गुणवंत शाह5 घंटे पहले
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डूबा हुआ सूरज कल फिर उगेगा, इसमें हम कभी संदेह नहीं करते। शायद यही वजह है कि हम अपने हाथ में आए बेशकीमती ‘आज’ की कीमत नहीं समझ पाते। न जाने कितनी सदियां बीत गईं, लेकिन कभी यह सुनने में नहीं आया कि सूरज ने अवकाश लिया हो। हमें इस बात की चिंता भी नहीं रहती कि कहीं सूरज देर से उगेगा या उगेगा ही नहीं। आखिर ऐसा क्यों होता है? क्योंकि सूरज चरित्रवान है और साथ ही तेजस्वी भी। कुछ लोग तेजस्वी तो होते हैं, मगर चरित्रवान नहीं हो पाते। इसी तेज और चरित्र का संगम ही ‘सूरज’ कहलाता है।
वेदों और उपनिषदों में सूर्य की स्तुति करते हुए हमारे ऋषि-मुनियों को कभी थकान नहीं हुई। उन्होंने सूर्य को ‘सवित’ यानी पोषण करने वाला कहा है। वैदिक काल से लेकर आज तक सूरज पर जितनी कविताएं लिखी गईं, उतनी शायद ही किसी और विषय पर लिखी गई होंगी। सूरज हमारे जीवन का आधार है, यह कहने से बेहतर यह कहना होगा कि ‘सूरज ही स्वयं जीवन’ है। नास्तिक ईश्वर में विश्वास नहीं करते। सच तो यह है कि इस संसार में ईश्वर से अधिक विवादास्पद और शंकास्पद कोई विषय भी नहीं है। जो स्वयं को आस्तिक कहते हैं, उनके जीवन में भी कभी-कभी ऐसे पल आते हैं, जब उन्हें भीतर से ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह होता है। आस्तिकों, नास्तिकों और अज्ञेयवादियों के बीच लाख मतभेद हो सकते हैं, लेकिन सूर्य के अस्तित्व को लेकर सभी सहमत हैं। नास्तिक भले ही सूर्य की उपासना न करें, परंतु हर दिन सुबह-शाम उसे निहारते हैं और उसमें भी उनकी श्रद्धा झलकती है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘प्रभास्मि शशि-सूर्ययोः’, अर्थात ‘चंद्रमा और सूर्य में जो प्रकाश है, वह मैं ही हूं।’ आज का मानव सूर्य को केवल ऊर्जा के स्रोत के रूप में पहचानता है। यही उसकी सीमा भी है। वास्तव में सूर्य साक्षात शक्ति का विराट केंद्र है। ऊर्जा का ऐसा केंद्रीकरण अन्यत्र दुर्लभ है। परंतु यह केवल केंद्रीकरण नहीं करता, यह विकेंद्रीकरण में भी विश्वास रखता है। जब उसकी किरणें दूर-दूर तक फैलती हैं तो वह इसी विकेंद्रीकरण का प्रमाण है। अंधेरे कमरे की एक छोटी-सी दरार से जब सूरज की किरण प्रवेश करती है तो वह पूरे कमरे को चमक से भर देती है।
ईशोपनिषद के एक मंत्र में सूर्य-शक्ति के केंद्रीकरण को ‘समूह’ और विकेंद्रीकरण को ‘व्यूह’ कहा गया है। समूह का अर्थ है एकत्र करना और व्यूह का अर्थ है विभाजन करना। इस तरह सूर्य एक साथ संग्रह और वितरण, दोनों का संचालन करता है। वह वास्तव में इस जगत का विराट पावर हाउस है। भूत और भविष्य के बीच सैंडविच-सा जो वर्तमान है, वही हमारे हाथ में है। जिस तरह लड्डू पर चिपकी खसखस लगातार झरती रहती है, उसी तरह वर्तमान की घड़ियां भी निरंतर फिसलती रहती हैं। कालदेवता हर क्षण स्वयं को विसर्जित करते रहते हैं। इस अनोखे विसर्जन में ही सृजन की गर्भस्थ प्रक्रिया चलती रहती है। बादल का विसर्जन ही धरती पर वर्षा और सृजन की पूर्वशर्त है। पतझड़ की पीठ पर वसंत का चेहरा उकेरा होता है। तराजू का एक पलड़ा झुकता है तो दूसरा उठता है- दोनों घटनाएं एक-दूसरे में गूंथी हुई हैं। सूर्य इसी सृजन और विसर्जन के दोनों पलड़ों को संतुलित रखने वाला एक तराजू है।
भूत, वर्तमान, भविष्य में गूंथा हुआ हमारा जीवन बरसों बीत गए, पर एक दृश्य आज भी मेरे मन में ताजा है। गांव की धूल भरी पगडंडी पर भैंसों का झुंड धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। उस झुंड के पीछे-पीछे गोबर बटोरने वाली एक छोटी-सी बालिका चल रही है। अचानक एक भैंस कुछ रुकती है। बालिका चौकन्नी हो जाती है। वह समझ जाती है कि अब भैंस गोबर देगी। उसे एक कीमती वस्तु मिलने वाली है। भैंस बड़े प्यार से गोबर करती है। गोबर जमीन पर पहुंचे, उससे पहले ही वह बालिका अपने हाथों पर उसे ले लेती है और तुरंत अपनी टोकरी में रख देती है। यह दृश्य आज भी मेरे भीतर से मिटा नहीं है, क्योंकि इसमें जीवन का गहरा दर्शन छिपा है। वह गोबर उठाने वाली बच्ची एक साथ तीन कालों को जी रही होती है – जिस गोबर पर उसने डंडा गाड़कर अपना हक जताया, वह उसका भूतकाल है। जिसे उसने अभी उठाया, वह उसका वर्तमान है और जिसे उठाने के लिए वह आगे बढ़ रही है, वह उसका भविष्यकाल है। हमारा पूरा जीवन भी कुछ ऐसा ही है – भूत, वर्तमान और भविष्य। तीनों एक-दूसरे से गूंथे हुए हैं।








