ट जैसा महसूस करते हैं। 30 वर्षीय ए लांग कई नौकरियां बदलने के बाद एम्यूजमेंट पार्क में कॉसप्लेयर (बहुरूपिया) के रूप में काम कर रहे हैं। वे रोज घंटों लगाकर खुद को वीडियो गेम के योद्धा का रूप देते हैं। पार्क इस भावनात्मक अनुभव के लिए हर व्यक्ति से 1450 रुपए लेता है। लांग कहते हैं कि उनकी कोशिश हर उदास चेहरे पर मुस्कान लाना है। ये तरीके भी आजमा रहे युवा चीन में भावनात्मक जरूरतों का डिजिटल बाजार भी तेजी से बढ़ रहा है। अकेले रहने वाले युवा पेट्स नहीं रख पाते, इसलिए वे ‘वर्चुअल पेट्स ओनर’ बन रहे हैं। वे पैसे देकर लाइव-स्ट्रीमर्स से पसंद के कुत्ते या बिल्ली को कैमरे पर खिलवाते, सहलवाते या टहलवाते हैं। वहीं ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर ‘इमोशनल सप्लायर्स’ की मांग भी बढ़ रही है। महज ₹150-400 रु. खर्च कर युवा 15 मिनट के लिए अजनबी को बुक करते हैं, जो उन्हें तारीफ व सांत्वना देता है, तो कोई मोटिवेशन के लिए डांटता भी है। तेज जिंदगी और आर्थिक दबाव ने युवाओं को किया अकेला शंघाई यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर वांग फेंग कहते हैं,‘युवाओं द्वारा केयर और साथ जैसी मानवीय भावनाओं के लिए बाजार को भुगतान करना मजाक नहीं, बल्कि एक गंभीर संकट है। चीन की ‘फास्ट-लाइफ’ और आर्थिक दबाव ने युवाओं को बेहद अकेला कर दिया है। भविष्य की अनिश्चितता से घबराया समाज अब भौतिक सुखों से ऊपर मानसिक शांति को रख रहा है।’ फेंग के अनुसार,‘जब हकीकत में वास्तविक खुशियां व पारिवारिक जुड़ाव कम होने लगे, तो उन्हें पैसों से खरीदना ही इस पीढ़ी के लिए ‘सर्वाइवल मंत्र’ बन गया है।
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