रसरंग में मायथोलॉजी:  सिंह इस तरह बन गया शक्ति और राजत्व का प्रतीक
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रसरंग में मायथोलॉजी: सिंह इस तरह बन गया शक्ति और राजत्व का प्रतीक

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देवदत्त पट्टनायक4 घंटे पहले

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मैसूर स्थित जगमोहन पैलेस में लगी दुर्गा की पेंटिंग, जिसमें वे सिंह पर बैठी नजर आ रही हैं। - Dainik Bhaskar

मैसूर स्थित जगमोहन पैलेस में लगी दुर्गा की पेंटिंग, जिसमें वे सिंह पर बैठी नजर आ रही हैं।

पूर्वी एशिया के राजा, चाहे वे चीन के हों या जापान, वियतनाम, थाईलैंड अथवा इंडोनेशिया के, सिंह को राजत्व का प्रतीक मानते थे। चीन में आज भी राजमहलों के सामने सिंह और सिंहनी की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। सिंह के पंजे के नीचे एक ग्लोब होता है, जो संसार का प्रतीक माना जाता है, जबकि सिंहनी के पंजे के नीचे उसका शावक। यहां दिलचस्प तथ्य यह है कि सिंह कभी भी पूर्वी एशिया में नहीं पाए गए, मगर फिर भी यह प्राणी वहां की दृश्य संस्कृति (यानी कला, स्थापत्य आदि) का अभिन्न हिस्सा बन गया।

सिंगापुर का उदाहरण लेते हैं। उसके नाम का अर्थ ही है ‘सिंहों का नगर’। परंतु इस भूमि पर कभी भी कोई सिंह नहीं रहा। श्रीलंका के राष्ट्रीय ध्वज पर भी सिंह अंकित है, जबकि वहां भी सिंह कभी नहीं बसे। महावंश नामक बौद्ध ग्रंथ के अनुसार, श्रीलंका के सिंहल निवासी राजा विजया की संतानें हैं, जो कभी भारत से आए थे और स्वयं को ‘सिंह की संतान’ मानते थे। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि नरसिंह संप्रदाय, जो भारत के पूर्वी समुद्रतट पर कलिंग और आंध्र क्षेत्रों में पनपा, का विस्तार बाद में श्रीलंका तक हुआ।

सवाल यह भी उठता है कि क्या उस समय भारत में वास्तव में सिंह थे? कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार, गुजरात, मालवा और दक्खन के सूखे जंगलों में किसी समय एशियाई सिंह पाए जाते थे। यही वजह है कि भारत में ‘सिंह’ राजाओं से जुड़ गया और राजसी आसन को ‘सिंहासन’ तक कहा जाने लगा। आज भी भारत में राजपूत, सिख और अन्य सैन्य व क्षत्रीय समुदाय ‘सिंह’ या ‘सिंहा’ जैसे नामों से अपने आपको इस गौरव से जोड़ते हैं। दुर्गा देवी, जिन्हें प्राय: राजाओं की देवी माना जाता है, सिंह पर विराजमान दिखाई देती हैं। सिंह गौतम बुद्ध, जैन तीर्थंकर महावीर और सम्राट अशोक का भी प्रतीक रहा है। मंदिरों में भी ऐसी मूर्तियां मिलती हैं, जिनमें सिंह को गज (हाथी) को वश में करता हुआ दिखाया गया है।

इस प्रकार, सिंह भारतीय संस्कृति से इतना जुड़ गया कि उससे इस धारणा को बल मिला कि एशियाई सिंह कभी पूरे भारत में घूमते रहे होंगे और अब केवल गीर के जंगलों में बचे हैं। परंतु जीवविज्ञानी और इतिहासकारों का दृढ़ विश्वास है कि सिंह भारत के मूल निवासी नहीं हैं। जैसा कि शायद पूर्वी एशिया में हुआ, वैसा ही भारत में भी राजाओं ने अपनी राजसी शक्ति दिखाने के लिए शिकार और चिड़ियाघरों हेतु दूसरे देशों से सिंह मंगवाए होंगे। पूर्व-ऐतिहासिक गुफा कला में सिंहों का उल्लेख नहीं मिलता है। हड़प्पा की मुहरों पर बाघ और यहां तक कि अर्द्ध-बाघिनी देवियां चित्रित हैं, पर सिंह नहीं। हालांकि ऋग्वेद में सिंहों का उल्लेख मिलता है, लेकिन यह ग्रंथ आर्यों ने रचा था। कई लोग मानते हैं कि आर्य लगभग 3,500 वर्ष पहले हिंदुकुश पर्वत शृंखला के उस पार से घोड़ों पर सवार होकर भारत आए थे, जहां सिंहों का प्राकृतिक आवास था। 2,500 वर्ष पहले फारसी राजा सिंहों का शिकार करते थे। 4,500 वर्ष पहले मेसोपोटामिया के वीर सिंहों से कुश्ती लड़ते थे। मिस्र में भी सिंहों की मूर्तियां और चित्र पाए जाते हैं।

इन सभी सभ्यताओं में सिंह को वश में करना राजत्व और शक्ति का प्रतीक माना गया। मिस्र और मध्य एशिया के राजा सिंहों से लड़ते थे, क्योंकि वे सिंह उस क्षेत्र के मूल निवासी थे। चूंकि सिंह पशु जगत का सबसे शक्तिशाली परभक्षी है, इसलिए उसके शिकार के माध्यम से राजा अपनी वीरता और अधिकार का प्रदर्शन करते थे। यही विचार धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैला और सिंह राजसी सत्ता का प्रतीक बन गया। भारतीय लोकसाहित्य में बाघ प्रमुख बड़ी बिल्ली है, जो अनेक देवियों और संतों का वाहन भी है। संभव है कि ‘सिंह’ शब्द प्राचीन काल में सभी बड़ी बिल्लियों के लिए प्रयुक्त होता रहा हो, चाहे वे तेंदुआ हों, बाघ हों या वास्तविक सिंह। यह उसी तरह है जैसे ‘मृग’ शब्द सभी प्रकार के कुरंग, हिरण और अन्य खुरदार जंगली पशुओं के लिए प्रयुक्त होता है। फिर भी, आज अधिकांश लोग आसानी से यह स्वीकार नहीं कर पाएंगे कि ‘जंगल का राजा’ यानी सिंह भारत का मूल निवासी नहीं है।



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