रसरंग में चिंतन:  बंजर दिमाग वाला इंसान काठ के संतरे जैसा!
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रसरंग में चिंतन: बंजर दिमाग वाला इंसान काठ के संतरे जैसा!

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गुणवंत शाह2 घंटे पहले

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हमारे ही बीच बहुत से ऐसे लोग होते हैं, जो किसी भिन्न विचार से अहिंसक ढंग से असहमति जताना ही नहीं जानते। रामनारायण पाठक ने कहीं लिखा है कि हम या तो व्यक्ति के अंधपूजक होते हैं या उसके कट्टर धिक्कारक। अपने से अलग सोच रखने वाले को छोटा समझना एक संकीर्ण मानसिकता का प्रमाण है। ऐसा व्यक्ति कभी किसी बगीचे का माली नहीं बन सकता, लेकिन कब्रिस्तान का रखवाला अवश्य बन सकता है। बंजर दिमाग वाला इंसान लकड़ी के संतरे जैसा होता है, जिससे कभी रस नहीं निकलता। अपने बांग्लादेश प्रवास के दौरान मैंने देखा कि ढाका में बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान के निवास स्थित पुस्तकालय में लेनिन की कई पुस्तकें सुरक्षित रखी गई थीं। स्वयं शेख हसीना ने मुझे वे पुस्तकें दिखाई थीं। उन्होंने कहा था कि उनके अब्बाजान, सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी के गुणों का एक अनोखा सम्मिश्रण थे। यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि गांधीजी और लेनिन कभी मिले नहीं, हालांकि गांधीजी और मुसोलिनी के बीच लगभग डेढ़ घंटे की चर्चा हुई थी।

राजकोट के गांधीभक्त स्वर्गीय छगनलाल जोशी ने मोरारजी भाई के जीवनदर्शन पर एक पुस्तक लिखी है। उसमें मोरारजी भाई का यह उल्लेख मिलता है कि गांधीजी लेनिन को महर्षि कहा करते थे। जब लेनिन गंभीर रूप से बीमार पड़े तो डॉक्टरों ने उन्हें विदेशों से आने वाली महंगी दवाएं लेने की सलाह दी। इस पर लेनिन ने साफ तौर पर कहा कि जो दवा गरीब मजदूर नहीं खरीद सकता, उससे स्वस्थ होना कामरेड लेनिन को मंजूर नहीं। इसके बावजूद उनकी पत्नी ने उन्हें बताए बिना खाने-पीने की चीजों में दवा मिलाकर उन्हें दी, जिससे वे ठीक हो गए। दो-तीन महीने बाद जब लेनिन को इसका पता चला, तो वे बेहद आहत और क्रोधित हुए। उन्होंने इसे विश्वासघात माना और पत्नी पर राजद्रोह का आरोप तक लगाया। यह भी जगजाहिर है कि बीमारी के दौरान साथियों ने उन्हें नरम रोटी खाने की सलाह दी थी, लेकिन लेनिन अड़े रहे कि वे वही माेटी रोटी खाएंगे, जो सामान्य राशन में मिलती है। लेनिन के निधन के बाद स्टालिन के शासनकाल में सब कुछ तहस-नहस हो गया। लाखों लोगों का कत्लेआम हुआ और मरने वालों की संख्या एक करोड़ तक बताई जाती है। यह तथ्य स्वयं स्टालिन ने अपने अतिथि चर्चिल को बताया था, जिसका उल्लेख मार्टिन गिलबर्ट की पुस्तक ‘रोड टु विक्टरी’ में मिलता है।

धीरे-धीरे विकसित होती है नैतिक चेतना : अब एक गद्य-काव्य पर नजर डालिए और अनुमान लगाइए कि इसे किसने लिखा है। कुछ शताब्दियों पहले हमारे पूर्वज नरभक्षण करते थे और ऐसे कई कर्म करते थे, जिन्हें सुनकर आज हम हतप्रभ हो उठते हैं। उस समय जीवित मनुष्य को खाने से मना करने वाला विचार अजीब लगता होगा। ऐसे लोग हंसी का पात्र बने होंगे और संभव है कि उन्हें फांसी तक दे दी गई हो। ये पंक्तियां गांधीजी ने ‘हरिजन बंधु’ में 27 सितंबर 1936 को लिखी थीं। आज इंसानों को मारकर खाने की कल्पना मात्र से हम कांप उठते हैं। यह विकसित होती मानवता का ही परिणाम है। महात्मा गांधी को मानव में गहरी श्रद्धा थी और वे मानते थे कि नैतिक चेतना धीरे-धीरे विकसित होती है। इतिहासकार आनॉल्ड टॉयनबी ने इसी संदर्भ में कहा था कि जब वे इतिहास की ओर देखते हैं तो निराश हो जाते हैं, लेकिन मानव विकास की ओर देखते हैं तो आशावादी बन जाते हैं। साम्यवाद और संगठित धर्म को जोड़ने वाली कड़ी अंधविश्वास है। भारत के कई साम्यवादी विचारों को जड़ता के साथ पकड़कर बैठे हैं। वे कार्ल मार्क्स के प्रति ऐसा भाव रखते हैं, मानो वे किसी ईश्वर के समान हों। इसका परिणाम यह हुआ कि रूस, चीन और पूर्वी यूरोप ने साम्यवाद को त्यागकर पूंजीवाद का रास्ता अपनाया और अंततः क्यूबा ने भी यही किया। इसके विपरीत भारत के साम्यवादी अपनी जड़ता से बाहर नहीं आ सके। उनके साक्षात्कारों के पीछे आज भी स्टालिन की तस्वीर दिखाई देती है और वे एक करोड़ लोगों की हत्या करने वाले को राक्षस कहने को भी तैयार नहीं।

नई आध्यात्मिकता का विरोध! हमारी सदी की महान क्रांतिकारी विचारक आयन रैंड नास्तिक थीं, लेकिन वे जड़ नास्तिक नहीं थीं। उनके विचारों ने नास्तिकता को भी एक नई गरिमा दी। उन्होंने कहा था कि अस्तित्व का अस्तित्व है, यानी वास्तविकता को उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए। जब उनसे पूछा गया कि नई आध्यात्मिकता का विरोध कहां से आएगा, तो उन्होंने समाज की हिंसा या तनाव की ओर इशारा नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि नई आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा विरोध पुरानी, जमी हुई आध्यात्मिकता से ही होगा। यही चेतावनी हमारे समय के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक और विचारणीय है। ——————



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