गौरव पाठक37 मिनट पहले
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डेवलपर्स और प्राधिकरणों द्वारा दुकानों के आवंटन की प्रक्रिया कई बार उपभोक्ता संरक्षण कानून के अंतर्गत मुकदमों का कारण बन जाती है। दुकानों के आवंटी अक्सर कब्जे मिलने में देरी और अप्रत्याशित शुल्क जैसी समस्याओं का सामना करते हैं। आज हम उपभोक्ता अदालतों द्वारा समय-समय पर दिए गए फैसलों के आधार पर दुकान आवंटियों को प्राप्त अधिकारों और डेवलपर्स की जिम्मेदारियों का विश्लेषण करेंगे।
स्वरोजगार को साबित करना जरूरी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(7) के अनुसार “व्यावसायिक प्रयोजनों’ से की गई खरीद उपभोक्ता संरक्षण के दायरे से बाहर मानी जाती है। हालांकि इसमें एक महत्वपूर्ण अपवाद यह है कि यदि कोई खरीद “स्व-रोजगार हेतु आजीविका कमाने के लिए’ की गई हो, तो वह उपभोक्ता की श्रेणी में आती है। प्रदीप सिंह पहल बनाम टीडीआई इंफ्रास्ट्रक्चर (2016) मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने यह निर्णय दिया कि यदि कोई व्यक्ति वाणिज्यिक परिसर इस उद्देश्य को साबित किए बिना कि वह इसे स्व-रोजगार के माध्यम से अपनी आजीविका कमाने के लिए इस्तेमाल करेगा, खरीदता है तो उसे उपभोक्ता नहीं माना जा सकता। आयोग ने टिप्पणी की- “शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत में यह नहीं कहा है कि उसने यह वाणिज्यिक इकाई विशेष रूप से स्व-रोजगार के माध्यम से अपनी आजीविका कमाने के लिए ही आवंटित कराई थी।’ यानी ऐसे खरीददार को यह ध्यान रखना होगा कि उपभोक्ता अदालत में कोई वाद दायर करने से पहले वह यह सुनिश्चित करें कि खरीदी गई दुकान का इस्तेमाल “स्व-रोजगार’ हेतु किया जा रहा है, न कि उसे निवेश के उद्देश्य से खरीदा गया है।
आवंटन मामले में सेवा में कमी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(11) में परिभाषित ‘कमी’ (डिफिशन्सी) मुख्यतः सेवा में कमी को दर्शाती है। यह समस्या मुख्य रूप से तब उत्पन्न होती है, जब आवंटी को वादा की गई समय-सीमा के बाद भी पजेशन (कब्जा) नहीं दिया जाता या जब अप्रत्याशित शुल्क लगाए जाते हैं। कुबेर बिल्डर्स बनाम ऋषभ तिलक केमिकल्स (2021) मामले में शिकायतकर्ता ने लगभग छह लाख रुपए का भुगतान किया था, लेकिन वर्षों तक प्रतीक्षा के बावजूद कब्जा नहीं मिला। इस पर राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने स्पष्ट रूप से इसे सेवा में कमी माना और कहा कि शिकायतकर्ता को बकाया भुगतान के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि निर्माण स्थल पर कोई कार्य ही शुरू ही नहीं हुआ था और परियोजना को पूरा करने के लिए बिल्डर ने कोई कदम नहीं उठाया।
दुकान आवंटियों के लिए उपलब्ध उपाय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 34 उपभोक्ता फोरमों को उचित राहत प्रदान करने का अधिकार देती है। ऐसे मामलों में जहां पजेशन नहीं दिया गया हो, दो मुख्य उपाय उपलब्ध होते हैं – स्पेसिफिक परफॉर्मेंस यानी जो वादा किया गया, उसे मुआवजे के साथ-साथ पूरा करने का आदेश देना या ब्याज सहित रिफंड। कुसुम बंसल बनाम हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड (2019) मामले में, जहां आठ वर्षों बाद भी कब्जा नहीं दिया गया था, हरियाणा राज्य आयोग ने 12 फीसदी ब्याज सहित धनवापसी का आदेश दिया। आयोग ने कहा कि कब्जा देने की शर्तों और नियमों का पूर्णत: पालन नहीं किया गया।
अनधिकृत शुल्क वसूली का मामला अनधिकृत शुल्क वसूले जाने के मामले में भी उपभोक्ता अदालतों ने अनेक फैसले सुनाए हैं। रामगोविंद त्रिपाठी बनाम कार्यपालन अधिकारी, ग्वालियर विकास प्राधिकरण (2023) के मामले में उपभोक्ता फोरम ने यह निर्णय दिया कि यदि ऐसे शुल्कों का मूल समझौते में स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है, तो उन्हें वैध नहीं माना जा सकता।
अदालत के बाहर समझौता मुकदमेबाजी का रास्ता अपनाने से पहले उपभोक्ताओं को हमेशा यह प्रयास करना चाहिए कि मामला अदालत के बाहर सुलझाया जा सके। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 37 के तहत मध्यस्थता की प्रक्रिया भी शामिल है। दोनों पक्ष इस प्रक्रिया का इस्तेमाल कर सकते हैं।
(लेखक सीएएससी के सचिव भी हैं।)








