रसरंग में चिंतन:  हमारे बिना भी इस संसार में कुछ रुकने वाला नहीं!
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रसरंग में चिंतन: हमारे बिना भी इस संसार में कुछ रुकने वाला नहीं!

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राम–रावण के बीच युद्ध हुआ। रावण के अनेक राक्षस मारे गए। जब रावण का पुत्र इंद्रजीत युद्धभूमि में उतरा, तो उसका सामना लक्ष्मण से हुआ। वाल्मीकि कहते हैं कि इंद्रजीत का रथ इंद्र के रथ जैसा प्रतीत होता था। इंद्रजीत की तीव्र बाणवर्षा से लक्ष्मण मूर्च्छित हो गए। इसका कारण जानते हैं? रावण का मायावी पुत्र इंद्रजीत अदृश्य होकर लक्ष्मण पर बाण बरसा रहा था। वह किस दिशा से प्रहार कर रहा था, यह लक्ष्मण को ज्ञात नहीं था। वे इस उलझन में थे कि किस ओर तीर चलाएं। यही स्थिति आज मानव की भी है। तनाव नाम का अदृश्य मायावी हम पर लगातार तीखे तीर चला रहा है। उसे हम साधारण आंखों से देख नहीं पाते, इसलिए असहाय हो जाते हैं। क्या तनाव से सामना करने का कोई उपाय है? क्या तनावमुक्त जीवन संभव है? मनुष्य सदा तनाव में रहता है, लेकिन क्या बंधी हुई भैंस को भी तनाव सताता है? आखिर इस तनाव का निवासस्थान कहां है? अदृश्य इंद्रजीत से कैसे बचा जाए? प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आज प्रतिस्पर्धा तनाव बढ़ा रही है। साहस भी तनाव बढ़ाता है। जोखिम तनाव बढ़ाता है। असुरक्षा की भावना, कुसंगति, ईर्ष्या, सब तनाव को बढ़ाते हैं। ईर्ष्या करने वाले का भी और ईर्ष्या का शिकार बनने वाले का भी तनाव बढ़ता है। द्वेष और क्रोध तनाव के सहभागी हैं। सफल होने और सदैव अव्वल आने की आकांक्षा मनुष्य को चैन से बैठने नहीं देती। बीमारी से जुड़ी मृत्यु की संभावना तनाव बढ़ाती है। क्या विवाद कभी तनाव न बढ़ाए, यह संभव है क्या? तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता, लेकिन उसे काबू में रखने के उपाय अवश्य हैं। कुछ तत्व तनाव को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। जीवनसाथी का प्रेम तनाव का नाश करता है। यदि कोई विश्वासपात्र मित्र मिल जाए, तो ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए, क्योंकि उसकी मात्र उपस्थिति ही राहत देती है। सत्संग से भी तनाव दूर होता है। सत्संग केवल साधुओं के साथ ही हो, यह आवश्यक नहीं। कभी-कभी विचारवान और चरित्रवान गृहस्थ के साथ बिताया गया समय भी तनावमुक्ति में सहायक होता है। अच्छी पुस्तक भी तनाव दूर करती है। गहरी नींद तनावमुक्ति का सबसे सरल और श्रेष्ठ उपाय है। इससे बढ़कर कोई साधन नहीं। महानगरों में शोर-प्रदूषण मनुष्य को उसकी सहमति के बिना ही अधमरा कर देता है। लगभग सभी धर्मों के त्योहार आजकल शोर-वर्धक होते जा रहे हैं। भीड़ और शोर मनुष्य के अंतर्मन पर आघात करते हैं। ऐसी परिस्थिति में हठपूर्वक पाया गया एकांत और मौन संजीवनी बन सकता है।
मन की ठंडक अमूल्य है। महासागर की विशालता में, पर्वत-शिखरों की ऊंचाई पर, बारिश की नमी में, नर्म धूप में, हवा में झूलते फूलों में, पक्की सड़क के बजाय टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर चलने में और हरी-भरी वादियों में विचरण करने से तनाव घटता है। कोई कह सकता है कि यह सब तो अमीरों को उपलब्ध है। हम गरीब कहां जाएं? ऐसे लोगों से बस इतना ही कहा जा सकता है कि घर से थोड़ी ही दूरी पर कोई सार्वजनिक उद्यान तो होगा ही। वहां जाने से आपको कौन रोक सकता है? उस उद्यान में निश्चित ही कोई ऐसा वृक्ष होगा, जो वर्षों से आपकी प्रतीक्षा में खड़ा है। वही वृक्ष आपका परम मित्र बन सकता है। मानव मित्र धोखा दे सकता है, पर वृक्ष-मित्र कभी धोखा नहीं देता, यह मेरा विश्वास है। वृक्षं शरणं गच्छामि, सूर्यं शरणं गच्छामि, सत्यं शरणं गच्छामि। यदि हम अपने भीतर थोड़ी-सी सजगता विकसित कर लें, तो अत्यधिक तनाव के क्षणों में जाग्रत होकर साक्षी भाव से हमें सताने वाले ‘मिस्टर टेंशन’ को देख सकते हैं। उस समय करना क्या है? प्रार्थनामय चित्त से ‘ॐ’ का जाप करें और स्वयं से कहें- तेरे बिना इस संसार में कुछ भी रुकने वाला नहीं है।
यदि हृदय दुख से भरा हो, तो कुछ समय एकांत में रो लेना बहुत अच्छा होता है। जो मनुष्य कभी नहीं रोता, उससे अधिक बदनसीब कोई नहीं। रुदन मनुष्य जाति को मिला एक दिव्य विशेषाधिकार है। जो रोता है, उसका हृदय हल्का हो जाता है। हल्का हृदय इतना शक्तिशाली होता है कि हृदयाघात को भी टाल सकता है।
उपनिषद कहते हैं – हृदयेन हि सत्यं जानाति। मनुष्य की बुद्धि आदरणीय है, पर कभी-कभी वह विपरीत दिशा में चली जाती है। हृदय की विशेषता यह है कि वह कभी उलटे मार्ग पर नहीं चलता। मोरारी बापू की रामकथा हृदय की देखभाल का श्रेष्ठ उपाय है। कथा तनाव घटाती है, क्योंकि वह सत्संग का अनुभव कराती है। क्या तनावमुक्त जीवन संभव है?
क्या किसी भी प्रकार के तनाव के बिना कविता, कहानी या निबंध की रचना संभव है? कलाकारों और साहित्यकारों में तनाव कुछ अधिक होता ही है। किसी कलाकार को प्रदर्शन से पहले के कुछ घंटों में भारी तनाव रहता है। श्रेष्ठ वक्ता भी अपने भाषण की तैयारी करते समय क्या पूरी तरह तनावमुक्त रह सकता है? क्या तनावमुक्त जीवन संभव है? यदि हां, तो उसका मार्ग कौन-सा है? भगवान बुद्ध कहते हैं, मार्ग आकाश में नहीं होते, मार्ग तो हृदय में होते हैं।



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