गुणवंत शाह3 घंटे पहले
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विचारमग्न मुद्रा में बैठे बुद्ध की विशालकाय प्रतिमा, जो जापान के कामाकुरा शहर में स्थित है।
ईस्वी सन् 525 में कांचीपुरम बंदरगाह से एक बौद्ध भिक्षु नाव में बैठकर चीन पहुंच गया। उसका नाम था बोधिधर्म। उसने दीवार के सामने बैठकर लम्बे समय तक ध्यान किया। फिर उसने इस तरह का ध्यान करना चीनियों को भी सिखाया। चीनी भाषा में “ध्यान’ का उच्चारण “चान’ हो गया। इसके बाद चीन का “चान’ जापान पहुंचा और वहां उसका उच्चारण “झेन’ या ‘जेन’ हो गया। इस तरह से ये कहना उचित होगा कि “झेन’ के प्रचार-प्रसार में भारत के उस भिक्षु बोधिधर्म का बहुत बड़ा योगदान है।
बुद्ध करुणा की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने कुरीतियों का खुलकर विरोध किया और करुणा की महिमा को बढ़ाया। उन्होंने एकदम निम्न से निम्न जाति के अस्तित्व को भी स्वीकार किया। “झेन’ विचारधारा का महत्वपूर्ण उपादान “ध्यान’ है। जापान के झेन भिक्षु रोज “टी सेरेमनी’ मनाते हैं। इस दौरान वे चाय बनाते हैं। इस क्रिया में सभी एकाकार हो जाते हैं। “झेन’ पंथ में ध्यान का मर्म, कर्म और कर्ता एकरूप हो जाते हैं। ऐसे में चित्त अपनी सहज अवस्था में रहता है। लामा सूर्यदास कहते हैं… चलो तो ऐसे चलो/ मानो बुद्ध चल रहे हों/ बैठो तो ऐसे बैठो / मानो बुद्ध बैठे हों / सोते समय ऐसे सोओ / मानो बुद्ध सोए हों / विचार करना हो तो ऐसे विचारो / मानो बुद्ध विचार कर रहे हों/ बस यही क्षण है, जब आप बुद्ध से दूर नहीं होते हो।
बुद्ध के चार आर्य सत्य: कपिलवस्तु में विहार करने के दौरान राजकुमार सिद्धार्थ को यह समझ में आया कि जीवन पूरी तरह से रोगग्रस्त और मृत्युग्रस्त है। इससे छुटकारा संभव नहीं। ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने चार आर्य सत्य बताए… दुख है। दुख का कारण है। दुख का उपाय है। दुख के उपाय का मार्ग भी है। आगे जाकर उन्होंने बताया कि दुख का मूल कारण तृष्णा है और तृष्णा से मुक्ति ही मोक्ष है। बुद्ध ने मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा को जीवन के चार सोपान बताए। उनकी विचारधारा में ईश्वर का कोई स्थान नहीं था; उन्होंने कर्म और करुणा पर बल दिया।
एक प्रेरणादायक कथा: एक गांव में बौद्ध भिक्षु भिक्षा मांगने गए। एक व्यक्ति उनसे काफी चिढ़ता था। कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाने से पहले उसने अपनी पत्नी को आदेश दिया कि जब बुद्ध उनके घर आएं, तो उन्हें कुछ न दें। उन दिनों पति का आदेश किसी राजाज्ञा से कम नहीं होता था। दूसरे दिन बुद्ध भिक्षा मांगने उसी के घर पहुंचे। यह देखकर उस व्यक्ति की पत्नी ने कहा- भगवन्! आपको देने के लिए मेरे घर में कुछ भी नहीं है। यह सुनकर बुद्ध आगे बढ़ गए। तीनों दिनों तक यही क्रम चलता रहा। चौथे दिन बुद्ध फिर उसी व्यक्ति के घर पहुंचे। उस दिन वह व्यक्ति घर पर था, तो उसने बुद्ध से कहा- तीन दिनों से मेरी पत्नी तुम्हें भिक्षा नहीं दे रही है, उसके बाद भी तुम मेरे घर भिक्षा मांगने कैसे आ गए। इस पर बुद्ध ने शांति से उत्तर दिया- तुम्हारी पत्नी जिस नम्रता और विवेक से मुझे आदर के साथ “ना’ कहती थी, उनकी वही ‘ना’ सुनने के लिए वे प्रतिदिन आते हैं। उस महिला की ‘ना’ भी करुणा और माधुर्य से भरी हुई थी। यह सुनकर वह शख्स निरुत्तर हो गया।
तेज्सुगन और झेन सूत्रों का संकलन: जापान के क्योटो नगर में तेत्सुगन नामक झेन साधु ने झेन सूत्रों का संकलन किया और उसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने का संकल्प लिया। उस समय सारे सूत्र केवल चीनी भाषा में ही उपलब्ध थे। काम बहुत ही कठिन था। इस काम के लिए तेत्सुगन पदयात्रा करते और राशि इकट्ठा करते। वे सहज भाव से सभी के दान को स्वीकार करते। कुछ समय बाद ऐसा हुआ कि प्राकृतिक आपदाओं के कारण वह धन राहत कार्यों में खर्च हो गया। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और अंततः 20 वर्षों के प्रयास के बाद यह कार्य पूरा किया। इस दृष्टांत से यही निष्कर्ष निकलता है कि बुद्ध की करुणा और उनके सिद्धांतों ने समाज में गहरी छाप छोड़ी। उनकी शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं और हमें करुणा, मैत्री और समता का मार्ग दिखाती हैं। बुद्ध की छाया में पंचशील पदयात्रा का यह सूत्र हमें प्रेरणा देता है.. वृक्षं शरणमं गच्छामि सूर्यम शरणं गच्छामि सत्यं शरणं गच्छामि








