रसरंग में ट्रेवल:  आलो: जनजातीय संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत संगम
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रसरंग में ट्रेवल: आलो: जनजातीय संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत संगम

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पर्णश्री देवी51 मिनट पहले

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गालो जनजाति लोगों की सादगी मन मोह लेती है। - Dainik Bhaskar

गालो जनजाति लोगों की सादगी मन मोह लेती है।

आलो, जिसे पहले अलोंग कहा जाता था, अरुणाचल प्रदेश की प्रसिद्ध मेचुका घाटी में स्थित एक कस्बा है। पश्चिम सियांग जिले में बसा यह अनछुआ स्थल एक स्वप्निल पनाहगाह की तरह है, जहां निर्मल नदियां, हैंगिंग पुल, मनोहारी पहाड़ियां और जीवंत गालो जनजातीय संस्कृति मिलकर एक अनूठा अनुभव रचती है। सिपु और योंगो नदियों के संगम पर बसा आलो अपनी हरी-भरी घाटियों और शांत वातावरण के साथ आगंतुकों का स्वागत करता है। यहां आपको एक ऐसा वातावरण मिलेगा, जो आधुनिक शहरों के कोलाहल से कोसों दूर है। चारों ओर फैली पहाड़ियां, संतरे के बागानों और पारंपरिक गालो गांवों से घिरा यह इलाका ऐसा देहाती आकर्षण लिए हुए है जो प्राचीन भी लगता है और जीवंत भी। आइए जानते हैं इस जगह पर आप क्या चीजें देख सकते हैं।

पाया गांव: पारंपरिक गालो बस्ती शहर से कुछ ही किलोमीटर दूर पाया गांव में गालो जीवनशैली की असली झलक देखी जा सकती है। पहाड़ी की चोटी पर स्थित इस गांव तक पहुंचने की राह मंे कई सुंदर लैंडस्केप मिलते हैं। इसमें एक हैंडिंग पुल भी शामिल है। यहां पारंपरिक लकड़ी के घर, पारंपरिक परिधानों में स्थानीय लोगों की दिनचर्या और प्रदूषण से मुक्त प्राकृतिक वातावरण, यह सब मिलकर ऐसा एहसास कराते हैं, मानो आप किसी और दुनिया मंे पहुंच गए हो।

झूलते पुलों पर चलना आलो के हैंगिंग पुल (झूलते पुल) केवल आवागमन के साधन नहीं हैं, बल्कि वे आपको एक अनूठा अनुभव करवाते हैं। सियोम और योंगो जैसी साफ-सुथरी नदियों पर लटके ये पुल गांवों और खेतों को जोड़ते हैं और रोमांच के साथ-साथ शानदार प्राकृतिक दृश्यों से रूबरू भी करवाते हैं। पुलों के नीचे से बहती शांत नदियां और चारों ओर फैली हरियाली सुकून और रोमांच का अनूठा संगम बन जाती है।

सियोम नदी में रिवर राफ्टिंग साहसिक गतिविधियों के शौकीनों के लिए सियोम नदी में व्हाइट वॉटर राफ्टिंग एक अविस्मरणीय अनुभव बन जाता है। घने जंगलों और ऊंची चट्टानों के बीच बहती इस नदी की धाराएं रोमांचक होने के साथ-साथ सुरक्षित भी हैं, चाहे आप इस विधा में नए हों या अनुभवी राफ्टर। सिपु और योंगो नदियों का संगम इस गतिविधि को एक अलग ही आयाम देता है।

हाइकिंग और प्रकृति भ्रमण आलो ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए भी जन्नत की तरह है। यह क्षेत्र अछूते जंगलों, बांस के झुरमुटों और शांत पहाड़ी रास्तों से भरा हुआ है। सुबह-सुबह उठकर पहाड़ों के पीछे से उगते सूरज को देखना, चिड़ियों की चहचहाहट और बहती धाराओं की आवाज सुनना, इससे बेहतर अनुभव कहीं और मिलना मुश्किल है।

स्थानीय बाजार की सैर स्थानीय जीवन का असली अनुभव लेना हो तो आलो के चहल-पहल वाले बाजार में कुछ वक्त बिताएं। यहां ताजी सब्जियां, पारंपरिक अचार, बेंत से बनी चीजें और रंग-बिरंगे गालो हथकरघा उत्पाद मिलते हैं। यहां के ताजे संतरे और पारंपरिक आभूषण स्मृति-चिह्न के रूप में लेने के लिए सबसे अच्छे विकल्प हैं। बाजार की हर गली समुदाय की जीवनशैली, उनकी आस्था और प्रकृति से जुड़ाव की कहानी कहती है।

डोनी-पोलो मंदिर यहां के स्थानीय लोग डोनी-पोलो पंथ के अनुयायी हैं। यह भारत के सबसे पुराने प्रकृति-पूजक पंथों में से एक है। इनका डोनी-पोलो मंदिर एक आध्यात्मिक केंद्र है। इस धर्म में सूर्य (डोनी) और चंद्रमा (पोलो) को देवतुल्य माना जाता है। यह मंदिर पारंपरिक मोपिन त्योहार का मुख्य स्थल भी है, जहां पूजा, संगीत, नृत्य और भोजन मिलकर जनजातीय विरासत का भव्य उत्सव बनाते हैं।

कैसे पहुंचें आलो? सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन मुरकोंगसेलेक है, जो लगभग 131 किलोमीटर दूर है। वहां से टैक्सी या बस ली जा सकती है। हालांकि, अधिक प्रचलित मार्ग सड़क मार्ग है। सड़क मार्ग से आने पर आप रास्ते में भी शानदार प्राकृतिक नजारों से रूबरू हो सकेंगे। पासीघाट से यह 95 किलोमीटर और राज्य की राजधानी ईटानगर से 303 किलोमीटर की दूरी पर है। अरुणाचल प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की नियमित बस सेवाएं चलती हैं। वैसे अगर आप अपनी यात्रा को आसान बनाना चाहते हैं तो स्थानीय स्तर पर कई ट्रैवल एजेंसियां हैं। उनकी भी सेवाएं ले सकते हैं।



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