मृदुला द्विवेदी41 मिनट पहले
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द्वारका के बाहरी क्षेत्र में स्थित रुक्मिणी माता मंदिर।
द्वारका हिंदुओं के प्रमुख धामों में से एक है और चारधाम परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अन्य तीन धाम बद्रीनाथ, पुरी और रामेश्वरम हैं। आख्यानों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा से राजधानी स्थानांतरित कर द्वारका को बसाया था। यह नगर भव्य मंदिरों के साथ समुद्र तट और आध्यात्मिक वातावरण के कारण भी विशेष आस्था और आकर्षण का केंद्र है, जहां हर वर्ष हजारों श्रद्धालु दर्शन, स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आते हैं।
द्वारकाधीश मंदिर : द्वारकाधीश मंदिर शहर के मध्य में स्थित है और इसके चारों ओर एक चहल-पहल भरा बाजार है। इस मंदिर की उत्पत्ति अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। मान्यता है कि इसका निर्माण भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र ने लगभग 2500 वर्ष पूर्व करवाया था। हालांकि समय-समय पर हुए जीर्णोद्धार के कारण वर्तमान संरचना अपेक्षाकृत नई है। यह मंदिर गोमती नदी के तट पर स्थित है। दर्शन के समय मोबाइल फोन, कैमरा या बैग ले जाने की अनुमति नहीं होती। यहां भीड़ रहती है, लेकिन दर्शन की कतारें सुव्यवस्थित ढंग से संचालित की जाती हैं। मंदिर अत्यंत भव्य है और इसमें भगवान श्रीकृष्ण मुख्य आराध्य के रूप में विराजमान हैं। इसकी दीवारों पर सुंदर नक्काशी और पौराणिक कथाओं के दृश्य अंकित हैं।
सुदामा सेतु : मंदिर परिसर के भीतर कैमरे की अनुमति नहीं होने के कारण द्वारकाधीश मंदिर के बाहरी सौंदर्य को कैद करने के लिए सुदामा सेतु सबसे उपयुक्त स्थान है। यह सेतु मंदिर के पास ही स्थित है और यहां से सूर्यास्त का दृश्य भी अत्यंत मनोहारी दिखाई देता है। पुल पर जाने के लिए मामूली शुल्क लिया जाता है। यहां से गोमती नदी का सुंदर दृश्य भी देखने को मिलता है। मंदिर और सुदामा सेतु दोनों के लिए निर्धारित दर्शन समय होता है और दोपहर में कुछ घंटों के लिए ये बंद रहते हैं।
बेट द्वारका : बेट द्वारका अरब सागर के तट पर स्थित है और यह द्वारका से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। यहां केवल बोट के माध्यम से ही पहुंचा जा सकता है। यहां का मुख्य मंदिर अत्यंत सुंदर है और मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां सुदामा जी ने श्रीकृष्ण को चावल भेंट किए थे। आज भी भक्त यहां चावल चढ़ाते हैं। यह भी कहा जाता है कि यही वह स्थान है, जहां द्वारका की पौराणिक जलमग्न नगरी स्थित थी। मंदिर परिसर के आसपास एक छोटा बाजार है, जहां नाश्ते और स्मृति चिह्न उपलब्ध रहते हैं। समुद्र तट की शांति, लहरों की ध्वनि और सूर्यास्त का दृश्य यात्रियों को विशेष आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है।
रुक्मिणी माता मंदिर : द्वारका के बाहरी क्षेत्र में स्थित रुक्मिणी माता मंदिर भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी और महारानी रुक्मिणी को समर्पित है। इसे लगभग 2,500 वर्ष पुराना माना जाता है, हालांकि वर्तमान भवन का समय-समय पर नवीनीकरण हुआ है। यह मंदिर द्वारकाधीश मंदिर की तुलना में साधारण है, पर इसकी वास्तुकला उसी अलंकृत शैली में निर्मित है। मंदिर से जुड़ी लोककथाएं रुक्मिणी के त्याग, भक्ति और श्रीकृष्ण से उनके गहरे आध्यात्मिक संबंध को दर्शाती हैं।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग: नागेश्वर ज्योतिर्लिंग द्वारका शहर से लगभग 17 किलोमीटर दूर स्थित है। मोमाई मां का मंदिर नागेश्वर से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर है और दोनों को एक ही यात्रा में देखा जा सकता है। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव को समर्पित है और यहां श्रद्धालुओं की संख्या अधिक रहती है। मोमाई मां का मंदिर एक छोटा लेकिन क्षेत्रीय महत्व वाला मंदिर है। यह मुरवेल बीच पर स्थित है, जो सुंदर और अपेक्षाकृत कम भीड़ वाला समुद्र तट है। यदि आप नागेश्वर ज्योतिर्लिंग जा रहे हों तो मोमाई मां मंदिर अवश्य जाएं।
द्वारका पहुंचने के एक नहीं, अनेक साधन
कैसे पहुंचें? अहमदाबाद से द्वारका के लिए ओखा वंदे भारत ट्रेन उपलब्ध है। दिल्ली से द्वारका के बीच सीधी ट्रेनें चलती हैं। गुजरात के प्रमुख शहरों से द्वारका के लिए बस सेवाएं भी उपलब्ध हैं और राज्य की सड़क व्यवस्था सामान्यतः अच्छी है। विमान यात्रा करने वाले जामनगर और राजकोट से द्वारका पहुंच सकते हैं। कहां ठहरें? यदि आप द्वारकाधीश मंदिर के पास ठहरना चाहते हैं तो वहां हर बजट के होटल उपलब्ध हैं। गोमती घाट क्षेत्र भी नदी के निकट होने के कारण एक अच्छा विकल्प है। इसके अलावा कुछ रिसॉर्ट ऐसे भी हैं, जो इन क्षेत्रों से दूर स्थित हैं और अधिक सुविधाओं के साथ लग्जरी अनुभव प्रदान करते हैं। कब जाएं? द्वारका घूमने का सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर से मार्च के बीच का होता है, जब मौसम सुहावना रहता है। अप्रैल से जून के बीच गर्मी अधिक होती है और यह ऑफ सीजन माना जाता है। जुलाई से सितंबर तक मानसून रहता है और मौसम की दृष्टि से यह समय गर्मी की तुलना में बेहतर हो सकता है।







