रसरंग में चिंतन:  नई पीढ़ी को क्यों देखनी चाहिए ‘टाइटैनिक’
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रसरंग में चिंतन: नई पीढ़ी को क्यों देखनी चाहिए ‘टाइटैनिक’

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गुणवंत शाह5 घंटे पहले

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टाइटैनिक फिल्म देखने के बाद मैं करीब एक घंटे तक नि:शब्द था। भीतर से एक ही भाव निकला – आज तो मैंने मानो तीर्थयात्रा कर ली। हॉलीवुड की यह श्रेष्ठतम फिल्म अमेरिका के बड़े परदे पर 28 साल पहले रिलीज हो चुकी है। इसलिए मैं नई पीढ़ी से कहना चाहता हूं कि उसे यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए। मुझे इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि ‘टाइटैनिक’ को कितने ऑस्कर मिले या इसके निर्माण में कितने मिलियन डॉलर खर्च हुए। ये सारी जानकारियां गौण हैं। इतना तय है कि इस फिल्म ने मेरे भीतर एक दीया जला दिया। उसी दीये की रोशनी में ये चंद शब्द लिख रहा हूं।

जिसे हम ध्वज या झंडा कहते हैं, उसकी खोज किसने की होगी। आदिमानव अपनी कुटिया छोड़कर जंगल में शिकार के लिए निकलता और बहुत दूर चला जाता। न कोई रास्ता, न कोई निशान, न कोई पता। शिकार मिलने के बाद लौटते समय घर पहचानना कठिन हो जाता होगा। दूर से ही अपनी कुटिया पहचान में आ जाए, इसलिए ध्वज एक निशानी के रूप में काम आता होगा। यानी जिसे हम आज राष्ट्रध्वज कहते हैं, उसकी शुरुआत आदिमानव की कुटिया पर फहराते ध्वज चिह्न से हुई होगी। उस समय विवाह प्रथा अस्तित्व में नहीं आई थी। धनुष बाण लेकर भोजन की तलाश में निकले व्यक्ति के लौटने में देर होती तो उसकी प्रतीक्षा में दो आंखें भी होंगी, जिन्हें उसकी बेसब्री से प्रतीक्षा होती होगी। इससे यह भी सिद्ध होता है कि विवाह प्रथा से पहले सदियों तक प्रतीक्षा प्रथा का प्रचलन रहा होगा। इस प्रतीक्षा में कई बार दिन और सप्ताह बीत जाते होंगे। कई दिनों की भटकन के बाद लौटे व्यक्ति ने जब किसी अपने को इंतजार में पाया होगा तो उसके हृदय में आनंद का पारावार न रहा होगा। कालांतर में लोगों ने उसी बाढ़ को प्रेम कहा होगा। मानव इतिहास में प्रेम प्रथा अत्यंत प्राचीन है। विवाह प्रथा तो मानो कल की बात है।

हमारे यहां विवाह संस्कार शब्द प्रचलित है। विवाह का संबंध संस्कृति से है, जबकि प्रेम का संबंध प्रकृति से। क्या आपने कभी प्रेम संस्कार शब्द सुना है। विवाह के साथ योजना, प्रयोजन और नियोजन जुड़ जाते हैं, जबकि प्रेम स्वभावत: निष्प्रयोजन होता है। पेड़ पर खिले फूल को तोड़कर बैठक के फूलदान में सजा दें, तो क्या होता है। प्रेम घटना और विवाह घटना के बीच कुछ ऐसा ही अंतर होता है। फिल्म ‘टाइटैनिक’ में प्रेम घटना और विवाह घटना आमने सामने आ जाती हैं।

‘रोज’ जैसी नाजुक लड़की टाइटैनिक जहाज से कूदकर जान देने की तैयारी में होती है। जैक नाम का एक युवा उसे किसी तरह समझा बुझाकर रोक लेता है। ‘रोज’ की शादी एक अमीर व्यक्ति से तय हो चुकी होती है, जो उसी जहाज में उसके साथ होता है। यह विवाह ‘रोज’ की सहमति के बिना केवल आर्थिक मजबूरी के कारण तय किया गया होता है। भीतर ही भीतर ‘रोज’ घुटन महसूस करती है और आत्महत्या के लिए तैयार हो जाती है। बच जाने के बाद वह जैक के प्रेम में डूब जाती है। इधर टाइटैनिक डूबता है, उधर प्रेम तैर जाता है।

टाइटैनिक देखने के बाद एक सत्य मन में लगातार गूंजता रहा कि मौत का सामना कर पाने वाली एक ही चीज है, जिसे प्रेम कहा जाता है। माना जाता है कि पृथ्वी पर मानव जीवन का आविर्भाव करीब एक अरब घंटे पहले हुआ था। मनुष्य की सबसे पुरानी आदत सेक्स है और उसकी सबसे प्राचीन लालसा प्रेम। अपनी पुरानी आदतों के कारण ही हम आज जीवित हैं। पुरानी आदत मनुष्य को जीवन का उपहार देती है, जबकि उसकी सबसे प्राचीन लालसा उसे जीवन का मर्म समझाती है। सेक्स जीवनदाता है, प्रेम जीवन शांति। प्रेम नहीं तो शांति नहीं। अशांति यानी प्रेम का अभाव। शारीरिक और मानसिक रोगों से बचने के लिए लव थेरेपी अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई है। कहा भी गया है कि प्रेम उपचार के लिए अच्छा है। प्रेम करने वाले लंबी आयु प्राप्त करते हैं। प्रेम का स्वाद पाए बिना जीवन अर्थहीन रह जाता है। जीवन की अर्थहीनता ही मृत्यु है।

जब टाइटैनिक जहाज डूब रहा होता है, तब ‘रोज’ और जैक मौत से टक्कर लेते हैं। उनमें प्रेमियों की प्राणशक्ति, संकल्पशक्ति और आत्मशक्ति प्रकट होती दिखाई देती है। मौत उन्हें डराती नहीं, बल्कि उन्हें एक दूसरे में और गहराई से घुलने के लिए उकसाती हुई लगती है। प्रेम जितना उदात्त होता है, निर्भयता उतनी ही ऊंची होती है। रोज के जीवित रहने का वचन मांगते समय जैक ठंडे पानी में कांप रहा होता है। वह ठीक से बोल भी नहीं पाता। बस इतना कह पाता है कि रोज, तुम मुझे मिली, यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी घटना है। मैं तुम्हारा आभारी हूं। दो प्रेमियों का मिलना आकस्मिक होता है। संभावनाओं के जंगल को पार कर, प्रकृति की किसी अद्भुत योजना के तहत घटित हुई किसी आकाशीय, इंद्रधनुषी घटना की तरह।

फिर भी अटूट रहता है प्रेम का सेतु टाइटैनिक देखने के बाद एक और अच्छी फिल्म की याद आती है, वह है फॉरेस्ट गम्प। इस फिल्म में भी सच्चे प्रेम का वैसा ही स्नेहपूर्ण चित्रण है। दो प्रेमियों के बीच कहीं कोई गलतफहमी, गांठ-गिरह या बहस नहीं। सरलता और निष्कलुषता के दो किनारों के बीच प्रेम का झरना बहता रहता है। यह झरना कहीं टेढ़ा मेढ़ा और कभी-कभी उग्र भी हो जाता है, लेकिन उसकी कलकल ध्वनि सदैव एक सी रहती है। वियतनाम युद्ध के समय नायक अलग हो जाता है, फिर भी प्रेम का सेतु अंत तक अटूट रहता है।



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