रसरंग में आपके अधिकार:  AC: बार-बार डिफेक्ट आए तो करें मुआवजे का दावा
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रसरंग में आपके अधिकार: AC: बार-बार डिफेक्ट आए तो करें मुआवजे का दावा

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गौरव पाठक3 घंटे पहले

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जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, एयर कंडीशनरों (AC) से जुड़ी उपभोक्ता शिकायतें भी बढ़ने लगती हैं। उत्पाद में दोष, सेवा में देरी, भ्रामक प्रचार और यहां तक कि दुर्घटनाएं भी निर्माताओं और विक्रेताओं को कठघरे में खड़ा कर देती हैं। ऐसे में जब एयर कंडीशनर ठीक से काम न करे तो उपभोक्ता के कानूनी अधिकार क्या होते हैं और विक्रेता तथा सेवा प्रदाता की जिम्मेदारियां क्या हैं?, आइए उपभोक्ता कानूनों की रोशनी मंे इन्हें समझते हैं।

भ्रामक प्रस्तुति और अनुचित व्यापार व्यवहार जब कोई उपभोक्ता किसी ब्रांडेड उत्पाद के लिए भुगतान करता है तो विक्रेता की यह जिम्मेदारी होती है कि वह वही ब्रांड और उत्पाद उपलब्ध कराएं। सी.एस. रहालकर बनाम एस. खंखोजे (2005) के मामले में शिकायतकर्ता ने एडवांस में एक एयर कंडीशनर के लिए भुगतान किया था, लेकिन उसे घटिया कल-पुर्जों से बनी एक असेंबल्ड यूनिट दे दी गई। छत्तीसगढ़ राज्य आयोग ने इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 2(1)(r) के तहत अनुचित व्यापार व्यवहार माना और मुआवजा प्रदान किया। इस मामले से स्पष्ट होता है कि अगर लिखित रूप में भ्रामक प्रस्तुति का प्रमाण है तो विक्रेता किसी मौखिक समझौते या डिस्क्लेमर का सहारा नहीं ले सकते।

डिफेक्ट्स ठीक नहीं होना

पैनासोनिक इंडिया प्रा. लि. बनाम एम.एम. शर्मा (2006) के मामले में एक नया एसी कई बार की मरम्मत, यहां तक कि कंप्रेसर बदलने के बावजूद ठीक से काम नहीं कर रहा था। दिल्ली राज्य आयोग ने माना कि यह उत्पाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 2(1)(g) के तहत दोषपूर्ण था। लिहाजा, आयोग ने पूरी खरीद राशि वापस करने और मुआवजा देने का आदेश दिया। इस फैसले से यह सिद्ध होता है कि यदि बार-बार की मरम्मत के बावजूद समस्या बनी रहती है तो उपभोक्ता मंच आंशिक राहत के बजाय पूरी धनवापसी का आदेश देने से पीछे नहीं रहते हैं।

वारंटी के दायित्वों को लागू कराना राकेश पाठक बनाम हिंदुस्तान एयरकॉन प्रा. लि. (2014) के मामले में शिकायतकर्ता ने वारंटी अवधि के भीतर खराब कंप्रेसर को बदलने की मांग की। जब कंपनी ने कोई कार्रवाई नहीं की, तो उपभोक्ता ने जिला उपभोक्ता मंच में शिकायत दर्ज कराई। मंच ने कंप्रेसर बदलने और मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसे राष्ट्रीय आयोग ने भी सही ठहराया। इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि कंपनियां अपने वारंटी दायित्वों से बच नहीं सकतीं।

इंस्टालेशन डिफेक्ट्स निर्माता की जिम्मेदारी इंस्टालेशन में हुई गलतियों या लापरवाहीपूर्ण सेवा को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। गोदरेज एंड बॉयस मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लि. बनाम राजकुमार मैनी (2016) के मामले में सेवाकर्मियों ने मरम्मत के दौरान एसी की गैस पाइप को नुकसान पहुंचा दिया। इससे उपभोक्ता को लगातार परेशानी झेलनी पड़ी और विशेषज्ञों की जांच में दोष (डिफेक्ट) की पुष्टि हुई। राष्ट्रीय आयोग ने धनवापसी के साथ मुआवजा देने का आदेश दिया। इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि जिम्मेदारी केवल निर्माण में मूल दोष के लिए नहीं, बल्कि बिक्री के बाद की सेवा में लापरवाही के दौरान भी बनती है।

सेवा में लापरवाही पर ‘विकरायस दायित्व’ सबसे दुखद मामला लक्ष्मैया बनाम मन सिंह एवं अन्य (2024) है, जिसमें मरम्मत के दौरान एक एसी फट गया और शिकायतकर्ता के बेटे की मौत हो गई। राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने इस मामले में सेवा प्रदाता को ‘विकरायस दायित्व’ (कर्मचारी की गलती के लिए मालिक की जिम्मेदारी) के तहत दोषी ठहराया। आयोग ने ‘रेस इप्सा लोक्वीटर’ (घटना अपने आप बताती है कि लापरवाही हुई है) के सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि कंपनी केवल इस आधार पर जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कि मैकेनिक के निगरानी की सीधी जिम्मेदारी उसकी नहीं थी। आयोग ने 10 लाख रुपए के मुआवजे का आदेश देते हुए कहा कि मरम्मत सेवाएं सहायक सेवा नहीं हैं, बल्कि एसी कंपनियों के व्यापार का अभिन्न हिस्सा हैं।



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