जयजीत1 घंटे पहले
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देश को आजाद हुए 78 साल हो चुके हैं। इसके बावजूद आज भी भारतीय संसद में महिलाओं की संख्या संतोषजनक नहीं कही जा सकती। मुस्लिम महिला सांसदों की स्थिति तो और भी चिंताजनक है। अब तक महज 18 मुस्लिम महिलाएं ही लोकसभा में पहुंच पाई हैं। यह आंकड़ा भी पूरे 18 लोकसभा चुनावों का कुल जमा-जोड़ है। जिस वर्ग (मुस्लिम महिलाएं) की देश की आबादी में हिस्सेदारी लगभग 7 फीसदी हो, उसकी उपस्थिति लोकतंत्र के सर्वोच्च सदन में उंगलियों पर गिनी जा सके, यह न केवल शोचनीय बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण है।
इन 18 मुस्लिम महिला सांसदों के जद्दोजहद और संघर्ष की कहानी वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक रशीद किदवई और पॉलिटिकल साइंटिस्ट अंबर कुमार घोष की नई किताब ‘मिसिंग फ्रॉम द हाउस: मुस्लिम वीमेन इन द लोकसभा’ सामने लाती है। यह संभवतः पहला ऐसा दस्तावेज है, जिसमें सभी मुस्लिम महिला सांसदों का सामाजिक जीवन, राजनीतिक पृष्ठभूमि और संसदीय योगदान एक किताब के तौर पर दर्ज किया गया है।
किताब बताती है कि आजादी के बाद हुए 18 आम चुनावों में से 5 बार ऐसा हुआ, जब एक भी मुस्लिम महिला संसद नहीं पहुंची। दूसरी और भी चौंकाने वाली बात यह सामने आती है कि देश के पांच दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल) ने आज तक किसी भी मुस्लिम महिला को लोकसभा में नहीं भेजा, जबकि ये राज्य शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक मानकों पर अपेक्षाकृत प्रगतिशील माने जाते हैं।
लेखक यह भी रेखांकित करते हैं कि इन 18 सांसदों में से किसी पर भी भ्रष्टाचार, आपराधिक मामले या हेट स्पीच का कोई गंभीर आरोप नहीं लगा। इसके उलट, उन्होंने सक्रिय और जवाबदेह जनप्रतिनिधियों की भूमिका निभाई। लोकसभा की बहसों में उनकी भागीदारी, विविध नीतिगत मुद्दों पर सवाल उठाना, अपने-अपने क्षेत्रों के विकास के लिए गहरी प्रतिबद्धता और संसदीय समितियों में उनका योगदान, ये सब दर्शाता है कि घर, समाज और समुदाय की रूढ़ियों से जूझते हुए भी वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनीं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर भी अपनी भूमिका में लिखते हैं कि आज के कई सांसदों, जो संसद में अक्सर जहर उगलते रहते हैं, को इन महिलाओं से सीखना चाहिए।
इन महिलाओं का संसदीय सफर 1957 से शुरू होता है। उस वर्ष दूसरे आम चुनाव में दो मुस्लिम महिलाएं (असम के जोरहट से बेगम मोफिदा अहमद और भोपाल से मैमूना सुल्तान) लोकसभा पहुंची थीं। इसके बाद इस सूची में कई नाम जुड़े। वैसे अधिकांश महिलाएं राजनीतिक विरासत या मजबूत पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते ही संसद तक पहुंच पाईं। यह बताता है कि सामान्य पृष्ठभूमि वाली किसी मुस्लिम महिला के लिए दिल्ली अब भी बहुत दूर की कौड़ी है।
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किताब : मिसिंग फ्रॉम द हाउस
लेखक: रशीद किदवई एवं अंबर घोष
प्रकाशक: जगरनाट
कीमत : 599 रुपए








